लोकसभा चुनावः औरतों को उनका हक मिले, इसलिए जारी हुआ अपनी तरह का पहला 'वूमेनिफेस्टो'

लोकसभा चुनाव के मद्देनजर सभी राजनीतिक पार्टियों से इस पर विचार करने का अनुरोध.

Published date india.com Published: March 6, 2019 11:27 PM IST
लोकसभा चुनावः औरतों को उनका हक मिले, इसलिए जारी हुआ अपनी तरह का पहला 'वूमेनिफेस्टो'

नई दिल्ली. महिला संगठनों ने बुधवार को ‘वूमेनिफेस्टो’ (महिला घोषणा पत्र) जारी कर अगले पांच साल में महिलाओं के लिए एक करोड़ रोजगार के सृजन, शांति प्रक्रिया में और पर्यावरण से जुड़े मामले देखने वाली संस्थाओं में निर्णय लेने वाले पदों पर उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने तथा 33 प्रतिशत टिकट महिला उम्मीदवारों को देने समेत अन्य मांगें कीं. आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से पहले नेशनल अलांयस ऑफ वूमन्स ऑर्गेनाइज़ेशन ने ‘वूमेनिफेस्टो’ जारी किया और लोकसभा चुनाव के मद्देनजर सभी राजनीतिक पार्टियों से इस पर विचार करने का अनुरोध किया.

सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक रंजना कुमारी ने कहा, ‘‘राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय पार्टियों को महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए उन्हें अधिक टिकट देने की जरूरत है ताकि वे उन नीतियों को प्रभावित कर सकें जो महिलाओं के समग्र विकास को दर्शाती हैं.’’ घोषणा पत्र में स्कूलों में लड़कियों को नि:शुल्क सेनेटरी नेपकिन मुहैया कराने और सभी अस्पतालों में बलात्कार तथा तेजाब हमले की पीड़िताओं के नि:शुल्क इलाज की अन्य मांगें भी शामिल हैं.

घोषणा पत्र में कहा गया है कि सभी मकान पति-पत्नी के नाम पर पंजीकृत होने चाहिए और वैवाहिक बलात्कार को अपराध के दायरे में लाना चाहिए. सभी राजनीतिक पार्टियों की आंतरिक समितियों में कम से कम 33 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होनी चाहिए. घोषणा पत्र में महिला केंद्रित बजट प्रावधानों के तहत सालाना बजट में महिलाओं के विकास के लिए 30 फीसदी का प्रावधान करने की भी मांग की गई है. साथ में यह भी मांग की गई है अगर महिला किसान कर्ज नहीं चुका पाती हैं तो उनके ऋण को माफ किया जाए.

अगले पांच साल के दौरान एक करोड़ नौकरियां सृजित करने की मांग भी घोषणा-पत्र में की गई है. खासकर सूचना एवं प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, शिक्षा और परामर्श क्षेत्र में रोजगार पैदा करने की मांग की गई है. गौरतलब है कि चुनाव से पहले हर बार राजनीतिक दल महिलाओं के अधिकार को लेकर ढेर सारे वायदे करते हैं, लेकिन चुनाव के बाद इनकी मांगें महज घोषणाएं बनकर ही रह जाती हैं. संभवतः इसीलिए इस बार महिला संगठनों ने गंभीरतापूर्वक अपनी मांगें रखी हैं और सियासी दलों से इस पर विचार करने को कहा है.

(इनपुट – एजेंसी)

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