टीकमगढ़: बुंदेलखंड भीषण जल संकट से जूझ रहा है, यहां एक-एक बूंद पानी के लिए मारा-मारी मची हुई है. मानसून की आहट से पहले शिवराज सरकार भले ही न जागी हो, मगर यहां के लोग जाग गए हैं और उन्होंने लगभग एक हजार साल पुराने एक तालाब की तस्वीर बदलने की ठान ली है. बुंदेलखंड के इन भगीरथों का यह प्रयास सार्थक रूप लेने लगा है, इस तालाब से लगभग 8,000 ट्रैक्टर ट्रॉली से मिट्टी निकाली जा चुकी है. Also Read - यूपी विधानसभा में कर्मचारियों और गेस्ट को मिलेगा आधा गिलास पानी, जानें वजह

100 एकड़ क्षेत्र में फैल ये तालाब
टीकमगढ़ जिले के जतारा विकासखंड का ये गांव अचर्रा है. यह गांव उत्तर प्रदेश की सीमा पर बसा है. यहां का एक ऐतिहासिक चंदेलकालीन तालाब सैकड़ों परिवारों की जिंदगी का हिस्सा रहा है. लगभग 100 एकड़ क्षेत्र में फैला यह तालाब वक्त गुजरने के साथ सिल्ट (गाद या मिट्टी) जाम होते जाने के कारण जल संग्रहण क्षमता लगातार खोता जा रहा था. इस साल तो तालाब का बड़ा हिस्सा सूख चुका था. Also Read - बॉलीवुड एक्टर रणदीप हुड्डा ने की पानी बचाने की अपील, सोशल मीडिया पर शेयर किया Video

योजना ने लिया मूर्त रूप
तालाब की कम होती जल संग्रहण क्षमता के चलते जहां एक ओर आम आदमी की जरूरत पूरी नहीं हो पा रही थी, वहीं मवेशियों को भी पीने का पर्याप्त पानी आसानी से नसीब नहीं हो रहा था. ऐसे में गांव वालों ने समाज सेवी संस्था ‘परमार्थ’ के साथ मिलकर तालाब सफाई की योजना बनाई. यह योजना धीरे-धीरे आकार लेने लगी. Also Read - सूखे की मार से झेल रहे बुंदेलखंड में पानी लिख रहा खुशहाली की इबारत

खेतों को दोहरा लाभ
संस्था के मानवेंद्र सिंह परमार ने नदी संवर्धन यात्रा भी निकाली. पिछले दस दिनों से इस तालाब की सफाई का अभियान चल रहा है. यहां के किसान रहीस यादव का कहना है, “तालाब की मिट्टी उनके खेतों के लिए किसी खाद से कम नहीं है, यही कारण है कि, वे ट्रॉली में भरकर मिट्टी को अपने खेतों में डाल रहे हैं, इससे एक तरफ जहां तालाब का गहरीकरण हो रहा है, वहीं, दूसरी ओर खेतों को खाद स्वरूप मिट्टी मिल रही है.”

एकड़ में 6 से 7 ट्रॉली मिट्टी
परमार बताते हैं कि तालाब की एक ट्रॉली मिट्टी भरवाने पर जेसीबी मशीन वाले को सौ रुपए या मजदूरों को 150 रुपए देना होते हैं, यह मिट्टी खेत के लिए बड़ी उपयोगी है, एक एकड़ में 6 से 7 ट्रॉली मिट्टी डाली जा रही है.”

कई गांव के किसानों को फायदा
टीकमगढ़ जिले के मोहनगढ़-हथेरी मार्ग पर स्थित है अचर्रा गांव. इसकी आबादी लगभग 4500 के आसपास है. इस तालाब से 80 मछुआरा परिवारों की आजीविका चलती है, मगर जल संग्रहण क्षमता कम होने से आम आदमी की जिंदगी पर बड़ा असर पड़ा है. इस तालाब की मिट्टी को अचर्रा ही नहीं पास के अन्य गांव हनौता टपरियन कुंवरपुरा केशवगढ़ के किसान भी ले जा रहे हैं.

यह भगीरथी प्रयास: संजय सिंह
जल-जन जोड़ो अभियान के राष्ट्रीय संयोजक संजय सिंह का कहना है, “गांव के किसानों का यह प्रयास भगीरथी प्रयास है, जो एक तालाब की तस्वीर बदल रहा है, अब तक लगभग 8000 ट्रैक्टर ट्रॉली मिट्टी तालाब से निकाली जा चुकी है, यह अभियान अभी जारी है. इसके चलते तालाब की जल संग्रहण क्षमता में इजाफा होगा और इस बार की बारिश से तालाब में पिछले सालों के मुकाबले कहीं ज्यादा पानी आएगा.”

30 से 40 फीसदी उत्पादन बढ़ेगा
किसान विमलेश यादव बताते हैं कि इस तालाब से प्रतिदिन औसतन 300 से ज्यादा ट्रैक्टर ट्रॉली मिट्टी निकाली जा रही है. कई किसान तो ऐसे हैं जो दिन में कई कई ट्रॉली मिट्टी अपने खेतों में डाल रहे हैं. इससे तालाब की सफाई हो रही है, वहीं खेतों को खाद मिल रही है, इसके उपयोग के चलते खेतों की उर्वरकता बढ़ेगी और उत्पादन 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ जाएगा.”

सरकार सिर्फ बोलती है, करती कुछ नहीं
किसान सोभरन सिंह दाऊ और प्रेम नारायण दाऊ कहते हैं, “प्रदेश की सरकार से उन्हें बड़ी उम्मीदें थीं, मगर यह सरकार सिर्फ बोलती है, करती कुछ नहीं. किसान परेशान है, पानी की समस्या है, तालाबों का बुरा हाल है, मुख्यमंत्री घोषणाएं खूब करते हैं मगर यहां के तालाब में कोई काम नहीं कराया. किसान और गांव वाले अपने प्रयासों से यह काम करा रहे हैं.”

9000 तालाबों में बचे सिर्फ 2000
बुंदेलखंड में यूपी और एमपी के 13 जिले आते हैं. इस इलाके में कभी 9000 से ज्यादा तालाब हुआ करते थे, मगर आज मुश्किल से दो हजार तालाब ही अस्तित्व में बचे हैं. सरकार हर साल बरसात से पहले नए तालाब बनाने की बात करती है, मगर इस इलाके की धरोहर तालाबों पर ध्यान नहीं दिया जाता.

बुंदेलखंड पर सत्ता- विपक्ष का मौन
बुंदेलखंड के भगीरथों ने एक तालाब की तस्वीर बदलने का बीड़ा उठाकर सरकार को आईना दिखाने का काम किया है, अब देखना होगा कि सरकार इस अभियान से जागती है या अब भी सोती रहती है. वहीं विपक्षी दल कांग्रेस भी बुंदेलखंड की पेयजल समस्या पर फिलहाल मौन साधे हुई है. (इनपुट- एजेंसी)