नई दिल्ली: कभी कांग्रेस के ‘चाणक्य’ रहे तो कभी ‘मिस्टर बंटाधार’ कहे गए दिग्विजय सिंह एक बार फिर चुनावी राजनीति में सक्रिय होंगे. कांग्रेस ने उन्हें लोकसभा चुनाव में भोपाल सीट से प्रत्याशी बनाया है. 2003 के बाद से यह पहला मौका होगा, जब दिग्विजय सिंह जनता के बीच पहुंच अपने लिए वोट मांगेंगे. भोपाल सीट जीतना उनके लिए बेहद चुनौतीपूर्ण ज़रूर होगा, लेकिन 2003 में उमा से हारने के बाद राजनैतिक वनवास की घोषणा करने वाले दिग्विजय सिंह ने इस चुनौती को स्वीकार किया है. मध्य प्रदेश के सीएम कमलनाथ ने कुछ दिन पहले कहा था कि दिग्विजय सिंह को किसी कठिन सीट से चुनाव लड़ना चाहिए. किसी ऐसी सीट को चुनना चाहिए, जो चुनौतीपूर्ण हो.

2003 के बाद दिग्विजय सिंह का सफर बेहद उतार चढ़ाव वाला रहा है. 2003 के बाद से वह लगातार पार्टी और मध्य प्रदेश के लिए अप्रासंगिक रहे. उनकी अहमियत कम होती गई. कुछ माह पहले हुए मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई, लेकिन प्रचार के दौरान न तो पार्टी ने उन्हें बहुत अधिक अहमियत दी और न ही वह सीधे तौर पर सामने आए. हालांकि ये ज़रूर माना जाता है कि नर्मदा यात्रा व पूरे चुनाव के दौरान उन्होंने पार्टी के लिए परदे के पीछे जो किया, उसका भी कांग्रेस की वापसी में योगदान रहा.

दो बार रहे मध्य प्रदेश के सीएम
दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं. साल 1993 में वह पहली बार मुख्यमंत्री बने थे. इसके बाद वह 1998 में भी कांग्रेस की सरकार बनाने में कामयाब हो गए थे. साल 2003 के चुनाव में उमा भारती ने दिग्विजय सिंह को मात दी. यह साल दिग्विजय सिंह की राजनीति के लिए सबसे खराब साबित हुआ. चुनाव प्रचार के दौरान ही दिग्विजय सिंह ने कहा था कि यदि उमा भारती चुनाव जीत गईं तो वह 10 साल तक चुनाव नहीं लड़ेंगे और और हुआ भी कुछ ऐसा ही.

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2003 में बुरी तरह हारने पर लिया था संकल्प
वर्ष 2003 के विधानसभा चुनावों में जब मध्य प्रदेश में दिग्विजय के नेतृत्व में कांग्रेस की हार हुई और वह 230 सीटों वाली विधानसभा में केवल 38 सीटों पर सिमट गई तो दिग्विजय सिंह ने एलान किया कि वे अगले एक दशक तक कोई चुनाव नहीं लड़ेंगे और न ही प्रदेश की राजनीति में दख़ल करेंगे. 2013 में उनका स्वघोषित 10 साल का वनवास ख़त्म हुआ तो उन्होंने कहा कि पार्टी अगर उन्हें लोकसभा के चुनाव में उतारना चाहेगी तो वे उतरेंगे. हालांकि, उन्हें तब लोकसभा का टिकट नहीं मिला था लेकिन 2014 में पार्टी ने उन्हें राज्यसभा का टिकट ज़रूर दे दिया था. वह राज्यसभा सांसद बन गए, लेकिन सक्रिय राजनीति से दूर रहे या दूर रखा गया.

2018 में सक्रिय हुए, लेकिन परदे के पीछे ही रहे
ऐसे में दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश की राजनीति से कट गए, लेकिन देश की राजनीति में वह कुछ हद तक सक्रिय रहे. कांग्रेस महासचिव रहने के दौरान उन्हें कई राज्यों की जिम्मेदारी मिली. केंद्रीय राजनीति में भी दिग्विजय की भूमिका तब पूरी तरह से ख़त्म हो गई जब उन्हें पार्टी के नवनिर्वाचित अध्यक्ष राहुल गांधी की एआईसीसी में महासचिव के पद से हटा दिया गया था और आंध्र प्रदेश का भी प्रभार ले लिया गया था. 2014 लोकसभा चुनाव में दिग्विजय सिंह की भूमिका न के बराबर रही. साल 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले सबकी निगाह दिग्विजय सिंह पर टिकी हुई थी. कांग्रेस ने न तो सीधे तौर पर उनसे प्रचार करने को कहा, न ही चुनाव के लिए उन्हें कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई थी. दिग्विजय परदे के पीछे रहे. विधानसभा चुनाव से पहले 3000 किलोमीटर लम्बी नर्मदा यात्रा की. राज्य के बड़े हिस्से से उनकी यात्रा गुजरी, लेकिन इस बीच न तो कोई राजनैतिक बयान दिया और न ही ऐसा कोई प्रयास करते दिखे.

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अब कांग्रेस ने जताया भरोसा, चुनौती होगा चुनाव जीतना
माना जाता है कि तब उन्होंने परदे के पीछे रहकर शिवराज सरकार की नाकामियों का पूरा डेटा तैयार किया. यात्रा के दौरान उन्हें लोगों ने अपनी परेशानियों से अवगत कराया तो कई लोगों ने राज्य सरकार के भ्रष्टाचार के सबूत दिए थे. माना जाता है कि इस तरह से दिग्विजय ने परदे के पीछे रहकर ही कांग्रेस की मध्य प्रदेश की सत्ता में लंबे समय बाद वापसी कराई. अपने बयानों के कारण विवादों में रहकर पार्टी को भी मुश्किल में डालने वाले दिग्विजय सिंह के लिए 15 साल बाद ये पहला मौका है जब कांग्रेस ने एक बार फिर चुनाव में उतार भरोसा दिखाया है. इस भरोसे पर खरा उतरना दिग्विजय सिंह के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण होगा. भोपाल से इस समय बीजेपी के आलोक संजर सांसद हैं. भोपाल सीट पर बीजेपी की मजबूत सीट मानी जाती है. इस सीट पर पिछले 30 साल से भाजपा का कब्जा है. यह सीट भाजपा ने वर्ष 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से छीनी थी और तब से लेकर अब तक इस सीट पर आठ बार चुनाव हुए हैं और आठों बार भाजपा ने कांग्रेस के प्रत्याशियों को हराया है.