नई दिल्ली: 15 साल बाद मध्यप्रदेश की सत्ता से शिवराज सिंह चौहान को बेदखल करने का सपना देख रही कांग्रेस की अंदरूनी कलहबाजी मीडिया के सामने आ गई है. मीडिया में लंबे समय से ऐसी खबरे आ रही हैं कि कांग्रेस एमपी में कई खेमों में बंटी हुई है. सीएम पद को लेकर भी यहां कई दावेदार हैं. कांग्रेस के सीनियर नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्वजिय सिंह को इस बार कांग्रेस कोई खास तवज्जो नहीं दे रही है. यही कारण है कि उनका दर्द छलक उठा और उन्हें कहना पड़ा कि उनके भाषण देने से पार्टी के वोट कटते हैं. दिग्विजय सिंह का कहना है कि उनके भाषणों से कांग्रेस को नुकसान होता है इसलिए वह कोई रैली या जनसभा नहीं करते.

न्यूज एजेंसी एएनआई के मुताबिक इलेक्शन कैंपेन के दौरान भोपाल में दिग्विजय सिंह ने कहा, जिसको टिकट मिले, चाहे दुश्मन को मिले, जिताओ. मेरा काम केवल एक है. कोई प्रचार नहीं, कोई भाषण नहीं. मेरे भाषण से तो कांग्रेस के वोट कटते हैं. इसलिए मैं कहीं नहीं जाता. इंटरनेट पर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ, चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ ही समन्वय समिति के अध्यक्ष दिग्विजय सिंह भी सबसे ज्यादा सर्च किए जाने वाले नेताओं में शामिल हैं लेकिन इस बार वह कांग्रेस की रैलियों और जनसभाओं से गायब हैं.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जब औपचारिक तौर पर भोपाल से पार्टी के लिए प्रचार अभियान शुरू किया था और रोड शो किया था तो भेल दशहरा मैदान में रैली स्थल पर दिग्विजय सिंह के कटआउट नहीं दिखाई दिए. पूरे शहर में जहां तमाम कांग्रेसी नेताओं की तस्वीरें और होर्डिंग दिखाई दे रहीं थीं, वहीं दिग्विजय सिंह की होर्डिंग नजर ना आने से पार्टी की आपसी गुटबाजी भी साफ नजर आई. हालांकि इसके लिए बाद में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने उनसे माफी मांगी थी.

गौरतलब है कि बीएसपी प्रमुख मायावती ने मध्यप्रदेश चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन करने से इनकार कर दिया था. इसके लिए उन्होंने दिग्विजय सिंह को जिम्मेदार ठहराया था. मायावती ने दिग्विजय सिंह को संघ का एजेंट बताते हुए कहा था कि सोनिया और राहुल गांधी के ईमानदार प्रयासों के बावजूद उनके जैसे कुछ नेता नहीं चाहते कि कांग्रेस-बीएसपी गठबंधन हो.

दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं. साल 1993 में वह पहली बार मुख्यमंत्री बने थे. इसके बाद वह 1998 में भी सरकार बनाने में कामयाब हो गए थे. साल 2003 के चुनाव में उमा भारती ने दिग्विजय सिंह को मात दी. यह साल दिग्विजय सिंह की राजनीति के लिए सबसे खराब साबित हुआ. चुनाव प्रचार के दौरान ही दिग्विजय सिंह ने कहा था कि यदि उमा भारती चुनाव जीत गईं तो वह 10 साल तक चुनाव नहीं लड़ेंगे और मध्यप्रदेश की राजनीति में सीधा दखल नहीं रखेंगे. चुनाव में उनकी हार हुई और वह राज्य की राजनीति से अलग हो गए.