छतरपुर: बुंदेलखंड के लिए नेशनल थर्मल पावर (एनटीपीसी) का सुपर थर्मल पावर स्टेशन लगाने का अभियान थम जाने के कारण इस इलाके के लोगों के विकास का सपना टूट गया. इस इलाके के हजारों परिवारों ने इस संयंत्र के बाद अपने जीवन में भी खुशहाली का सपना संजोया था, मगर सरकार की नीति और नीयत ने सपने को काले अध्याय में बदल दिया. छतरपुर मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर है बरेठी गांव. इस गांव के करीब एनटीपीसी का 28,000 करोड़ की लागत का संयंत्र लगाया जाना था, इसके लिए लगभग 3000 एकड़ जमीन का अधिग्रहण भी कर लिया गया. किसानों को सपने दिखाकर मुआवजा देकर जमीन ले ली गई. किसानों ने खुशी-खुशी जमीन दे दी, क्योंकि उन्हें लगता था कि थर्मल पावर के लगने से हजारों लोग नौकरी करने आएंगे, उनके परिवार के बच्चों को भी रोजगार मिलेगा, मगर इस संयंत्र का काम आगे नहीं बढ़ पाया. किसान आज हताश व निराश हैं, क्योंकि उन्हें अब इस संयंत्र के लगने की उम्मीद कम हो चली है.

क्षेत्र के वरिष्ठ राजेनता सत्यव्रत चतुर्वेदी का कहना है कि यह संयंत्र सिर्फ छतरपुर ही नहीं, पूरे बुंदेलखंड के हालात को बदलने में कामयाब होता. इस क्षेत्र में परिवहन के बेहतर साधन विकसित हो चुके हैं. रेलमार्ग चालू हो चुका है, राष्ट्रीय राजमार्ग बन रहे हैं, इस स्थिति में एनटीपीसी के स्थापित होने से लोगों को रोजगार मिल जाएगा, जिससे यहां से पलायन रुकना संभव है. राज्य में नई सरकार बनी है, मुख्यमंत्री कमलनाथ की उद्योगों को लेकर बेहतर समझ है, लिहाजा यह उम्मीद की जाना चाहिए कि यह संयंत्र चालू करने के प्रयास भी होंगे.

गांव के बुजुर्ग अनरत सिंह (65) बताते हैं कि उनकी भी जमीन का अधिग्रहण किया जा चुका है. जब जमीन का अधिग्रहण हुआ तब उनसे वादा किया गया था कि बच्चों के लिए स्कूल बनेगा, उपचार के लिए अस्पताल बनेगा और संयंत्र में हर परिवार के एक सदस्य को नौकरी दी जाएगी. लगभग पांच साल का समय गुजर गया, मगर कुछ भी हासिल नहीं हुआ.
संयंत्र के लिए जमीन दे चुके कैलाश मिश्रा बताते हैं कि एनटीपीसी का संयंत्र उनके लिए किसी सुखद सपने से कम नहीं रहा. उम्मीद थी कि संयंत्र स्थापित होने से लगभग 1000 हजार इंजीनियर यहां काम करेंगे, इसी तरह हजारों दूसरे कर्मचारी यहां आएंगे, इससे एक तरफ जहां यहां रोजगार के अवसर विकसित होंगे, वहीं नई संभावनाएं जन्म लेंगी. अब थर्मल की जगह सोलर संयंत्र की बात हो रही है, ऐसा होने पर न तो रोजगार मिलेगा और न हीं जो सपने संजोए वह ही पूरे होने वाले हैं.

रामकिशन कहते हैं कि संयंत्र लग जाए तो उनके बच्चों को बेहतर शिक्षा मिलने के लिए स्कूल स्थापित हो जाएगा, अस्पताल खुल जाएगा और एनटीपीसी की ओर से आईटीआई का प्रशिक्षण हासिल कर चुके बच्चों को रोजगार भी मिल जाएगा.

जब संयंत्र के लिए किसानों से जमीन ली गई थी, तब उनसे वादा किया गया था कि विद्यालय में प्रभावित किसानों के परिवारों के बच्चों को संयंत्र के कर्मचारियों के बच्चों की तरह दाखिला मिलेगा, स्वास्थ्य सेवाएं मिलेंगी. बिजली, पानी भी मिलेगा.

सामाजिक कार्यकर्ता राकेश मिश्रा कहते हैं कि बरेठी के साथ ही खरगोन व गाडरवारा संयंत्र की आधारशिला रखी गई थी, दोनों स्थानों के संयंत्र चालू होने वाले हैं, मगर बुंदेलखंड के साथ अन्याय हुआ है. थर्मल को सोलर में बदलने की तैयारी है. ऐसा हुआ तो किसानों से जमीन लेने की शर्त का उल्लंघन होगा, संयंत्र को दोबारा किसानों से समझौता करना पड़ेगा नहीं, तो संयंत्र स्थापित नहीं हो पाएगा.

इस संयंत्र के लिए बरेठी और उसके आसपास के गांव की जमीन का अधिग्रहण हुआ है, इस संयंत्र के तहत आसपास के पांच किलोमीटर क्षेत्र के किसानों को बिजली, पानी जैसी सुविधाएं मिलने वाली थीं. अब संयंत्र के अधूरे पड़े रहने से सुविधाएं तो छिनी ही, साथ में उनकी जमीन से भी मालिकाना हक खो चुके हैं. अब तो संयंत्र का कार्यालय भी लगभग बंद हो चुका है. एक से दो कर्मचारी ही यहां बचे हैं. केंद्र सरकार के रवैए से इस इलाके का किसान अपने को ठगा पा रहा है.