कुछ नेता अपनी अलग तरह की पॉलिटिक्‍स और कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं. मोदी सरकार में मंत्री नितिन गडकरी की छवि कुछ ऐसी ही दिखती है. अक्‍सर उनके बयानों और राजनीति को लेकर परिभाषाएं गढ़ने की कोशिश हो रही है. लेकिन, किसी भी शख्सियत को एक परिभाषा में उतार पाना काफी कठिन होता है. हाल के घटनाक्रमों के बीच गडकरी कई बार चौंकाते हुए नजर आए हैं.

आम जनता का नेता’ बनाम ‘पढ़े-लिखों’ का नेता
नागपुर में कभी स्‍थूलकाय शरीर वाले दो नेताओं के बीच ‘आम जनता का नेता’ बनाम ‘पढ़े-लिखों’ का नेता होने को लेकर एक-दूसरे पर तंज कसे जाते थे. इन दो नेताओं में एक गडकरी थे और दूसरे महाराष्‍ट्र में कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे सतीश चतुर्वेदी. गड़करी आज बुलंदियों पर हैं तो चतुर्वेदी अपनी पार्टी से हटाए जाने के बाद सियासी बियावान में दिन काट रहे हैं.

मैं ‘पढ़े लिखे’ मतदाताओं का चुना हुआ नेता हूं
पांच बार विधायक रहे चतुर्वेदी खुद को आम जनता का नेता बताते थे, तो गडकरी खुद को ‘पढ़े-लिखों’ का. महाराष्‍ट्र में बीजेपी-शिवसेना की सरकार के बाद जब कांग्रेस की सरकार आई तो सतीश चतुर्वेदी कैबिनेट मंत्री बने. चतुर्वेदी और उनकी पार्टी के कई नेता सार्वजनिक भाषणों में कहते कि गडकरी जन नेता नहीं हैं. उन्‍हें जनता ने सीधे नहीं चुना तो इसके जवाब में गडकरी कहते- मैं ‘पढ़े लिखे’ मतदाताओं का चुना हुआ नेता हूं. दरअसल, वे स्‍नातक सीट से एमएलसी चुने जाते थे.

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विधानपरिषद के लिए लगातार 4 बार चुने गए
गडकरी लगातार 4 बार (1990, 1996, 2002 और 2008) महाराष्‍ट्र विधानपरिषद के लिए स्‍नातक सीट से चुने गए थे. इससे पहले 1985 में वे एमएलए का चुनाव हार गए थे. 1995 में जब महाराष्‍ट्र में बीजेपी-शिवसेना की सरकार बनी तो वह पीडब्‍ल्‍यूडी मंत्री बने और राज्‍य की सड़कों-पुलों और फ्लाइओवरों के लिए ऐसा काम किया कि उन्‍हें ‘रोडकरी’ कहा जाने लगा.

7 बार सांसद रहे मुत्‍तेमवार को हराया 
विधानसभा के लिए एक चुनाव हार चुके गडकरी 2014 में नागपुर लोकसभा सीट से चुने गए थे. उन्‍होंने 2,86,828 वोटों के अंतर से 7 बार सांसद रहे कांग्रेस सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे विलास मुत्‍तेमवार को हराया था.

बीजेपी अध्‍यक्ष बने तो नाम सुनकर कई पार्टियों के नेता हैरान रह गए थे
राष्‍ट्रीय राजनीति के क्षितिज में अचानक बुलंदियों पर आए गडकरी ने पहली बार बड़े सियासी खिलाड़ियों को, तब हैरान कर दिया था, जब वह 9 फरवरी 2010 में तीन साल के लिए बीजेपी के निर्विरोध अध्‍यक्ष चुने गए थे. देश की कई पार्टियों के नेता तो उनका नाम सुनकर ही हैरान रह गए थे और जानना चाहते थे कि ये गडकरी कौन हैं? कुछ ऐसा ही सवाल तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी तो पूछ भी बैठी थीं. राजनाथ सिंह के बाद जब गडकरी पार्टी अध्‍यक्ष बने तब वे 53 साल के थे. देश की इतनी बड़ी पार्टी के शीर्ष पद पहुंचे गडकरी ने आरएसएस के एक स्‍वयंसेवक से लेकर पार्टी की छात्र शाखा से होते हुए क्षेत्रीय संगठन में साधारण पद से शुरुआत की थी.

