चंबल (उत्तर प्रदेश): कभी वीरता, कभी बगावत का प्रतीक रहा चंबल बदहाली से बदलाव की राह देख रहा है. सीरत के साथ ही सूरत बदलने की कोशिश का शंखनाद भी कर दिया गया है. और इस बदलाव की नींव बन सकता है ‘चंबल मेनिफेस्टो 2019’, जो जारी कर दिया गया है. ‘चंबल मेनिफेस्टो 2019’ बीहड़ से संसद तक का सफर तय करने वाली फूलन देवी के जालौन स्थित गांव शेखुपुरा गुढ़ा से जारी किया गया है. ये मेनिफेस्टो किसी और ने नहीं बल्कि फूलन देवी की मां मुला देवी के हाथों जारी हुआ है. 2019 चुनाव के चलते सभी राजनैतिक दल अपना मेनिफेस्टो जारी कर रहे हैं. वादों-दावों का दौर में ऐसा पहली बार हुआ है जब सदियों से कई गौरवपूर्ण और स्याह इतिहास को खुद में दफन किए चंबल का मेनिफेस्टो लाया गया है.

अखिलेश से मिलकर बताई थी समस्याएं, फिर भी…
इसी बीच समाजवादी पार्टी ने लोकसभा चुनाव के लिए अपना मेनिफेस्टो जारी कर दिया है. चंबल मेनिफेस्टो बनाने वाले शाह आलम बताते हैं कि कुछ दिन पहले जब वह अखिलेश यादव से मिले थे तब उन्होंने वादा किया था कि चंबल की समस्याओं का समाधान करेंगे. सेना में चंबल रेजिमेंट बनाने की मांग की भी चर्चा हुई थी, लेकिन अखिलेश ने चंबल की बजाय ‘अहीर रेजिमेंट’ को मेनिफेस्टो में शामिल कर लिया. शाह आलम बताते हैं कि हम चंबल घोषणा पत्र के जरिए अपनी मांगें रख रहे हैं. 7 अप्रैल को यूपी की राजधानी लखनऊ में एक बार फिर सपा, बसपा, कांग्रेस, बीजेपी सहित कई और दलों के नेताओं से मिलकर चंबल मेनिफेस्टो सौंपा है. शाह आलम कहते हैं कि सभी दलों को अपने घोषणा पत्र में क्षेत्रीय मुद्दे शामिल करने चाहिए.

फूलन की मां को इसलिये चुना
शाह आलम बताते हैं कि बीहड़ ने बागी, दस्यु से लेकर विधायक, सांसद, सीएम तक दिए लेकिन चंबल की सूरत वैसी ही रही. यहां तक कि कई इलाके ऐसे हैं जहां आज भी पानी तक नदियों से पीया जाता है. ठीक से रोटी, कपड़ा और मकान तो छोडिए यहां पीने का साफ पानी तक मुहैया नहीं है. फूलन की मां भी इस बदहाली का शिकार हैं. बेटी ने बीहड़ से लेकर संसद तक अपनी धमक पहुंचाई लेकिन फूलन की मां दाने-दाने को मोहताज हैं. उन्हें गांव के लोग और सामाजिक संगठन खाना-पीना मुहैया कराते हैं. फूलन की मां मुला देवी ने कहा कि उन्होंने जिस रूप में बचपन से चंबल देखा, उसमें सदियां बीतने के बाद भी बहुत कुछ नहीं बदला है.

मेनिफेस्टो जारी करती फूलन देवी की मां, शाह आलम, कुलदीप बौद्ध, रिहाना मंसूरी व अन्य

शाह आलम बोले- जितना दोहन होना था, हो गया
सैकड़ों लोगों से बात कर चंबल मेनिफेस्टो बनाने वाले एक्टिविस्ट शाह आलम बताते हैं कि चंबल का जितना दोहन हो गया, लेकिन अब नहीं हो. समझने और शोध के लिए चंबल की 2800 किलोमीटर की सायकिल यात्रा कर चुके शाह आलम कहते हैं कि चंबल बड़े बदलाव की राह देख रहा है. सूरत बदलने को वह लगातार प्रयासरत हैं. कई सामाजिक संगठनों, बड़े राजनेताओं से इसके लिए लम्बी बातचीत हुई है. मेनिफेस्टो के दौरान सामाजिक कार्यकर्ता कुलदीप बौध, रिहाना मंसूरी मौजूद रहे.

