मधुबनी. बिहार की मधुबनी लोकसभा सीट पर लोकसभा चुनाव के पांचवें चरण में आगामी 6 मई को मतदान होना है. मिथिलांचल की इस सीट पर पिछले दो चुनावों में भाजपा लगातार विजेता बनती रही है. हुकुमदेव नारायण यादव यहां से वर्ष 2009 और 2014 में चुनाव जीते. इस बार भाजपा ने उनके बेटे अशोक कुमार यादव को मधुबनी सीट से चुनाव मैदान में उतारा है. देश के मौजूदा सियासी हालात और बिहार में विभिन्न दलों के बीच बने समीकरण को देखते हुए भाजपा को इस सीट से हैट्रिक लगाने की उम्मीद है. वहीं, महागठबंधन की तरफ से मधुबनी सीट मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी को अलॉट हुई है. पार्टी के उम्मीदवार बद्री पूर्वे यहां पर अशोक यादव को चुनौती दे रहे हैं. इस बीच कांग्रेस के दिग्गज नेता शकील अहमद ने मधुबनी की सियासी जमीन में हलचल पैदा करते हुए यहां से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नामांकन दाखिल कर दिया है.

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शकील अहमद यहां से कई बार सांसद रह चुके हैं. वे भाजपा के मौजूदा सांसद हुकुमदेव नारायण यादव को पहले के चुनावों में हरा भी चुके हैं. मधुबनी लोकसभा क्षेत्र में रहने वाले विभिन्न जाति और समुदायों के मतदाताओं के बीच उनकी गहरी पकड़ रही है. वहीं, देश के मौजूदा हालात में जिस तरह हिंदू-मुस्लिम, राम मंदिर, आतंकवाद और राष्ट्रवाद के मुद्दे गर्माए हुए हैं, इनके बरक्स महागठबंधन को उम्मीद है कि बिहार में भाजपा विरोधी मत उनके खाते में ही जाएगा. ऐसे में यह कहना गलत न होगा कि एक तरफ जहां भाजपा मधुबनी से हैट्रिक लगाने की उम्मीद कर रही है, वहीं महागठबंधन को भी यहां ‘चमत्कार’ की उम्मीद है. बहरहाल, इन उम्मीदों का परिणाम क्या होगा, यह तो 23 मई को मतगणना के बाद ही पता चल पाएगा.

हिंदू-मुस्लिम वाले बयान से वोटरों को तकलीफ
मधुबनी लोकसभा सीट के मौजूदा हालात बताते हैं कि यहां मतदाताओं के बड़े वर्ग में सरकार के काम-काज की परख तो है, लेकिन लोग नेताओं के बयानों से भी आहत हैं. भवानीपुर के 80 वर्षीय बुजुर्ग सलामत हुसैन और अहमदा गांव के युवा अमित कुमार राम कहते भी हैं, ‘हिन्दू-मुस्लिम करने से विकास कार्य दब जाते हैं और जब काम किया है तो डरना क्या ?’ यह टिप्पणी सलामत या अमित की ही नहीं बल्कि केवटी, विस्फी से लेकर मधुबनी के एक बड़े वर्ग की है. इनका कहना है कि सड़क, बिजली और शिक्षा सुधार के क्षेत्र में बहुत काम हुआ है और ऐसे में नेताओं को हिन्दू मुस्लिम संबंधी बयानों से बचना चाहिए.

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मधुबनी का भवानीपुर क्षेत्र कवि कोकिल विद्यापति की कर्मस्थली और उगना महादेव मंदिर के लिए विख्यात है. भवानीपुर के 80 वर्षीय बुजुर्ग सलामत हुसैन और मोहम्मद चांद कहते हैं, ‘‘काम तो हुआ है. स्कूल में अच्छी पढ़ाई हो रही है, उगना रेलवे हॉल्ट बन गया है, सड़क भी अच्छी है. अब तो पीने के पानी का टैंक भी बन गया है. लेकिन नेता लोग ‘हिन्दू-मुस्लिम’ करके सब खराब कर रहे हैं. जब काम किया है तो किस बात का डर. काम के आधार पर वोट मांगिए, हिन्दू-मुस्लिम नहीं करिए.’ अहमदा गांव के अमित कुमार राम भी कहते हैं, ‘हमारे क्षेत्र में बहुत काम हुआ है. लेकिन हिन्दू-मुस्लिम करने से काम दब जाता है.’ मधुबनी में ग्रामीण इलाकों में मुसलमानों का एक बड़ा तबका चाहता है कि राम मंदिर मुद्दे का जल्द समाधान निकाला जाना चाहिए. अहमदा गांव के अली हसन कहते हैं, ‘अगर समाधान अदालत से ही हो तो भी इसका रास्ता निकलना चाहिए.’’

