इसे कहते हैं मोदी लहर, 34 साल तक किया एकक्षत्र राज, अब उम्मीदवारों की जमानत बचाने की हैसियत नहीं

माकपा के जाधवपुर से उम्मीदवार बिकास रंजन भट्टाचार्य ही जमानत बचाने लायक वोट हासिल करने में कामयाब रहे.

Updated: May 24, 2019, 4:36 PM IST

नई दिल्लीः करीब एक दशक पहले तक लेफ्ट का गढ़ माने जाने वाले पश्चिम बंगाल में मोदी लहर का अनुमान इसी रिपोर्ट से लगाया जा सकता है कि लोकसभा चुनाव में सिर्फ एक उम्मीदवार को छोड़कर वाम दलों के बाकी सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई है. आयोग द्वारा घोषित चुनाव परिणाम के मुताबिक माकपा के जाधवपुर से उम्मीदवार बिकास रंजन भट्टाचार्य ही जमानत बचाने लायक वोट हासिल करने में कामयाब रहे. वहीं, भाकपा के किसी उम्मीदवार की जमानत नहीं बच सकी.

उल्लेखनीय है कि लोकसभा चुनाव में प्रत्येक उम्मीदवार को जमानत राशि बचाने के लिये कुल पड़े मतों का कम से कम 16 प्रतिशत मत प्राप्त करना अनिवार्य है. निर्वाचन नियमों के तहत सामान्य वर्ग के उम्मीदवार के लिये जमानत राशि 25 हजार रुपये निर्धारित है. वहीं अनुसूचित जाति के उम्मीदवार के लिये 12500 और अनुसूचित जनजाति उम्मीदवार के लिए पांच हजार रुपये निर्धारित है.

पश्चिम बंगाल में 2011 तक 34 साल सत्ता में रहे वाम दलों के लिए माकपा के वरिष्ठ नेता मोहम्मद सलीम की जमानत जब्त होना सबसे चौंकाने वाला रहा. रायगंज से सांसद रहे सलीम को महज 14.25 प्रतिशत वोट मिल सके. जमानत गंवाने वाले माकपा के अन्य प्रमुख उम्मीदवारों में दमदम से नेपालदेब भट्टाचार्य, मुर्शिदाबाद के मौजूदा सांसद बदरुद्दोजा खान और दक्षिणी कोलकाता से उम्मीदवार नंदिनी मुखर्जी शामिल है. पश्चिम बंगाल में वाम दलों का पिछले छह दशक में यह सबसे खराब चुनावी प्रदर्शन है.

इस चुनाव में माकपा और भाकपा को मिलाकर सिर्फ पांच उम्मीदवार ही जीत सके हैं. इनमें चार तमिलनाडु और एक केरल से शामिल है. माकपा को तमिलनाडु में दो और केरल में एक तथा भाकपा को तमिलनाडु में दो सीट मिली है.

वाम दल तमिलनाडु में द्रमुक की अगुवाई वाले गठबंधन का हिस्सा थे. वामदलों के लिये 1952 के बाद यह पहला मौका है जब लोकसभा में इनकी संख्या सिर्फ एक अंक में ही सिमट कर रह गयी हो. मौजूदा लोकसभा में वामदलों की 12 सीट थी. वामदलों को 2004 के लोकसभा चुनाव में सर्वाधिक 59 सीट मिली थी.

(इनपुट भाषा)

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