Lok Sabha Election 2019: लोकसभा चुनाव 2019 के मद्देनजर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर क्षेत्र में इस एक नया राजनीतिक समीकरण देखा जा रहा है. इस इलाके में लोकसभा की तीन सीटें- सहारनपुर, कैराना और मुजफ्फरनगर है. इन तीनों सीटों पर 11 अप्रैल को पहले चरण में मतदान होगा. इन तीनों सीटों पर एक तरफ सपा-बसपा-रालोद का गठबंधन है तो दूसरी तरफ भाजपा. कांग्रेस पार्टी ने भी अपने उम्मीदवार उतारे हैं. पूरे इलाके में सपा-बसपा ये संदेश देने की कोशिश कर रही है कि उनका गठबंधन ही मुस्लिम वोटों का दावेदार है. दूसरी तरफ अजीत सिंह के नेतृत्व वाला रालोद मुजफ्फरनगर में जाट-मुस्लिम समुदाय को एकजुट करने में लगा है. यह गठबंधन इस इलाके में अनुसूचित जाति के वोट को भी अपने साथ जोड़े रखने की कवायद में जुटा है. 2014 के लोकसभा चुनाव में अनुसूचित जाति के वोट में बिखराव दिखा था. इस इलाके खासकर सहारनपुर लोकसभा सीट पर अनुसूचित जाति के दो लाख वोटर हैं.

इसी तरह कैराना सीट भी काफी अहम हो गया है. यहां पर रालोद की इस बात को लेकर परीक्षा होगी वह यहां के सपा उम्मीदवार को जाट समुदाय का कितना वोट दिलवा पाती है. सपा ने रालोद की पूर्व नेता तबस्सुम हसन को यहां से उम्मीदवार बनाया है. दूसरी तरफ भाजपा ने कैराना से पूर्व सांसद रहे दिवंगत हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह की जगह इस बार प्रदीप चौधरी को टिकट दिया है. हुकुम सिंह की तरह प्रदीप भी गुर्जर समुदाय से हैं और वह गंगोह से विधायक हैं. कांग्रेस ने यहां से हरेंद्र मलिक को अपना उम्मीदवार बनाया है.

सहारनपुर
उधर, सहारनपुर सीट बसपा के खाते में गई है. पार्टी ने यहां से स्थानीय मुस्लिम चेहरा हाजी फजलू रहमान को उम्मीदवार बनाया है. इसका मकसद अनुसूचित जाति और मुस्मिल वोटरों को एकजुट करना है. 2014 के लोकसभा चुनाव में जब सपा और बसपा ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था तब बसपा को इस सीट पर 2.30 लाख वोट मिले थे. यहां से कांग्रेस के उम्मीदवार इमरान मसूद हैं जो भीम आर्मी के जरिए अनुसूचित जाति के वोट बैंक में सेंध लगाना चाहते हैं. यहां सपा गुर्जर समुदाय का वोट बसपा को दिलाने को में जुटी है. नेताओं का कहना है कि इस इलाके में सपा-बसपा-रालोद गठबंधन के लिए सबसे बड़ी चुनौती सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखना है.

मुजफ्फरनर सीट से रालोद के मुखिया अजित सिंह खुद मैदान में हैं. वह गठबंधन के उम्मीदवार हैं और उनकी सबसे बड़ी चुनौती 2013 के सांप्रदायिक दंगों के बाद बिखर चुके जाट और मुस्लिम समुदाय को फिर से एकजुट करना है. यहां के चुनावी नतीजे से तय होगा कि अजित सिंह जाट और मुस्लिम समुदाय को एकसाथ लाने में कितना कामयाब हुए. जहां तक भाजपा का सवाल है तो इन तीनों सीटों पर उसके लिए सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि उसके उम्मीदवार स्थानीय और अति पिछड़ा वर्ग जैसे सैनी और कश्यप से हैं. पार्टी अपनी सरकार की उपलब्धियां भी गिना रही है.