नई दिल्ली. भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान बीते मंगलवार को कोलकाता में काफी बवाल हुआ. लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण के मतदान से पहले राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और भाजपा कार्यकर्ताओं की भिड़ंत के दौरान आगजनी, पथराव और मारपीट की खबरें हैं. कोलकाता के कॉलेज स्ट्रीट में हुई हिंसा के दौरान विद्यासागर कॉलेज में मशहूर समाज सुधारक ईश्वरचंद्र विद्यासागर की प्रतिमा भी तोड़ दी गई. पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी घटना के बाद विद्यासागर कॉलेज पहुंचीं.

तृणमूल कांग्रेस ने बवाल के लिए भाजपा कार्यकर्ताओं की निंदा की, वहीं भाजपा ने घटना के लिए टीएमसी समर्थकों को दोषी ठहराया. इस सबके बीच ममता बनर्जी ने घटना को लेकर अपना विरोध प्रकट करते अपने टि्वटर हैंडल पर प्रोफाइल फोटो बदल ली है. उन्होंने और उनकी पार्टी के ऑफिशियल टि्वटर हैंडल पर ईश्वरचंद्र बंद्योपाध्याय की तस्वीर दिख रही है. ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि कौन थे ईश्वरचंद्र विद्यासागर, जिनकी प्रतिमा टूटने को लेकर ममता बनर्जी अपना विरोध प्रकट कर रही हैं.

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1- बंगाल के वीरसिंह गांव में 26 सितंबर 1820 को जन्मे ईश्वरचंद्र बंद्योपाध्याय (बनर्जी) बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के माने जाते थे.

2- मेधावी बुद्धि के ईश्वरचंद्र विद्यासागर के बारे में कहा जाता है कि एक बार जो चीज वे पढ़ लेते थे, उसे कभी भूलते नहीं थे. पिछले करीब दो सौ वर्षों से बंगाल में बच्चों को ईश्वरचंद्र विद्यासागर की लिखी पुस्तक ‘वर्ण परिचय’ से ही अक्षर ज्ञान मिल रहा है.

3- उनकी विधिवत शिक्षा संस्कृत में हुई थी, लेकिन अंग्रेजी विषय पर भी उनकी पकड़ गहरी थी. उन्होंने संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी में विभिन्न विषयों पर 50 पुस्तकों की रचना की.

4- वर्ष 1880 में संस्कृत के विद्वानों ने उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें विद्यासागर की उपाधि से सम्मानित किया था.

5- ईश्वरचंद्र विद्यासागर का अधिकांश समय शिक्षक के रूप में बीता. वे पहले फोर्ट विलियम कॉलेज और उसके बाद संस्कृत कॉलेज में शिक्षक रहे. इस कॉलेज में वे लंबे अर्से तक प्रिंसिपल भी रहे.

6- उन्होंने बंगाल में कुछ समय के लिए स्कूल इंस्पेक्टर के पद पर भी काम किया. इस दौरान राज्य में स्कूलों का बहुत प्रसार हुआ. खासकर महिलाओं के लिए अलग से स्कूल खोले गए.

7- ईश्वरचंद्र विद्यासागर का नाम बंगाल के समाज सुधारकों में अग्रणी रूप से लिया जाता है. नौकरी से अवकाश लेने के बाद भी उन्होंने महिलाओं की स्थिति सुधारने की ओर विशेष ध्यान दिया.

8- बंगाल में उस समय विधवाओं की स्थिति बड़ी खराब थी. ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने शास्त्रों के प्रमाण देकर विधवा विवाह का समर्थन किया. यह तत्कालीन समाज के लिए क्रांतिकारी कदम कहा गया.

9- विधवा विवाह का समर्थन करने पर पुरातनपंथियों ने जब विद्यासागर का विरोध किया तो उन्होंने अपने एकमात्र बेटे का विवाह एक विधवा से कराकर समाज के सामने नजीर पेश की.

10- ईश्वरचंद्र विद्यासागर की साहित्य पर गहरी पकड़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्वयं गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर ने भी विद्यासागर की रचनाओं को आदर्श बताया है. वर्ष 1891 में उनका निधन हो गया.