भोपाल: दिसंबर 1984 की वो स्याह रात जब विश्व की सर्वाधिक भीषण औद्योगिक त्रासदी में से एक भोपाल गैस त्रासदी ने समूचे विश्व को झकझोर के रख दिया था. 34 वर्ष बीतने के बाद भी इस त्रासदी से प्रभावित लोगों के जख्म अभी भी हरे हैं. आज भी पीड़ित अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं. 2-3 दिसंबर 1984 की दरम्यानी रात को यूनियन कार्बाइड के भोपाल स्थित कारखाने से रिसी जहरीली गैस ‘मिक’ के रिसाव ने न जाने कितनी जिंदगियां छीन ली, कितने लोग इससे प्रभावित हुए, आज भी वो तस्वीरें कहीं अंदर तक हिला देती हैं. बावजूद इसके भोपाल गैस कांड के 34 साल पूरे होने के बाद भी जहरीली गैस से प्रभावित लोग अब भी उचित इलाज,पर्याप्त मुआवजे, न्याय एवं पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की लड़ाई लड़ रहे हैं.

यूसीसी से समझौता एक धोखा !
गैस पीड़ितों के हितों के लिए पिछले तीन दशकों से अधिक समय से काम करने वाले भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के संयोजक अब्दुल जब्बार कहते हैं ‘हादसे के 34 साल बाद भी न तो मध्यप्रदेश सरकार ने और न ही केन्द्र सरकार ने इसके नतीजों और प्रभावों का कोई समग्र आकलन करने की कोशिश की है और न ही उसके लिए कोई उपचारात्मक कदम उठाए हैं.’ उन्होंने कहा, 14-15 फरवरी 1989 को केन्द्र सरकार और अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन (यूसीसी) के बीच हुआ समझौता पूरी तरह से धोखा था और उसके तहत मिली रकम का हरेक गैस प्रभावित को पांचवें हिस्से से भी कम मिल पाया है. नतीजतन, गैस प्रभावितों को स्वास्थ्य सुविधाओं, राहत और पुनर्वास, मुआवज़ा, पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति और न्याय इन सभी के लिए लगातार लड़ाई लड़नी पड़ी है.
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जब्बार ने बताया, साल 2018 में भी गैस प्रभावितों के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहुत कम प्रगति होना गम्भीर चिन्ता का विषय रहा है. उन्होंने कहा कि फरवरी 1989 में भारत सरकार एवं यूसीसी में समझौता हुआ था, जिसके तहत यूसीसी ने भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजे के तौर पर 470 मिलियन अमेरिकी डॉलर (715 करोड़ रूपये) दिए थे. जब्बार बताते हैं उनके संगठन ने उसी वक्त इस समझौते पर यह कह कर सवाल उठाया था कि इस समझौते के तहत मृतकों एवं घायलों की संख्या बहुत कम दिखाई गई है, जबकि वास्तविकता में यह बहुत अधिक है. इस पर 3 अक्टूबर 1991 को उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि यदि यह संख्या बढ़ती है तो भारत सरकार मुआवजा देगी.

पांच गुना अधिक लोग हैं पीड़ित
आंकड़ों के बारे में बात करते हुए वो कहते हैं कि इस समझौते में गैस रिसने से 3 हजार लोगों की मौत एवं 1.02 लाख लोग प्रभावित बताए गए थे. जबकि असलियत में 15 हजार 274 मृतक एवं 5.74 लाख प्रभावित लोग थे, जो इस बात से साबित होता है कि भोपाल में दावा अदालतों द्वारा वर्ष 1990 से 2005 तक त्रासदी के इन 15,274 मृतकों के परिजनों और 5.74 लाख प्रभावितों को 715 करोड़ रूपए मुआवजे के तौर पर दिए गए. उन्होंने बताया कि इस समझौते में दिए गए मृतकों एवं घायलों की संख्या हकीकत में करीब पांच गुना अधिक होने पर उच्चतम न्यायालय के समक्ष वर्ष 2010 में अलग-अलग क्यूरेटिव याचिकाएं दायर की गयी थी, जिसमें समझौते की शर्तों पर सवाल उठाए गए थे और यह कहा गया कि समझौता मृतकों और पीड़ितों की बहुत कम आँकी गई संख्या पर आधारित था. याचिकाओं में मुआवजे में 7,728 करोड़ रुपए की अतिरिक्त बढ़ोतरी की मांग की गयी है, जबकि 1989 की समझौता राशि मात्र 705 करोड़ रुपए की थी. याचिका स्वीकृत हो गई है पर सुनवाई शुरू नहीं हुई है.

केन्द्र एवं राज्य सरकार पर उपेक्षा का आरोप
जब्बार ने दावा किया कि 2-3 दिसंबर 1984 की दरम्यानी रात को यूनियन कार्बाइड के भोपाल स्थित कारखाने से रिसी जहरीली गैस मिक (मिथाइल आइसोसाइनाइट) से अब तक 20 हजार से ज़्यादा लोग मारे गए हैं और लगभग 5.74 लाख लोग प्रभावित हुए हैं. उन्होंने कहा कि यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल) उस समय यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन (यूसीसी) के नियंत्रण में था जो अमरीका की एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी है, और बाद में डाव केमिकल कम्पनी (यूएसए) के अधीन रहा. अगस्त 2017 से डाव केमिकल कम्पनी (यूएसए) का ई.आई डुपोंट डी नीमोर एंड कंपनी के साथ विलय हो जाने के बाद यह अब डाव-डुपोंट के अधीन है. उन्होंने कहा कि गैस त्रासदी की जहरीली गैस से प्रभावित लोग अब भी कैंसर, ट्यूमर, सांस और फेफड़ों की समस्या जैसी बीमारियों से ग्रसित हैं. उन्होंने कहा, प्रभावितों के पास पैसा नहीं होने के कारण उन्हें उचित इलाज भी नहीं मिल पा रहा है.

इसी बीच, गैस पीड़ितों के हितों के लिए लंबे समय से काम करने वाले भोपाल गैस पीड़ित महिला स्टेशनरी कर्मचारी संध की रशीदा बी, भोपाल गैस पीड़ित महिला पुरूष संघर्ष मोर्चा के नवाब खां, भोपाल ग्रुप फॉर इन्फॉर्मेशन एंड एक्शन के रचना ढींगरा एवं चिल्ड्रन अगेन्स्ट डाव कार्बाइड के नौशीन खान ने यहां एक संयुक्त बयान जारी कर आरोप लगाया कि केन्द्र एवं राज्य सरकार गैस-पीड़ितों की उपेक्षा कर रही है. अपने संयुक्त बयान में उन्होंने कहा कि हाल के वैज्ञानिक अध्ययन यह बताते हैं कि यूनियन कार्बाइड के गैसों की वजह से भोपाल में मौतों और बीमारियों का सिलसिला जारी है, पर आज तक भोपाल गैस पीड़ितों के इलाज की निगरानी के लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित समिति की 80 प्रतिशत से अधिक अनुशंसाओं को अमल में नहीं लाया गया है. पीड़ितों का कहना है 34 साल बीत चुके हैं न्याय की आस में लेकिन हम अपने हक की लड़ाई लड़ते रहेंगे. (इनपुट भाषा )

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