नई दिल्ली. भारतीय लोकतंत्र की विशेषता है कि एक तरफ जहां भाजपा के दिग्गज नेता 91 वर्षीय लालकृष्ण आडवाणी लगातार 6 बार लोकसभा चुनाव जीतने के बाद भी 2019 के चुनाव में टिकट पाने से वंचित रह गए हैं. वहीं, उत्तर प्रदेश में एक ‘योद्धा’ आडवाणी से लगभग 30 साल छोटा होते हुए भी अपने जीवन का 88वां चुनाव लड़ने जा रहा है. जी हां, लोकतंत्र के चुनावी रण के इस योद्धा का नाम है हसनुराम अंबेदकरी (Hasanuram Ambedkari). हसनुराम 62 साल के हैं और अभी तक 80 से ज्यादा चुनाव लड़ चुके हैं. निकाय चुनाव हो या विधानसभा चुनाव या फिर लोकसभा ही क्यों न हो, हसनुराम अंबेदकरी ने सभी में भाग लिया है. यह और बात है कि आज तक उन्हें किसी भी चुनाव में सफलता नहीं मिल पाई है. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में हसनुराम एक बार फिर खम ठोंककर खड़े हैं. इस बार वे यूपी की आगरा और फतेहपुर सीकरी संसदीय सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ने वाले हैं.

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आपको बता दें कि यूपी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर भी फतेहपुर सीकरी संसदीय सीट से ही लोकसभा के चुनावी मैदान में किस्मत आजमा रहे हैं. इन्हीं राज बब्बर को चुनावी टक्कर देने के लिए इस बार हसनुराम ने कमर कस रखी है. ऑल इंडिया बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज इम्प्लायीज फेडरेशन यानी बामसेफ के सदस्य रहे हसनुराम वर्ष 1985 से चुनाव लड़ रहे हैं. अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार, अंबेदकरी हर चुनाव में बतौर निर्दलीय उम्मीदवार नामांकन पर्चा भरते हैं. अखबार के साथ बातचीत में उन्होंने बताया कि वे डॉ.भीमराव अंबेदकर की विचारधारा से प्रभावित हैं, और इन्हीं विचारों के प्रसार के लिए चुनाव मैदान में उतरते हैं. 1985 से चुनाव लड़ रहे अंबेदकरी इस बार अपने जीवन का 88वां चुनाव लड़ रहे हैं.

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बीते सोमवार को फतेहपुर सीकरी संसदीय सीट से नामांकन पर्चा भरने के बाद अंबेदकरी ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, ‘फतेहपुर सीकरी संसदीय सीट से मेरा नामांकन पर्चा स्वीकार कर लिया गया है. अगले दिन आगरा सीट से मैं नामांकन पत्र दाखिल करूंगा.’ उन्होंने बताया कि दोनों सीटों पर उनके समर्थकों की अच्छी-खासी तादाद है, जो उन्हें चुनाव में वोट देंगे. हसनुराम अंबेदकरी ने बताया कि यह चुनाव उनका आठवां लोकसभा चुनाव है, जिसमें वे बतौर उम्मीदवार उतर रहे हैं. 1989 में हुए लोकसभा चुनाव में अंबेदकरी ने फिरोजाबाद सीट से चुनाव लड़ा था, जिसमें उन्हें 36 हजार वोट मिले थे. अखबार के साथ बातचीत में उन्होंने कहा, ‘मैं इस बात की फिक्र नहीं करता कि मेरे विरोध में कौन उम्मीदवार है. यह मतदाताओं पर है कि वे बाबा साहेब के विचारों पर कितना भरोसा करते हैं.’

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हसनुराम अंबेदकरी ने न सिर्फ लोकसभा, बल्कि विधानसभा, जिला पंचायत, ग्राम पंचायत, ब्लॉक प्रमुख, वार्ड मेंबर और कोऑपरेटिव सोसाइटी के चुनावों में भी भाग लिया है. यहां तक कि वर्ष 1988 में उन्होंने भारत के राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव में भी नामांकन पर्चा भरा था, लेकिन वह खारिज हो गया. खेतों में और भवन निर्माण कार्यों में मजदूरी कर जीवन यापन करने वाले अंबेदकरी ने अखबार के साथ बातचीत में कहा कि उनकी औपचारिक शिक्षा नहीं हुई है. इसके बावजूद वे हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी बोल सकते हैं. आगरा के रामनगर नगला दूल्हेखान खेरागढ़ के रहने वाले अंबेदकरी के 10 बच्चे हैं. इनमें से पांच बेटियों की शादी हो चुकी है, जबकि पांचों बेटे अपने स्तर से जीवन यापन कर रहे हैं.

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टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ बातचीत में अंबेदकरी ने बताया कि बामसेफ में रहते हुए उन्होंने बसपा के लिए भी सालों तक मेहनत की है. उन्होंने बताया, ‘बामसेफ का मैं समर्पित कार्यकर्ता रहा हूं. इसी संगठन के साथ रहकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की जड़ें जमाने में भी मैंने मेहनत की है. वर्ष 1985 में मैंने फिरोजाबाद विधानसभा सीट से चुनाव टिकट की भी मांग की थी, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण मैं पिछड़ गया. बसपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने मेरी गरीबी का मजाक उड़ाते हुए मुझे चुनावी टिकट से महरूम कर दिया. यह बहुत आहत करने वाली बात थी. इसके बाद से ही मैं किसी दल के साथ न रहकर निर्दलीय चुनाव लड़ रहा हूं.’ अंबेदकरी को इस बात का काफी दुख है कि बसपा के लिए जी-जान से मेहनत करने के बावजूद उन्हें पार्टी में महत्व नहीं दिया गया. बहरहाल, आने वाले लोकसभा चुनाव का परिणाम क्या होगा, इससे बेफिक्र हसनुराम अंबेदकरी पूरी निष्ठा के साथ लोकतंत्र के इस महापर्व को मनाने में जुट गए हैं.

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