नई दिल्ली. मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा के नेता विपक्ष का चुनाव कर लिया है. विधायक गोपाल भार्गव को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है. पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने की अटकलों को विराम देते हुए और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की लोकसभा चुनाव की ‘रणनीति’ के तहत, भार्गव का चयन किया गया है. मीडिया रिपोर्टों की मानें तो गोपाल भार्गव को नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी देकर, भाजपा जहां एक तरफ एमपी में रूठे सवर्ण वोटरों को साधना चाहती है, वहीं पूर्व सीएम चौहान को आगामी लोकसभा चुनावों में बतौर पिछड़ा वर्ग के नेता के रूप में इस्तेमाल करना चाहती है. टाइम्स ऑफ इंडिया में बीते दिनों छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक संघ परिवार आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए इस रणनीति पर काम कर रहा है. वहीं, इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक, छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम रमण सिंह के नेता प्रतिपक्ष का पद छोड़े जाने के बाद भाजपा ने मध्यप्रदेश और राजस्थान में भी इसी नीति को ध्यान में रखते हुए चलने का फैसला किया है. इससे एक तरफ जहां इन पूर्व मुख्यमंत्रियों का लोकसभा में पार्टी-प्रचारक के रूप में इस्तेमाल हो सकेगा, वहीं राज्यों में पार्टी के अंदर इन नेताओं के प्रति कार्यकर्ताओं का आक्रोश भी कम किया जा सकेगा.

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टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक मध्यप्रदेश में हालिया विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद संघ परिवार नए सिरे से लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुट गया है. चूंकि विधानसभा चुनावों के नतीजे भाजपा के पक्ष में नहीं रहे, इसलिए भगवा खेमा आगामी चुनावों में अपनी तरफ से कोई कोर-कसर नहीं रखना चाहता है. यही वजह है कि संघ के इशारे पर ही पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान के बजाये किसी अन्य नेता को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने की तैयारी थी. माना जा रहा है कि सोमवार को गोपाल भार्गव के नाम की घोषणा, संघ की नीति के तहत ही की गई है. अखबार के मुताबिक, आरएसएस ने मध्यप्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों के सांसदों के परफॉर्मेंस के आंकड़े जुटाए हैं. इसके मुताबिक प्रदेश की मौजूदा परिस्थितियों और पार्टी के सांसदों के परफॉर्मेंस को देखते हुए शिवराज सिंह चौहान की उपयोगिता, नेता प्रतिपक्ष के रूप में उतनी लाभदायक नहीं है, जितनी कि वह स्वतंत्र रूप से बतौर प्रचारक भुनाए जा सकते हैं. यही वजह है कि चौहान को इस पद से मुक्त रखा गया है.

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इंडियन एक्सप्रेस की एक अन्य खबर के मुताबिक, चौहान नेता प्रतिपक्ष बनने के लिए खुद भी बहुत उत्साहित नहीं थे. साथ ही पार्टी को पिछड़ा वर्गों के लिए नेता के रूप में एक बड़े जमीनी नेता की दरकार भी थी. इसलिए भी उन्हें इस पद से मुक्त रखा गया. चौहान आगामी फरवरी महीने में बिहार में होने वाली भाजपा की पिछड़ा वर्ग की रैली को संबोधित करने वाले हैं. इसको देखते हुए यह संकेत मिल रहे हैं कि आगामी लोकसभा चुनावों में पार्टी उनका इस्तेमाल चुनाव प्रचारक के रूप में करेगी. यही फॉर्मूला छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी पार्टी लागू करने वाली है. छत्तीसगढ़ में जहां पूर्व सीएम रमण सिंह ने खुद ही यह पद छोड़ दिया है, वहीं राजस्थान में वसुंधरा राजे को भी ऐसे ही विकल्प पर विचार करने को कहा गया है. भाजपा इन आंचलिक-क्षत्रपों को केंद्रीय राजनीति में लाकर प्रदेशों में नए नेतृत्व की सुगबुगाहट की कवायद में भी जुटी है, ताकि पार्टी के लिए महत्वपूर्ण इन राज्यों में नया नेता मिल सके.