लखनऊ: बदलते समय के साथ नवाबों के शहर लखनऊ में होली का स्वरूप बदला है लेकिन लोग रंगों के इस त्यौहार से जुडी परंपराओं को और ‘गंगा जमुनी तहजीब’ को जिन्दा रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं. नवाबों और रजवाड़ों के परिवार आम तौर पर पुराने लखनऊ में हैं. वे परंपराओं में यकीन रखते हैं और त्यौहारों के जरिए एक दूसरे से गले मिलने, गिला शिकवा दूर करने में भी विश्वास करते हैं.

नवाबजादा सैयद मासूम रजा अवध के राज परिवार से हैं. उन्होंने कहा, ‘बच्चे और बूढे सभी हमारे यहां त्यौहार के दिन आते हैं. एक दूसरे को रंग लगाते हैं. हम उन्हें गुझिया खिलाते हैं और सभी मिलकर मस्त होकर नाचते गाते हैं.’

पंडित सच्चिदानंद शर्मा चित्रकूट में रहते हैं. लेकिन होली के वक्त लखनऊ में होते हैं. अवध और अवध की होली से उनका विशेष लगाव है. शर्मा का कहना है कि यहां फाग का आनंद कुछ और है. मथुरा और बरसाने की होली तो विख्यात है लेकिन ‘होली खेलैं रघुबीरा अवध में’ गीत अवध में ही सुनायी पडता है और यह अंतरराष्ट्रीय होली गीत बन चुका है.

प्रतापगढ जिले में रजवाड़े खानदान से जुडे सुनील सिंह ‘नल’ ने कहा कि लखनऊ तहजीब का शहर है और यहां के त्यौहार भी शिद्दत के साथ रंगों में सराबोर होकर मनाये जाते हैं. होली हो या ईद … लखनऊ का इतिहास है कि त्यौहार यहां सब मिल जुलकर पूरे उल्लास से मनाते हैं. महमूदाबाद स्टेट के शहजादा आमिर ने कहा कि अब वक्त बदल गया है. त्यौहार भी बदल गये हैं. त्यौहारों में राजनीति का रंग घुल गया है और अब संस्कृति को बचाकर सहेज कर रख पायें, इतना प्रयास ही काफी है.

उन्होंने कहा कि कोई किसी भी मजहब का क्यों ना हो, होली अवध में डूबकर खेली जाती है. हम प्राकृतिक रंगों का उपयोग करते हैं जो टेसू के फूल से तैयार होते हैं. शाम को सांस्कृतिक संध्या होती है. कवि सम्मेलन होते हैं, मुशायरा होता है, गीत संगीत होता है. महफिल सजती है. मासूम रजा की पत्नी नसीमा रजा ने बताया कि उम्र में छोटे लोग हमारे पैरों में गुलाल लगाकर आशीर्वाद लेते हैं. ये मंजर सिर्फ अवध में ही देखने को मिल सकता है.

नसीमा बताती हैं कि होली का मतलब सिर्फ गुझिया नहीं है. हम उसके अलावा भी कई पकवान बनाते हैं. किस्म-किस्म के पापड़ और दही बड़ा भी बनता है. होली के दिन बेहतरीन खाना पकता है. घर परिवार वाले एक जगह इकटठा होते हैं. शान ए अवध नाम से संस्कृति संरक्षण का बीडा उठाने वाले फैजल खान ने कहा कि सफेद कुर्ता पैजामा पहनकर होली खेलने निकलते हैं ताकि उस पर जो भी रंग चढे, चटख नजर आए. अबीर गुलाल से भी होली होती है.

रजा बताते हैं कि समय बदल रहा है. नयी पीढी के लोग कैरियर की तलाश में यहां से दूर चले गये हैं हालांकि कोशिश होती है कि त्यौहार के मौके पर सब एक साथ हों, अब लखनऊ की होली भी पहले जैसी नहीं रह गयी है. फैजल ने कहा कि त्यौहार कोई भी हो, भाईचारा मजबूत करने में सहायक होता है. सभी गिले शिकवे और नाराजगी दूर करने का ये अच्छा मौका होता है और हम सब मिलजुल कर त्यौहारों को पूरे मन से मनाते हैं.