नई दिल्ली:मध्य प्रदेश में 28 नवंबर को विधानसभा चुनाव की वोटिंग होनी है. लगभग सभी चुनावी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं. चुनाव प्रचार थम चुका है, और इस बार चंबल भी शांत है. मध्य प्रदेश में चुनाव के बीच यह पहला मौका है जब न कोई फरमान है और मतदाताओं के लिए न कोई संदेश. न किसी डकैत का कोई रिश्तेदार मैदान में है और न ही कोई पूर्व डकैत चुनावी मैदान में है. यही वजह है कि इस बार मध्य प्रदेश चुनाव में चंबल इलाके की विधानसभा सीट इस बार डकैतों से प्रभावित नहीं हैं.Also Read - भोपाल में सरेआम लड़की से बुर्का उतरवाया, सोशल मीडिया पर Viral हुआ Video

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मुनादी कराकर बताया जाता था फेवरेट प्रत्याशी का नाम, डर से वोट डालने को नहीं निकलते थे लोग Also Read - MP: 16 साल के लड़के ने की खुदकुशी, सुसाइड नोट में PM मोदी से अपनी अंतिम इच्‍छा पूरी करने का आग्रह कर गया

मध्य प्रदेश में विंध्यांचल, चित्रकूट, ग्वालियर, भिंड, मुरैना इलाकों की कई सीटों पर राजनैतिक दलों, नेताओं, प्रशासन से ज़्यादा डकैतों का फरमान चलता था. चंबल पर शोध कर चुके है शाह आलम बताते हैं कि चुनाव से कुछ दिन पहले से लेकर मतदान होने तक मुनादी कराई जाती थी. डकैत जिस प्रत्याशी या राजनैतिक दल के पक्ष में वोटिंग चाहते थे, इलाके में उसके पक्ष में मतदान करने की सूचना पहुंचा देते थे. यह सिर्फ मुनादी भर नहीं होती थी, बल्कि चेतावनी भी होती थी कि अगर उनके बताए प्रत्याशी के लिए वोट नहीं डाला तो अंजाम बुरा होगा. इसके एवज में नाक काटी जा सकती है या जान ली जा सकती है. वह बताते हैं कि डकैतों का इतना खौफ होता था कि प्रशासन कितना भी कहे या कितनी भी सुरक्षा दे, लेकिन मतदाता वोट डालने तक राजी नहीं होते थे. लोग घरों तक से नहीं निकलते थे.

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लोगों को लगता था नेता रक्षा नहीं कर पाएंगे

शाह आलम बताते हैं कि डकैतों द्वारा प्रत्याशियों से रंगदारी मांगी जाती थी. ताकतवर प्रत्याशी भी डकैतों की बात माना करते थे. यही वजह है कि ददुआ जैसे खूंखार डकैत के परिजन, बेटा, भाई राजनीति में रहे और बड़े दलों से टिकट पाकर चुनाव भी जीते. चंबल इलाके के जानकार योगेश जादौन बताते हैं कि लोगों को पता था कि वह वोट के मामले में अपनी मर्जी चला लें, लेकिन इसके बाद भी उनका भला नहीं होने वाला है. पुलिस या नेता उनकी हमेशा रक्षा नहीं कर पाएंगे, इसलिए डकैतों की बात मानना ही सुरक्षा की गारंटी थी.

इन डकैतों का रहा है प्रभाव

चंबल के लगभग सभी ताकतवर डकैत चाहते थे कि वह चुनावी चर्चा में रहें. कुछ डकैत ऐसे हैं जिनके नाम की तूती बोलती थी. शिव कुमार पटेल उर्फ ददुआ इन्हीं नामों में से एक है. बताते हैं कि ददुआ के गिरोह द्वारा इलाकों को पर्चे चिपका दिए जाते थे कि वोट किसे करना है. सैकड़ों खूंखार अपराधों को अंजाम देने वाले ताकतवर ददुआ को मार गिराया. इसके बाद भी ददुआ का प्रभाव जारी रहा. ददुआ का प्रभाव यूपी तक में था. इसलिए दोनों इलाकों में ही ददुआ के परिजनों को भी हाथों-हाथ लिया जाता था. ददुआ के छोटे भाई बाल कुमार पटेल यूपी की मिर्जापुर सीट से 2009-2014 तक सांसद रहे. ददुआ के बेटे राम सिंह को प्रतापगढ़ सीट से सपा के टिकट पर विधायक चुना गया. ददुआ के परिजनों का प्रधानी से लेकर विधायक, सांसद चुनाव में दखल था. ददुआ के बेटे वीर सिंह को मध्य प्रदेश से सटी चित्रकूट सीट से विधायक चुना गया. ददुआ के भाई बाल कुमार पटेल खुद अभी मध्य प्रदेश में सपा की चुनाव कमेटी के सदस्य हैं, लेकिन इस बार उनके परिवार में से कोई मध्य प्रदेश में किसी भी पार्टी से चुनाव नहीं लड़ रहा है.

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मशहूर डकैत पान सिंह तोमर के रिश्तेदार डकैतों का रहा राजनीति में दखल

अंतरराष्ट्रीय एथलीट से डकैत बने पान सिंह तोमर से जुड़े लोग भी राजनीति में रहे. पान सिंह तोमर के रिश्तेदार बलवंत सिंह पान सिंह तोमर के साथ बीहड़ों में रहते थे. सतना, भिंड, मुरैना इलाकों में इनका प्रभाव था. बलवंत सिंह चुनाव प्रचार में सक्रिय रहते थे. डाकू मनोहर सिंह 1995 में भिंड ज़िले की मेहगांव नगर पालिका के अध्यक्ष चुने गए. उन्हें बीजेपी ने टिकट दिया था. इस बार दोनों ही न ही किसी भी पार्टी के पक्ष में प्रचार नहीं कर रहे हैं. न ही किसी का समर्थन कर रहे हैं. इसी तरह से पूर्व डाकू मलखान सिंह बीजेपी के लिए सक्रिय थे, हालांकि वह इस बार भी बीजेपी की रैलियों में नजर आए, यकीन उतनी चर्चा नहीं मिली. 2013 में विधानसभा चुनाव में पूर्व डकैत प्रेम सिंह कांग्रेस की टिकट पर मध्यप्रदेश के सतना जिले की चित्रकूट सीट से चुनावी लड़े और जीते. वह इसी सीट से तीन बार विधायक रहे.

अब बीहड़ में चुनावी हलचल नहीं होती

पत्रकार केपी सिंह कहते हैं कि निर्भय गुर्जर जैसे डकैत हुआ करते थे, जो चुनाव में बात नहीं मानने पर लोगों की नाक तक काट लिया करते थे, लेकिन अब प्रभाव पूरी तरह से ख़त्म हो गया है. अपहरण और हत्या कर देते थे. अब मध्य प्रदेश के बीहड़ों में डाकू बबुली कोल और डाकू गोप्पा का आतंक है, लेकिन उन्होंने किसी भी तरह से चुनाव में दखल नहीं दिया है. यह इस बात का संकेत है कि जिस चम्बल से कभी फूलन देवी जैसी दस्यु सुंदरी राजनीति में सफल हुईं, उसमें अब कोई राजनीतिक हलचल नहीं होती है.