नई दिल्लीः लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Chunav) में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए को मिली जबर्दस्त जीत ने कई नए इतिहास बना दिए हैं. इसमें एक सबसे मजेदार चीज यह है कि इस बार भी लोकसभा में आधिकारिक रूप से ‘नेता प्रतिपक्ष’ के पद पर कोई नेता नहीं होगा. ऐसा संभवतः भारत के संसदीय इतिहास में पहली बार होगा जब लगातार दो लोकसभा में कोई नेता प्रतिपक्ष नहीं होगा. सदन में नेता प्रतिपक्ष का पद कैबिनेट मंत्री के समकक्ष का होता है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस पद को काफी अहम माना जाता है. इस संवैधानिक पद का मकसद सरकार के कामकाज पर नजर रखना और जनता की आवाज बनकर सरकार से सवाल करना है.

संवैधानिक व्यवस्था के तहत इस पद पर नियुक्ति के लिए प्रमुख विपक्षी दल के पास सदन की कुल सदस्यता का कम से कम 10 फीसदी सदस्य होना चाहिए. मौजूदा लोकसभा में कुल 542 सीटें हैं. ऐसे में नेता प्रतिपक्ष का पद हासिल करने के लिए कांग्रेस के पास कम से कम 55 सदस्य होने चाहिए थे लेकिन उसे केवल 52 सीटें ही मिली हैं. हालांकि चुनाव पूर्व गठबंधन में यूपीए को 90 सीटें मिली हैं. ऐसे में यह लोकसभा स्पीकर पर निर्भर करेगा कि वह किसी एक दल की जगह गठबंन को आधार बनाकर यूपीए को नेता प्रतिपक्ष का पद देते हैं या नहीं.

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गौरतलब है कि मौजूदा लोकसभा में कोई नेता प्रतिपक्ष नहीं था. 2014 में भाजपा की शानदार जीत की आंधी में कांग्रेस को केवल 44 सीटें ही मिली थीं. वैसे सदन में वह सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी थी लेकिन उसके पास 55 से कम सीटें थीं इसलिए नेता प्रतिपक्ष का पद नहीं मिला. इससे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में लोकसभा में कोई नेता प्रतिपक्ष नहीं थी. दूसरी बार 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद बनी राजीव गांधी की सरकार में भी कोई नेता प्रतिपक्ष नहीं था. उस वक्त राजीव के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी को 404 से अधिक सीटें मिली थीं. हालांकि बाद में टीडीपी के नेता को नेता प्रतिपक्ष की लिए जरूरी सीटों से तीन कम सीट मिलने के बाद भी यह पद दे दिया गया.