भोपालः मध्य प्रदेश में लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रही भाजपा की समस्या उसके अपनों ने ही बढ़ा दिया है. राज्य में कम से कम 15 ऐसी सीटें हैं जहां टिकट नहीं मिलने के कारण भाजपा के नेता बागी हो गए हैं और वे निर्दलीय चुनाव मैदान में हैं. इसमें अधिकतर संबंधित क्षेत्र में भाजपा के कद्दावर नेता और मौजूदा विधायक हैं. Also Read - कांग्रेस ने सामूहिक पलायन पर सरकार से पूछे सवाल, कहा- गरीबों की जिंदगी मायने रखती है या नहीं

एक ऐसे ही नेता है रामकृष्ण कुसमारिया. कुसमारिया पांच बार के सांसद हैं और वह दमोह से भाजपा के आधिकारिक उम्मीदवार जयंत मालवीय के खिलाफ चुनाव मैदान में हैं. कुछ ऐसी ही स्थिति अनुपपुर, कोटमा और पुष्पप्रजागढ़ जैसी सीटों पर है. कुछ सीटों पर भाजपा के पूर्व विधायक भी पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ मैदान में उतर गए हैं. इसमें भिंड से नरेश सिंह कुशवाहा, महेश्वर से राजकुमार मेव और बेरासिया से ब्रह्मानंद रत्नाकर के नाम शामिल हैं. Also Read - केजरीवाल ने लोगों को गीता पाठ करने की दी सलाह, कहा- गीता के 18 अध्याय की तरह लॉकडाउन के बचे हैं 18 दिन 

भाजपा युवा मोर्चा के पूर्व अध्यक्ष धीरज पटेरिया ने टिकट नहीं मिलने पर पिछले सप्ताह पार्टी छोड़ दी. अब वह जबलपुर (उत्तर) सीट से स्वास्थ्य मंत्री शरद जैन के खिलाफ मैदान में हैं. यहां पर पहले से ही कांग्रेस और भाजपा के बीच कड़े मुकाबले की बात कही जा रही है. अब पटेरिया के मैदान में उतरने से मुकाबला त्रिकोरणीय हो गया है. ऐसे में यहां से कांग्रेस को फायदा पहुंच सकता है. Also Read - यूपी: रायबरेली में सोनिया गांधी के 'लापता' होने के लगे पोस्टर, संसदीय क्षेत्र से बाहर होने पर उठे सवाल

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कई मामलों में भाजपा के आधिकारिक उम्मीदवार को उसके परिवार के सदस्य ही चुनौती दे रहे हैं. जबलपुर जिले के बारगी में भाजपा की मौजूदा विधायक प्रतिभा सिंह के खिलाफ समाजवादी पार्टी ने उनकी बहू को ही मैदान में उतार दिया है.

बागियों की बयानबाजी बड़ी समस्या

वैसे भाजपा ने पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले बागियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है. इसके बाद कई बागियों ने अपना नाम वापस ले लिया लेकिन वे अब भी पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के लिए खतरा बने हुए हैं. इकोनॉमिट टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक पार्टी के एक नेता ने बताया कि हमारे लिए चुनौती यह नहीं है कि बागियों से उनकी उम्मीदवारी वापस करवाई जाए, बल्कि बड़ी चुनौती यह है कि वे (बागी) चुनाव के दौरान पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ काम न करें.

उन्होंने कहा कि पार्टी इस बात को लेकर चिंतित है कि नाम वापस लेने के बावजूद बागी नेता आधिकारिक उम्मीदवार के लिए बयानबाजी कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि नाम वापस लेने के बावजूद दो पूर्व विधायकों ने आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ बयान दिया. भोपाल में हुजुर सीट से टिकट चाहने वाले भाजपा नेता ने नाम वापस लेने के बावजूद बयान दिया कि आधिकारिक उम्मीदवार चुनाव हार जाएंगे. इससे आधिकारिक उम्मीदवार को भारी नुकसान होता है.

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बागी रुख रखने वाले ऐसे नेताओं से दिल्ली के वरिष्ठ नेताओं ने बात की है. एक ऐसा ही उदाहरण पूर्व वित्त मंत्री राघवजी के बारे में है. 84 वर्षीय राघवजी ने विदिशा में शमशाबाद सीट से अपनी बेटी के लिए टिकट मांगा था लेकिन टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने खुद नामांकन दाखिल कर दिया. हालांकि बाद में उन्होंने नाम वापस ले लिया. फिर भी उन्होंने दावा किया कि भाजपा के आधिकारिक उम्मीदवार चुनाव हार जाएंगे.