महाराष्‍ट्र बीजेपी के प्रदेश अध्‍यक्ष रहे
वह बीजेपी के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष बनने से पहले महाराष्‍ट्र बीजेपी के प्रदेश अध्‍यक्ष थे. पार्टी अध्‍यक्ष बनने के बाद जब दोबारा लगभग उनका बीजेपी प्रमुख बनना तय हो चुका था, इसी बीच उन पर कुछ आरोप लगे. इसके चलते उन्‍होंने खुद को अध्‍यक्ष पद से दूर रखने का फैसला कर लिया था.

नितिन गडकरी (फोटो-ट्विटर)

कभी एलीट क्‍लास के नेता से जननेता
कुर्ता पायजामाधारी परंपरागत नेताओं की छवि से अलग कॉर्पोरेट दुनिया में काम करने वाले या बिजनेसमैन जैसे दिखने वाले गडकरी के जन नेता बनने को लेकर वरिष्‍ठ पत्रकार संतोष मानव कहते हैं- नितिन गडकरी कभी प्रभुवर्ग यानी एलीट क्‍लास के नेता थे. वे एमएलसी भी स्‍नातक क्षेत्र से बने, लेकिन धीरे-धीरे खुद को आम लोगों से जोड़ा. वे अब मास लीडर हैं. गडकरी की कई चुनावी सभाओं को कवर कर चुके मानव कहते हैं कि छोटे-छोटे कस्‍बे या तालुका में भी 10 हजार लोगों की सभा करने की ताकत नितिन गडकरी के पास है. वे जाति धर्म से परे मास लीडर हो गए हैं. कम से कम विदर्भ के तो हैं ही.

 दो-तीन हजार लोगों की भीड़ जुटती है
हर शनिवार-रविवार को गडकरी के घर दो-तीन हजार लोगों की भीड़ जुटती है. वे सबसे बारी-बारी से मिलते हैं. यथासंभव समस्‍याओं का समाधान करते हैं. सीनियर पत्रकार मानव कहते हैं कि वे एक तांत्रिक की तरह हैं, जो हर किसी को फूंक देता है. किसी पर मंत्र का असर होता है, किसी पर नहीं, पर सब खुश हो जाते हैं- चलो फूंक तो दिया.

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मोदी सरकार के मंत्र‍ियों में शानदार प्रदर्शन का रिकॉर्ड गडकरी के नाम 
केंद्र सरकार में मंत्री के तौर पर बेहतरीन प्रदर्शन का रिकॉर्ड रखने वाले गडकरी का कहना है कि उनका सपना सिर्फ विकास है. इस विकास का उजियारा कहां तक पहुंचा, इस पर जय जवान जय किसान संगठन के समन्‍वयक विजय कुमार शिंदे का कहना है कि ये देखना होगा कि आम लोगों की जिंदगी में बदलाव क्‍या हुआ. उन्‍हें क्‍या लाभ हुआ. समाज के कमजोर और निचले वर्ग के लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य और शिक्षा में क्‍या बदलाव आया. इसी के आधार पर मूल्‍यांकन किया जाना चाहिए.

विरोधियों के भी चहेते हैं गडकरी
राजनीतिक समीक्षाओं में एक साधारण परिवार से बड़े उद्यमी तक, संघ के शीर्ष नेतृत्‍व से करीबी से लेकर सहकारिता में मास्‍टरी रखने वाले गडकरी की मित्रता, पार्टी से बाहर जाकर विरोधी दलों के नेताओं तक है. प्रबंधन, प्‍लानिंग में माहिर, जुदा अंदाज और बेबाक बयानों वाले मोदी सरकार के इस दिग्‍गज मंत्री को एक बार फिर से जनता का नेता बनने की कसौटी में खरा उतरने की चुनौती है. बता दें कि कुछ समय पहले सोनिया गांधी ने गडकरी की खूब तारीफ की तो अब उनके बेटे राहुल गांधी ने उन्‍हें नागपुर में घेरने की पूरी तैयारी कर ली है.

प्रफुल्‍ल पटेल जैसे दिग्‍गज को पटकनी देने वाले नेेेेता सेे इस बार होगा सामना  
कांग्रेस ने गडकरी के खिलाफ पूर्व बीजेपी सांसद रहे नाना पटोले को उतारा है. पटोले वही नेता हैं, जिन्‍होंने एनसीपी के प्रफुल्‍ल पटेल जैसे दिग्‍गज को पिछले लोकसभा में भंडारा गोदियां सीट पर पटकनी दी थी. नाना के बड़े भाई और राज्‍य पुलिस सेवा के रिटायर्ड अफसर विनोद पटोले कहते हैं कि उनका छोटा भाई आसानी से नागपुर सीट निकाल लेगा. हालांकि, ये तो तभी सामने आएगा जब लोकसभा चुनाव के नतीजे आएंगे.