नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election 2019) में हर बार की तरह फिल्म व खेल जगत की कई हस्तियां राजनीति में आकर चुनाव मैदान में हैं. राजनीतिक दल चुनाव में कामयाबी के लिए फिल्म और खेल जगत की मशहूर हस्तियों (सेलिब्रटीज) को खूब आजमाते हैं. चुनाव सुधार के क्षेत्र में कार्यरत संस्था ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म’ (Association for Democratic Reforms) के संस्थापक सदस्य प्रो. जगदीप छोकर सेलिब्रिटीज का राजनीति में उपयोग करने के बढ़ते चलन को जनहित के मुद्दों से ध्यान भटकाने का राजनीतिक दलों का हथकंडा मानते हैं. पेश हैं इस मुद्दे पर प्रो. छोकर से पांच सवाल और उनके जवाब…

सवाल: फिल्म और खेल जगत की हस्तियों के राजनीति में आने से क्या सचमुच में राजनीतिक दलों को चुनावी फायदा होता है?
जवाब: राजनीतिक दल चुनावी दंगल में फायदेमंद साबित होने वाले हर व्यक्ति का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे लोग फिल्म या खेल जगत सहित किसी भी क्षेत्र के हो सकते हैं. दुखद बात यह है कि राजनीतिक दल ऐसे लोगों को जरूरी नहीं समझते जो जनहित के लिये वास्तव में काम करते हैं. भीड़ जुटाने और जनता को लुभाने के लिये फिल्म और खेल जगत के लोगों का इस्तेमाल होता है. ये हस्तियां वोट जुटाने में सक्षम होती हैं और चुनाव मैदान में भी इनका इस्तेमाल होता है.

सवाल: भारत में फिल्मी कलाकारों और खिलाड़ियों के राजनीति में आने का चलन पिछले कुछ सालों में बढ़ा है. इसकी क्या वजह है?
उत्तर: फिल्मी कलाकारों और खिलाड़ियों का आजादी के बाद से ही चुनाव में उपयोग शुरु हो गया था. पहले ये लोग सिर्फ चुनाव प्रचार में हिस्सा लेते थे. फिर चुनाव में सक्रिय भागीदारी का सिलसिला दक्षिण भारत से बढ़ा और 1980 के दशक में यह उत्तर भारत तक पहुंच गया. पिछले कुछ दशकों में यह चलन बढ़ रहा है. इसकी वजह साफ है. राजनीतिक दलों को लगने लगा कि अगर इनका आभामंडल दूसरों के लिये वोट जुटा सकता है तो अपने लिये ही वोट क्यों न जुटाये जायें. ठीक उसी तरह जैसे अपराधियों के, राजनीति में इस्तेमाल के दौरान खुद किस्मत आजमाने का सिलसिला शुरु हुआ. हर राजनीतिक दल जनता के लिये काम करने के बजाय चुनाव जीतने के लिये तरह तरह के हथकंडे अपनाता है. जनता के मुद्दों से ध्यान भटकाने में सेलिब्रिटीज का इस्तेमाल सबसे कारगर तरीका साबित हुआ है.

सवाल: दक्षिणी राज्यों में फिल्मी हस्तियों के सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने में कामयाबी को देखते हुये क्या यह माना जा सकता है कि उत्तर भारतीय राज्यों की तुलना में दक्षिणी राज्यों में यह प्रयोग ज्यादा कारगर रहा?
जवाब: यह सही है कि दक्षिणी राज्यों में एम जी रामचंद्रन और एन टी रामाराव से लेकर जयललिता तक तमाम शीर्ष नेता फिल्म जगत से ही राजनीति के शिखर पर पहुंचे. लेकिन उत्तर भारत में राजनीति के शिखर तक पहुंचने के लिये किसी अभिनेता ने दक्षिण भारतीय कलाकारों की तरह कोशिश भी नहीं की. अमिताभ बच्चन या अन्य लोगों ने कोशिश की भी, लेकिन उन्हें उस तरह से कामयाबी नहीं मिली.

सवाल: क्या खेल और फिल्म जगत की हस्तियां महज भीड़ जुटाने का जरिया मात्र होती हैं या ये लोग वास्तव में जनसेवा के लिये राजनीति में आते हैं?
जवाब: भीड़ जुटाने का जरिया बनना या जनसेवा का माध्यम बनना राजनीति में आने वाले व्यक्ति की मंशा पर निर्भर करता है. मेरे नजरिये से, यह बेहद अफसोस की बात है कि कोई राजनीतिक दल या मशहूर हस्ती जनसेवा के मकसद से राजनीति का रुख नहीं करती. दोनों का मकसद लाभ के लिये एक दूसरे का इस्तेमाल करना होता है.

सवाल: क्या यह सच नहीं है कि करियर के ढलान पर राजनीति का रुख करने वाले सिने स्टार, खिलाड़ी सियासत को अपने करियर की दूसरी पारी का जरिया बनाते हैं?
जवाब: इसे दूसरी पारी की शुरुआत कहने से बेहतर है एक नये रोजगार की तलाश कहना. खेल या एक्टिंग के क्षेत्र में काम नहीं मिलने के बाद आसान रास्ते की तलाश में ये लोग राजनीति का रुख करते हैं. यह सही है कि लोकतंत्र में किसी को भी चुनावी राजनीति में आने का अधिकार है. इसलिये किसी को राजनीति में आने से ना तो रोका जा सकता है ना ही रोका जाना चाहिये. ऐसे में मतदाताओं की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे यह सोचें कि जिसे अपना प्रतिनिधि बना रहे हैं, वह उनके लिये कितना हितकारी साबित हो सकता है.