सियासी ऊंट किस करवट बैठेगा
शकील अहमद इस सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन महागठबंधन में यह सीट वीआईपी पार्टी के खाते में चली गई. महागठबंधन के उम्मीदवार का हवाला देते हुए शकील अहमद ने कहा कि प्रत्याशी कमजोर है और वह राजग के अशोक कुमार यादव को रोक नहीं पाएगा. इसलिए मधुबनी के लोगों ने उनसे यहां से चुनाव लड़ने का आग्रह किया. उन्होंने यह भी कहा कि सुपौल में जो राजद ने किया, उसी तरह कांग्रेस को भी यहां से अपने प्रत्याशी को समर्थन देना चाहिए. इस बीच राजद नेता अली अशरफ़ फ़ातमी ने भी इस सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई, पर पार्टी ने संज्ञान नहीं लिया. हालांकि फातमी ने बाद में अपना नाम वापस ले लिया, लेकिन उनके बागी तेवर में कमी नहीं आई है.

चुनावी विश्लेषकों का कहना है कि महागठबंधन की दो प्रमुख पार्टियों कांग्रेस और राजद के इन दो कद्दावर नेताओं के बागी तेवर से भाजपा उम्मीदवार को फायदा होने की उम्मीद है. मधुबनी सीट पर सवर्ण मतदाताओं के लिए ‘मोदी फैक्टर’ अहम है. विस्फी के ललित कुमार झा कहते हैं, ‘प्रत्याशी हमारे लिए कोई मायने नहीं रखता, हम तो मोदी के नाम पर वोट देंगे.’ जितवारपुर के श्रवण कुमार भी प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर ही वोट देने की बात करते हैं. इस सीट पर यादव और मुस्लिम मतदाताओं की अच्छी खासी संख्या है और चुनाव परिणाम पर ब्राह्मण एवं अति पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं का गहरा असर रहता है.

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कम्युनिस्टों का गढ़ भी रहा है मधुबनी
मधुबनी बिहार के दरभंगा प्रमंडल का एक प्रमुख शहर एवं जिला है. दरभंगा और मधुबनी को मिथिला संस्कृति का केंद्र माना जाता है. मैथिली तथा हिंदी यहां की प्रमुख भाषाएं हैं. विश्व प्रसिद्ध मिथिला पेंटिंग एवं मखाना की पैदावार की वजह से मधुबनी की एक अलग पहचान है. मखाना की खेती करने वाले किसान भूजल स्तर गिरने और मखाना की कम कीमत मिलने की समस्या से परेशान हैं. उनका कहना है कि जल संकट की वजह से मखाना का उत्पादन प्रभावित हो रहा है. सुव्यवस्थित बाजार न होने के कारण उचित दाम भी नहीं मिल रहा है. गौरतलब है कि 1952 से 1976 तक मधुबनी जिले के तहत दो सीटें दरभंगा पूर्व और जयनगर सीट थी. 1976 में परिसीमन के बाद झंझारपुर और मधुबनी सीट बनी.

दरभंगा पूर्व सीट पर हुए पहले चुनाव में और फिर 1957 में कांग्रेस के अनिरुद्ध सिन्हा जीते थे. 1962 के चुनाव में इस सीट से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के योगेंद्र झा सांसद चुने गए. 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के शिव चंद्र झा सांसद बने. 1971 में कांग्रेस ने इस सीट से जगन्नाथ मिश्रा को उतारा. वह जीते और बाद में बिहार के मुख्यमंत्री भी बने. जयनगर सीट पर 1952 में कांग्रेस के श्याम नंदन मिश्रा, 1957 में कांग्रेस के यमुना प्रसाद मंडल, 1967 और 1971 के चुनाव में सीपीआई के भोगेन्द्र झा चुनाव जीते.

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1976 में परिसीमन हुआ और मधुबनी सीट बनी. 1977 में इस सीट से चौधरी हुकुमदेव नारायण यादव जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव जीते. 1980 में यहां से कांग्रेस के शफ़ीकुल्ला अंसारी जीते, लेकिन 4 महीने बाद ही उनका निधन हो गया. मई 1980 में यहां फिर चुनाव हुए और सीपीआई के भोगेंद्र झा जीते. 1984 में यहां से कांग्रेस के मौलाना अब्दुल हन्ना अंसारी जीते. 1989 और 1991 के चुनाव में इस सीट से सीपीआई के टिकट पर फिर भोगेंद्र झा जीते. भोगेन्द्र झा ने इस सीट पर पांच बार चुनाव जीतने का गौरव हासिल किया. 1996 में सीपीआई के चतुरानन मिश्र जीते. 1998 और 2004 के चुनाव में कांग्रेस के शकील अहमद ने यहां बाजी मारी. 1999, 2009 और 2014 के चुनाव में यहां से भाजपा के हुकुमदेव नारायण यादव जीते. आपको बता दें कि मधुबनी संसदीय क्षेत्र के तहत विधानसभा की 6 सीटें हरलाखी, बेनीपट्टी, बिस्फी, मधुबनी, केवटी और जाले आती है. 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में इनमें से तीन सीटें राजद ने, एक भाजपा ने, एक कांग्रेस ने और एक सीट रालोसपा ने जीती थी.

(इनपुट – एजेंसी)

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