पिछले दो दशक से बिहार की राजनीति नीतीश कुमार के इर्द गिर्द घूम रही है. राज्य में ‘सुशासन बाबू’ के नाम से प्रसिद्ध नीतीश के आगे कथित सामाजिक न्याय के मसीहा लालू यादव भी शून्य हो जाते हैं. यह हम नहीं बल्कि पिछले दो दशक से बिहार की जनता अपने वोटों के जरिए यही बताती रही है. यह बात इस बार के लोकसभा चुनाव में भी एक बार फिर साबित हुई है. 1990 के दशक में बिहार के बड़े नेता बन चुके लालू यादव के साथी रहे नीतीश ने 1994 में उनका साथ छोड़ दिया. बिना किसी खास जातीय आधार के नीतीश ने कुछ ही सालों में बिहार की राजनीति में लालू के विकल्प बनने लगे. पहले समता पार्टी के जरिए वह एनडीए के भागीदार बन गए. वाजपेयी की सरकार में मंत्री रहे. उसके बाद 2005 में सीएम पद की कुर्सी पर काबिज हो गए. 2005 के विधानसभा में नीतीश ने भाजपा के साथ मिलकर 243 सदस्यीय विधानसभा में 143 सीटें जीत ली. जदयू के 88 और भाजपा के 55 नेता विधानसभा पहुंचे. राजद केवल 54 सीटों पर सिमट गई. इस तरह बिहार में एक तरह से लालू युग का अंत हो गया.

2009 और 2010 के चुनाव
2009 में यूपीए के पहले कार्यकाल के बाद हुए लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार बड़े कद के नेता बनकर उभरे. एनडीएन ने लालकृष्ण आडवाणी को पीएम का उम्मीदवार घोषित कर चुनाव लड़ा था. उस चुनाव में भाजपा को देश भर में बुरी हार का सामना करना पड़ा था लेकिन बिहार की स्थिति अलग थी. यहां पर एनडीए ने 40 में से 32 सीटों पर कब्जा जमा लिया. जबकि यूपीए से अलग होकर चुनाव लड़ने वाली राजद 4 सीटों पर सिमट गई. इसके अगले साल हुए विधानसभा चुनाव में नीतीश के नेतृत्व में एनडीए ने बिहार में करीब-करीब राजद का सूपड़ा साफ कर दिया. 243 सदस्यीय विधानसभा में राजद को केवल 22 सीटें मिलीं, जबकि 22.6 फीसदी वोट शेयर के साथ जदयू ने 115 और भाजपा ने 16.4 फीसदी वोट शेयर के साथ 91 सीटें जीती. 2010 के विधानसभा चुनाव में राजद को 18.8 फीसदी वोट मिले थे.

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भाजपा और नीतीश एक दूसरे की जरूरत
2009 और 2010 के चुनावों में जदयू को मिली सफलता ने नीतीश कुमार को एक बड़ा नेता बना दिया था, लेकिन 2014 के आम चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी को पीएम उम्मीदवार घोषित किए जाने के कारण उन्होंने भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ लिया. इस कारण 2014 के चुनाव में उन्हें मुंह की खानी पड़ी. चुनावी नतीजे ने यह स्पष्ट कर दिया था कि अब भाजपा को नीतीश की जरूरत नहीं है. लेकिन, वही जब अगले साल ही अपने घोर विरोधी रहे लालू के साथ चले गए तो वह नरेंद्र मोदी से भी ताकतवर बन गए. 2014 के लोकसभा चुनाव में त्रिकोणीय मुकाबले में बाजी एनडीए ने मार ली थी, लेकिन उसके अगले साल हुए विधानसभा चुनाव में जब नीतीश ने लालू से हाथ मिला लिया तो सबसे अधिक वोट शेयर होने के बावजूद भाजपा तीसरे नंबर की पार्टी बन गई.

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प्रधानमंत्री मोदी की आपार लोकप्रियता के बीच 2015 के विधानसभा में भाजपा 24.4 फीसदी वोट के साथ केवल 53 सीटें हासिल कर सकीं, जबकि लालू-नीतीश के साथ होने की वजह से राजद 81 और जदयू ने 70 सीटों पर जीत हासिल की. इसके बाद भाजपा को एक बार फिर नीतीश के महत्व का पता चला और दोनों कुछ ही महीनों बाद फिर एक साथ आ गए. इसको लेकर देशभर में नीतीश पर पलटूराम होने का तोहमत लगाया गया. लेकिन चुनावी नतीजों ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि नीतीश में बिहार भरोसा अब भी कायम है.

2019 का चुनाव
2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश ने भाजपा के लिए अपना महत्व साबित कर दिया था. इसी कारण 2014 के लोकसभा चुनाव में 22 सीटें जीतने वाली भाजपा ने दो सीटें जीतने वाली जदयू को बराबरी का दर्जा दिया. इस बार दोनों ने मिलकर राज्य की 40 में 39 सीटें हासिल कर ली. इस चुनाव में भाजपा को 23.6 और जदयू को 21.8 फीसदी वोट मिले, जबकि 15.4 फीसदी वोट हासिल करने के बावजूद राज्य में राजद का सूपड़ा साफ हो गया.