Bhojshala Case: हाई कोर्ट के फैसले के बाद मुस्लिम पक्ष का आया रिएक्शन, बताया क्या होगी आगे की रणनीति

धार भोजशाला मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने भोजशाला परिसर को मां वाग्देवी का मंदिर माना और नमाज की अनुमति वाला आदेश रद्द किया.

Written by: Gargi Santosh
Published: May 15, 2026, 3:38 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने धार स्थित भोजशाला को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि भोजशाला परिसर मंदिर का है और यहां मां वाग्देवी यानी देवी सरस्वती का प्राचीन मंदिर मौजूद था. जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने उस पुराने आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मुस्लिम पक्ष को यहां नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई थी. अदालत ने हिंदू पक्ष के दावे को स्वीकार करते हुए कहा कि यह स्थान ऐतिहासिक रूप से शिक्षा और संस्कृत अध्ययन का प्रमुख केंद्र रहा है.

भोजशाला मामले पर कोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने अपने फैसले में माना कि भोजशाला और कमाल मौला मस्जिद से जुड़ा विवादित क्षेत्र एक संरक्षित स्मारक है, लेकिन उसका मूल धार्मिक स्वरूप मंदिर का ही है. अदालत ने कहा कि उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज और साहित्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि यहां देवी सरस्वती की पूजा होती थी. कोर्ट ने यह भी कहा कि मुस्लिम पक्ष मस्जिद के लिए दूसरी जगह जमीन की मांग कर सकता है. फैसले के बाद, मुस्लिम पक्ष की ओर से प्रतिक्रिया आना शुरू हो गई हैं. चलिए जानते हैं किसने क्या कहा?

मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट जाएगा

धार शहर के काजी वकार सादिक ने कहा कि मुस्लिम पक्ष इस फैसले से सहमत नहीं है. उनका कहना है कि फैसले की कानूनी समीक्षा की जाएगी और जरूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी. उन्होंने कहा कि यह मामला सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि धार्मिक पहचान और अधिकारों से जुड़ा हुआ है.

ओवैसी ने फैसले पर उठाए सवाल

वहीं, असदुद्दीन ओवैसी ने भी कोर्ट के फैसले पर नाराजगी जताई है. AIMIM चीफ ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट इस फैसले की दोबारा समीक्षा करेगा. ओवैसी ने इस मामले की तुलना बाबरी मस्जिद केस से करते हुए कहा कि दोनों मामलों में कई समानताएं दिखाई देती हैं. उनके बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक बहस भी तेज हो गई है.

ASI सर्वे पर उठे सवाल

मुस्लिम पक्ष ने अदालत में एएसआई की रिपोर्ट पर भी सवाल खड़े किए. पक्ष का कहना था कि सर्वे रिपोर्ट पूरी तरह निष्पक्ष नहीं दिखाई देती और इसमें कई जरूरी वैज्ञानिक प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया. खास तौर पर कार्बन डेटिंग नहीं होने और पुरानी वस्तुओं की स्थिति को लेकर भी आपत्ति जताई गई.

ऐतिहासिक रिकॉर्ड का दिया हवाला

मुस्लिम पक्ष ने अपने तर्क में पुराने दस्तावेजों और रिकॉर्ड का भी जिक्र किया. उनका दावा है कि 1935 में तत्कालीन धार राज्य की अदालत इस स्थल को मस्जिद मान चुकी थी और लंबे समय तक यहां नमाज अदा होती रही. इसी आधार पर मुस्लिम पक्ष अब सुप्रीम कोर्ट में अपनी बात रखने की तैयारी कर रहा है.

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