झाबुआ: मध्य प्रदेश का कोई भी आदिवासी बहुल इलाका हो, वह अपनी गरीबी और बदहाली की कहानी खुद बयां कर जाता है, मगर झाबुआ जिले के थांदला विकासखंड के छोटी बिहार गांव के पास बने एक चेकडैम के कारण ठहरे पानी ने यहां के खेतों को हरा-भरा कर दिया है और बढ़ी आमदनी से आदिवासियों की जिंदगी में बदलाव लाना शुरू कर दिया है. Also Read - यूपी विधानसभा में कर्मचारियों और गेस्ट को मिलेगा आधा गिलास पानी, जानें वजह

देश-दुनिया में जलपुरुष के नाम से चर्चित और स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह कहते हैं कि दौड़ते पानी को चलना सिखाइए, चलते पानी को रेंगना और रेंगते पानी को ठहराना. यह जलसंकट का आसान निदान है. लगता है, जैसे यह संदेश मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के आदिवासियों के लिए ही है, क्योंकि यहां हर साल दौड़कर निकल जाने वाला पानी अब ठहरा हुआ है. इसने यहां के आदिवासियों की जिंदगी को खुशहाल बना दिया है. Also Read - बॉलीवुड एक्टर रणदीप हुड्डा ने की पानी बचाने की अपील, सोशल मीडिया पर शेयर किया Video

होने लगी जमीन की सिंचाई 
चेकडैम बनने से कई किलोमीटर तक ठहरे पानी के कारण आसपास के लगभग 15 किसानों के 100 बीघा जमीन की सिंचाई होने लगी है. Also Read - सूखे की मार से झेल रहे बुंदेलखंड में पानी लिख रहा खुशहाली की इबारत

पैदावार दोगुना हो गई
पार सिंह बताते हैं, “साल में दो पैदावार लेने लगे हैं, उनकी पैदावार पहले से दोगुना हो गई है, यह सब चेकडैम बनने और पानी के रुकने से हुआ है, उन्हें कभी भी पानी की दिक्कत नहीं आती. हां, बिजली का संकट जरूर है, इस स्थिति में उन्हें किराए पर पंप लेकर चेकडैम से पानी खींचना पड़ता है, यह राशि उनकी आमदनी में से ही जाती है.”

अब खेती में पानी की कमी नहीं होती
यह चेकडैम आनंदना, कोका कोला इंडिया फाउंडेशन के सहयोग से एनएम सद्गुरु वाटर एवं डेवलपमंट फाउंडेशन ने बनाया है. सुकेन नदी पर बना यह चेकडैम छोटी बिहार के जलस्तर को बढ़ाने के साथ किसानों की जरूरत को पूरा कर रहा है. यहां सोयाबीन के अलावा मूंगफली और गेहूं की खेती में पानी की कमी नहीं होती.

किसानों के खेतों में फसल लहलहा रही
यहां के किसान मंगला बताते हैं, “अब तो मोटरसाइकिल भी खरीद ली है, यह इसलिए संभव हो पाया है, क्योंकि उनकी बीते दो वर्षो में खेती से होने वाली आमदनी दोगुनी हो गई है. एक साथ 15,000 रुपए उन्होंने विक्रेता को दिए और अब मासिक किश्त आसानी से चुका रहे हैं.”दीप सिंह झाला के चेहरे पर बिखरी खुशी को पानी की उपलब्धता के चलते उत्पादन बढ़ने से उनकी जिंदगी में आए बदलाव को साफ पढ़ा जा सकता है. वह कहते हैं कि उनकी ही नहीं छोटी बिहार के चेकडैम के आसपास के किसानों की खेतों में जो फसल लहलहा रही है, वह सिर्फ पानी मिलने के कारण है, यहां के अधिकतर किसानों की पैदावार पहले से दोगुनी से ज्यादा हो गई है. अब तो वे तुअर तक उगा रहे हैं.

आमदनी बढ़ी है तो जीवनशैली भी बदली 
छोटी बिहार का चेकडैम साल 2016-17 में बनाया गया था, और बीते दो सालों में ही यहां के आदिवासियों को इसका लाभ मिलने लगा है. अब उन्हें पानी की समस्या से निजात तो मिला ही है, साथ ही उनकी दूसरों पर निर्भरता कम हुई है. आमदनी बढ़ी है तो आत्मविश्वास और जीवनशैली भी बदल चली है. बच्चों को पढ़ने भेजने लगे हैं और महिलाएं खेती के काम में ज्यादा हाथ बंटाने लगी हैं.

सहयोग से 29 चेकडैम बनाए
कोका कोला इंडिया के लोक मामलों, संचार और स्थायित्व (पब्लिक अफेयर, कम्युनिकेशन और सस्टेनिबिलिटी) के वाइस प्रेसीडेंट इश्तियाक अमजद ने कहा, “आनंदना, कोकाकोला इंडिया फाउंडेशन जल संरक्षण और समस्या के समाधान के लिए जमीनी स्तर पर संगठनों के साथ काम करता है. झाबुआ के थांदला विकास खंड में एनएम सदगुरु वाटर एवं डेवलपमंट फाउंडेशन के साथ मिलकर कुल 29 चेकडैम बनाए हैं, इनमें 23 नए हैं तो छह मौजूदा बांधों का पुरुद्धार किया है. एकीकृत वाटर शेड कार्यक्रम के तहत बनाई गई संरचनाओं से पानी की उपलब्धता बढ़ी है, भूजल स्तर में सुधार आया है और स्थानीय परिस्थितिकीय तंत्र मजबूत हुआ है.”उन्होंने बताया कि पानी की उपलब्धता के कारण किसान सर्दियों के मौसम में भी फसल लेने लगे हैं और उनकी आमदनी में बढ़ोतरी हुई है.

जून-जुलाई तक मिलता रहेगा पानी 
एनएम सदगुरु वाटर एवं डेवलपमेंट फाउंडेशन की उप संचालक (डिप्टी डायरेक्टर) सुनीता चैहान बताती हैं कि झाबुआ के थांदला विकासखंड में पानी की समस्या थी, बारिश का पानी नदी और नालों से बह जाया करता था, अब उसे चेकडैमों ने रोक दिया है, इस पानी की उपलब्धता जून-जुलाई तक रहेगी, इससे एक तरफ किसानों को जहां सिंचाई को पानी मिलने लगा है, वहीं महिलाओं को भी अब ज्यादा परेशान नहीं होना पड़ता.

आदिवासी किसान बदलते दौर की इबारत लिखेंंगे  
झाबुआ के इस इलाके के किसानों की जिंदगी में पानी की उपलब्धता से बड़ा बदलाव आने लगा है, बच्चों से लेकर महिलाएं तक आत्मविश्वास से भरी नजर आती हैं, अगर यही क्रम आगे बना रहा तो दीन-हीन, गरीब और पिछड़ा समझा जाने वाला आदिवासी किसान बदलते दौर की इबारत लिखेगा.