कोतवाली (मालदा): मालदा में अपने पैतृक घर में बैठी मौसम नूर बताती हैं कि तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने का “फैसला काफी मुश्किल” था. नूर जब ये कहती हैं तो इसकी वजह भी है क्योंकि वह वरिष्ठ कांग्रेसी नेता रहे गनी खान चौधरी की भतीजी हैं. चौधरी ने आठ बार इस संसदीय सीट का प्रतिनिधित्व किया है, लेकिन नूर कहती हैं कि उन्हें कोई मलाल नहीं है. नून गनी खान के परिवार के उन तीन लोगों में शामिल हैं जो इस बार अलग-अलग पार्टियों के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. उनके चचेरे भाई और मालदा उत्तर क्षेत्र की सुजापुर विधानसभा सीट से मौजूदा विधायक ईशा खान, नूर के खिलाफ कांग्रेस की टिकट से चुनाव लड़ रहे हैं.

नूर के चाचा और ईशा खान के पिता अबु हाशिम चौधरी मालदा-दक्षिण सीट से तीन बार से सांसद हैं और एक बार फिर यहां से चुनाव लड़ रहे हैं. पिता-पुत्र दोनों ही गनी खान की विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश में लगे हैं जिनके निधन के एक दशक बाद भी यहां के मतदाताओं पर उनका प्रभाव नजर आता है. नूर के अपने चचेरे भाई के खिलाफ लड़ने के फैसले के बाद पैतृक घर में एक दीवार खड़ी की गई, जो यहां आने वालों के लिये संदेश थी कि परिसर में घुसने से पहले यह तय कर लें कि उन्हें किधर जाना है.

दीवार के पास करीने से कुर्सियां लगी हुई हैं और दीवार पर गनी खान और उनकी बहन रूबी नूर, मौसम नूर की मां, की बड़ी तस्वीरें लगी हुई हैं. परिवार के एक वफादार ने कहा कि आगंतुकों को पहले ही यह ताकीद कर दी जाती है कि एक पुरानी कुर्सी पर न बैठें, “कभी गनी खान इस पर बैठा करते थे”. इसी वफादारी के भरोसे कांग्रेस को उम्मीद है कि वह मालदा क्षेत्र में दो सीटें हासिल करेगी. नूर ने कांग्रेस के टिकट पर 2014 में मालदा उत्तर सीट से जीत हासिल की थी. उन्होंने इस साल जनवरी में तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया था.

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पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से करीब 350 किलोमीटर दूर मालदा दशकों से कांग्रेस का गढ़ रहा है. नूर के तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने के बाद परिसर को बांटते हुए दीवार खड़ी की गई है जहां कभी गनी खान अपने समर्थकों से मिलते थे और उन्हें उनके साथ होने का भरोसा देते थे. सियासत में पारिवारिक विवाद नई बात नहीं हैं. लेकिन यह दीवार कांग्रेस के लिये एक युग के अंत का संकेत हो सकती है जो चार दशकों से दो संसदीय क्षेत्रों मालदा (उत्तर, दक्षिण) के लिये गनी खान के नाम पर वोट मांग रही थी.

कांग्रेस कार्यकर्ताओं को डर है कि नूर की वजह से मुस्लिम मतों का विभाजन हो सकता है, जो परंपरागत रूप से परिवार के साथ खड़े रहे हैं और पूर्व के चुनावों में निर्णायक रहे हैं. नूर ने बताया, “यह एक मुश्किल विकल्प था. एक मुश्किल फैसला था. मैंने अपने समर्थकों, सलाहकारों और यहां तक कि अपने परिवार के साथ विचार-विमर्श के बाद यह फैसला किया. यह ऐसी स्थिति थी जब मुझे लगा कि भाजपा का मुकाबला करने का एकमात्र तरीका विपक्ष का गठबंधन बनाना था. लेकिन यह नहीं हुआ.” उन्होंने कहा, “एक मात्र अगला उपलब्ध विकल्प तृणमूल कांग्रेस में शामिल होना था क्योंकि सिर्फ दीदी (मुख्यमंत्री ममता बनर्जी) यहां हो रहे धार्मिक ध्रुवीकरण को रोकने में सक्षम हैं.” उन्होंने कहा कि यही वजह है कि उन्हें अपने फैसले पर “खेद” नहीं है.

परिवार को लेकर क्या है? क्या उनके फैसले ने गनी खान के परिवार को बांट दिया? नूर ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने के उनके फैसले से ईशा या चाचा के साथ उनके व्यक्तिगत रिश्तों पर असर नहीं पड़ा है. वह सही हो सकती हैं. ईशा खान की पत्नी नूर के बच्चों की देखभाल करती हैं. जब संवाददाता पैतृक घर पर पहुंची तो नूर की भाभी परिसर में साइकिल चला रहे उनके बच्चों का ध्यान रख रही थीं. लेकिन मतदाताओं की राय थोड़ी जुदा है और उनमें से कई नूर के कांग्रेस छोड़ने के फैसले के पीछे स्वार्थ देखते हैं. ईशा खान से मिलने आए जमरूल ने परिवार में विभाजन से निराशा व्यक्त करते हुए कहा, “ये दीवार मुझे परेशान करती है. सालों तक यह इमारत सुरक्षा, हिफाजत और निरंतरता के लिये खड़ी रही है. ये अब नहीं रहा. वह ऐसा कैसे कर सकती हैं? इससे मुस्लिम मत बंट सकता है जिसका फायदा भाजपा को होगा.”