नई दिल्ली. लोकसभा चुनाव के आते ही बिहार में तमाम स्थानीय नेताओं के साथ-साथ बाहरी राज्यों के उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने की चर्चाएं शुरू हो जाती हैं. देश की राजनीति में बड़ी भूमिकाएं निभाने वाले इन ‘बाहरी’ उम्मीदवारों को बिहार से चुनकर संसद में भेजने की लंबी परंपरा रही है. चाहे वह आचार्य जेबी कृपलानी हों या पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर; समाजवादी आंदोलन से उपजे फायरब्रांड लीडर जॉर्ज फर्नांडिस हों या मध्यप्रदेश छोड़कर हमेशा से बिहार को अपनी सियासी जमीन के रूप में देखने वाले शरद यादव. यहां तक कि ‘मीटू’ आंदोलन के कारण केंद्र सरकार में मंत्री पद गंवाने वाले पूर्व कांग्रेसी एमजे अकबर भी ‘बाहरी’ उम्मीदवार के तौर पर ही बिहार के किशनगंज से चुनाव लड़ चुके हैं.

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अंग्रेजी अखबार डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, ‘बाहरी’ नेताओं के साथ बिहार की जनता का सामंजस्य का इतिहास पुराना रहा है. यही वजह है कि इस बार भी नीतीश कुमार द्वारा जदयू से हटाए जाने और बागी होने के बाद शरद यादव फिर से बिहार की मधेपुरा लोकसभा सीट से राजद के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. शरद यादव अब तक 5 बार लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं, इसलिए इस बार उनकी नजर बिहार की जमीन से जीत का ‘सिक्सर’ लगाने पर है. अब यह तो मतदान के बाद ही पता चलेगा कि शरद यादव की उम्मीदें कितना रंग ला पाती हैं. बहरहाल, शरद यादव के बहाने दूसरे राज्यों से बिहार में आकर चुनाव लड़ने वाले नेताओं का इतिहास रोचक रहा है. आइए डालते हैं ऐसे कुछ नेताओं के सियासी सफर पर एक नजर.

आचार्य जेबी कृपलानी
बिहार में आकर लोकसभा का चुनाव लड़ने वाले नेताओं में सबसे पहला नाम स्वतंत्रता आंदोलन के वीर सेनानी रहे आचार्य जेबी कृपलानी का आता है. कृपलानी यूं तो बिहार में पहले से ही सक्रिय रहे थे, लेकिन चुनावी राजनीति में भी उन्होंने अपना एक दशक से ज्यादा का समय बतौर बिहार से सांसद के रूप में बिताया है. महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह के समय भी आचार्य कृपलानी बिहार में  बतौर स्वतंत्रता आंदोलन सेनानी सक्रिय रहे थे. उन्होंने ही मुजफ्फरपुर में महात्मा गांधी की आगवानी की थी. आजादी के बाद 1952 में हुए पहले चुनाव में आचार्य कृपलानी ने भागलपुर संसदीय सीट का प्रतिनिधित्व किया था. वहीं दूसरे आम चुनाव में वे सीतामढ़ी सीट से चुनकर संसद पहुंचे थे. यह गौरतलब है कि आचार्य कृपलानी की पत्नी सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रही हैं.

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पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर
भारतीय राजनीति में ‘युवा तुर्क’ के नाम से जाने गए पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर बलिया, उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे. लेकिन यह बिहार की माटी का ही असर है कि चंद्रशेखर यहां से भी चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे. बोफोर्स आंदोलन की पृष्ठभूमि में हुए वर्ष 1989 के लोकसभा चुनाव में चंद्रशेखर ने दो जगहों से चुनाव लड़ा था. पहला तो उनका परंपरागत क्षेत्र बलिया था, जबकि दूसरी बिहार की महाराजगंज संसदीय सीट थी. कहना न होगा कि महाराजगंज के मतदाताओं ने चंद्रशेखर पर पूरा भरोसा जताया और उन्हें चुनाव में जिताकर संसद भेजा. हालांकि चंद्रशेखर ने चुनाव के बाद महाराजगंज सीट छोड़ दी थी.

जॉर्ज फर्नांडिस
बिहार की धरती से ‘बाहरी’ उम्मीदवार के तौर पर सबसे ज्यादा चर्चित नेताओं में जिनका नाम आता है, वे हैं इमरजेंसी आंदोलन से राजनीति में कदम रखने वाले फायरब्रांड लीडर जॉर्ज फर्नांडिस. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के देशव्यापी विरोध से जन्मा यह समाजवादी नेता बिहार में तो आया तो था बाहरी नेता के तौर पर, लेकिन एक बार यहां आने के बाद वह यहीं का होकर रह गया. बड़ौदा डायनामाइट केस में जेल में बंद जॉर्ज ने वर्ष 1977 का लोकसभा चुनाव मुजफ्फरपुर लोकसभा सीट से लड़ा था. वे यहां से जीते और केंद्र सरकार में मंत्री बने. इसके बाद के वर्षों में जॉर्ज फर्नांडिस बिहार की ही नालंदा लोकसभा सीट से चुनाव जीतते रहे. इसी नालंदा सीट से चुनाव न लड़ पाने और अपनी पार्टी द्वारा नकारे जाने के बाद उनके राजनीतिक जीवन का अंत भी हो गया.

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शरद यादव
मध्यप्रदेश के होशंगाबाद में जन्मे और वहां की ‘संस्कारधानी’ कहे जाने वाले जबलपुर में पढ़े-लिखे शरद यादव ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत गृहराज्य से करनी चाही थी. मगर इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली. हालांकि इमरजेंसी की पृष्ठभूमि में हुए 1977 के आम चुनाव में जनता पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर वे जबलपुर से जीते थे, लेकिन उनका भी राजनीतिक ‘ठौर’ बिहार ही बना. वर्ष 1991 के बाद से शरद यादव बिहार से ही लोकसभा में पहुंचते रहे हैं. पांच बार इसी राज्य से वे सांसद चुने गए. हालांकि लालू प्रसाद यादव से मतभिन्नता के कारण उन्हें मधेपुरा संसदीय सीट से हार का भी सामना करना पड़ा है. इस बार भी सियासी घटनाक्रम ऐसा बदला कि वे अपनी पुरानी पार्टी जदयू के बागी हो गए और अब राजद के टिकट पर मधेपुरा से ही चुनाव लड़ रहे हैं. इस सीट से उनके खिलाफ जदयू, बल्कि जन अधिकार पार्टी के नेता पप्पू यादव चुनावी मैदान में हैं.

एमजे अकबर
मीटू आंदोलन के कारण वर्तमान भाजपानीत एनडीए सरकार से विदेश राज्यमंत्री का पद गंवाने वाले पूर्व पत्रकार एमजे अकबर भी बिहार में ‘बाहरी’ उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ चुके हैं. अंग्रेजी अखबार एशियन एज के संपादक के तौर पर एमजे अकबर कोलकाता (तब कलकत्ता) में कार्यरत हुआ करते थे, जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें बिहार के किशनगंज से चुनाव लड़ने भेजा था. 70 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाली इस लोकसभा सीट से अकबर ने फतह हासिल की और वर्षों तक कांग्रेस के नेता बने रहे. लेकिन बाद के दिनों में उन्होंने भाजपा ज्वाइन कर ली और इसी पार्टी से राज्यसभा के सांसद चुने जाने के बाद वर्तमान सरकार ने उन्हें मंत्रीपद से नवाजा.

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