‘नर्सरी आफ सोल्जर्स’ के नाम से विख्यात है चंबल
‘नर्सरी आफ सोल्जर्स’ के नाम से विख्यात चंबल वह इलाका है जहां के लोग देश के लिए बलिदान हो जाने के जुनून के चलते सबसे ज्यादा संख्या में सेना और अन्य बलों में शामिल होते हैं. इस इलाके में शांति के दिनों में भी किसी न किसी गांव में सरहद पर तैनात किसी जवान को तिरंगे में लपेटकर लाया जाता है. चंबल पुरातात्विक सभ्यता की भी खान है. संसद का चेहरा यहां की इसी महान सभ्यता का मुखौटा है. 900किमी लंबी चंबल के साथ दौड़ते बीहड़ों और जंगलों में क्रांतिकारियों, ठगों, बागियों-डाकुओं के न जाने कितने किस्से दफ्न हैं. चंबल की यह रहस्मयी घाटी हिन्दी सिनेमा को हमेशा लुभाती रही है. लिहाजा इस जमीन को फिल्मलैण्ड कहा जाता है. आजादी के बाद इस पृष्ठभूमि पर बनी तमाम फिल्में सुपरहिट रहीं.

ये हैं मुख्य सुझाव और मांगें
1.चंबल की बुनियादी समस्याओं का अध्ययन और तत्काल निदान के लिए ‘चंबल आयोग’ बनाया जाए.
2. चंबल की ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित कर पर्यटन मानचित्र से जोड़ा जाय और शाम को लाइट एंड शो, सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाएं.
3. चंबल संस्कृति में रची बसी लोकगीतों को आडियो-वीडियों के मार्फत सहेजा जाए.
4. चंबल विशेष पैकेज के तहत ‘चंबल विकास बोर्ड’ का गठन किया जाय और लोकनायक जेपी के सुझावों को जमीन पर उतारा जाए.
5. चंबल में बनाए जा रहे चंबल एक्सप्रेसवे चंबल के लिए और उसकी रवानगी के लिए खतरनाक साबित हो सकता है इसलिए इसे बेहद सावधानी से और स्थानीय लोगों की राय के बाद ही बनाया जाना चाहिए.
6. यहां आज भी व्याप्त मैला धोने की कुप्रथा चल रही है उसे तत्काल बंद कर उचित पुर्नवास किया जाएं.
7. पूल व सड़क और विद्युत से चंबल के बीहड़ में बसे गांवों को जोड़ा जाए.
8. इस फिल्मलैण्ड में ‘चंबल फिल्मसिटी’ का स्थापना की जाय यह जो भी फिल्में बनें उसकी आमदनी का 30 फीसद यहीं के विकास पर खर्च किया जाए.
9. चंबल की गौरवशाली पहचान दुनिया के सामने लाने के लिए यहां के जंग आजादी के शहीदों-क्रांतिकारियों भारतीय सेना के शहीदों को के उनके गांव में उन हुतात्माओं की याद में डिजीटल पुस्तकालय, कालेज खोला जाएं.
10. गरीब भूमिहीनों के लिए कृषि पट्टे आवंतित किये जाएं.
11. दिल्ली सहित तमाम महानगरों में चंबल भवन बनाया जाएं, जिसमें चंबल घाटी से जाकर किसी भी प्रवेश परिक्षा/ नौकरी इंटरव्यू के लिए एक दिन पहले से व्यस्था हो.
12. भारतीय सेना में चंबल रेजीमेंट जो भारतीय संसद में रखा गया था उसे तत्काल अमल में लाया जाए.
13. अरसे से प्रस्तावित परियोजना पचनद बांध बनाकर व नहरे निकाल कर चंबल और बुंदेलखंड को हरा-भरा कर किसानों में खुशहाली लाया जाए.
14. चंबल औषधीय खेती की खान रही है. फिर से चिन्हित कर उन औषधियों का संरक्षण कर औषधीय रिसर्च सेन्टर खोला जाएं.

इन जगहों की भी लिखी गई हैं समस्याएं
इसके साथ ही चंबल में आने वाले यूपी के जालौन, औरैया, इटावा, बाह (आगरा) मध्य प्रदेश के मुरैना, भिंड, राजस्थान के धौलपुर की स्थानीय समस्याओं को ख़त्म करने के लिए कई मांगें लिखी गई हैं. करीब 100 समस्याओं को क्षेत्रवार तरीके से चम्बल मेनिफेस्टो में शामिल किया गया है. अपने आप में तीन राज्यों के कई इलाकों को समेटे मेनिफेस्टो में फूलन देवी के यूपी के जालौन स्थित शेखुपुरा गुढ़ा गांव से लेकर मध्यप्रदेश, राजस्थान के चंबल के विकास के लिए कई सुझाव और समस्याओं को बताया गया है. शिक्षा, रोजगार, सड़क, पानी जैसी कई समस्यायें हैं, जिसके जड़ से समाने से चंबल के लोगों का जीवन स्तर आज भी किसी तीसरी दुनिया के देश के बदहाल इलाके की तरह है. चंबल में फिल्म सिटी बनाने की भी मांग की गई है.