निवाड़ी (मध्य प्रदेश): मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव है. दो दिन बाद 28 नवंबर को यहां मतदान होना है. मध्य प्रदेश एक ऐसा राज्य है, जो कई ऐतिहासिक विरासत सहेजे हुए है. मध्य प्रदेश के निवाड़ी जिले का गढ़कुंडार का किला भी कुछ ऐसा ही है. गढ़कुंडार में हर साल महोत्सव होता है जिसमें मध्य प्रदेश की बड़ी राजनैतिक हस्तियां हिस्सा लेने पहुंचती हैं. किला पिछले सैकड़ों सालों से इतनी कहानियों का गवाह है कि वृन्दावन लाल वर्मा ने इस पर पूरी किताब लिखी है. यह किला 11वीं सदी में बना था. बताते हैं कि ये किला इतना रहस्मयी है कि यहां घूमने गई पूरी बरात गायब हो गई थी. इसका इतिहास मोहम्मद बिन तुगलक से भी जुड़ा है. यहां की राजकुमारी इतनी खूबसूरत थी कि मोहम्मद बिन तुगलक ने उससे शादी करने की ठान हमला कर दिया था. राजकुमारी ने बचने के लिए कई महिलाओं के साथ ही आग के कुएं में कूद जौहर कर लिया था. माना जाता है कि किले के भूतल में इतना खजाना मौजूद है कि अगर मिल जाए तो पूरा देश अमीर हो सकता है.

5 मंजिल का है किला
11वीं सदी में बना यह किला 5 मंजिल का है. 3 मंजिल तो ऊपर है, जबकि 2 मंजिल ज़मीन के अंदर यानी भूतल में है. किला एक ऊँची पहाड़ी पर एक हेक्टेयर से अधिक वर्गाकार भूमि पर बना हुआ है. किला इस तरह बनाया गया कि यह 4-5 किलोमीटर दूर से तो दिखता है, लेकिन नज़दीक आते-आते किला दिखना बंद हो जाता है. जिस रास्ते से किला दूर से दिखता है. अगर उसी रास्ते से आएंगे तो यह रास्ता भी किले की बजाय कहीं और जाता है. जबकि किले के लिए दूसरा रास्ता है.

किले की कई जगहें ऐसी हैं जो रहस्मयी लगती हैं. किले के भूतल को बंद कर दिया गया है.

किले की कई जगहें ऐसी हैं जो रहस्मयी लगती हैं. किले के भूतल को बंद कर दिया गया है.

 

रहस्यमयी किले में है खजाने का रहस्य, घूमने आई बरात हो गई थी गायब
माना जाता है कि इसके भूतल में कई रहस्य अभी भी मौजूद हैं. इसके दो मंजिला भूतल को बंद कर दिया गया है. इतिहासकार हरिगोविन्द सिंह कुशवाहा बताते हैं कि गढ़कुंडार बेहद संपन्न और पुरानी रियासत रही है. यहां के राजाओं के पास सोना, हीरे, जवाहरात की कमी नहीं रही. कई विदेशी ताकतों ने खजाने को लूटा. स्थानीय चोर उचक्कों ने भी खजाने को तलाशने के कई प्रयास किए. वह कहते हैं कि इस किले में इतना सोना चांदी है कि भारत जैसा देश भी अमीर हो जाए. मान्यता है कि किले के नीचे दो मंजिला भवन में खजाने का रहस्य है. बताया जाता है कि काफी समय पहले यहां पास ही गांव में एक बरात आई थी. बरात यहां किले में घूमने आई. घूमते-घूमते बरात के लोग इसके दो मंजिला नीचे भूतल में चले गए. नीचे जाने पर भूतल में ही बरात गायब हो गयी. इसके बाद 50-60 लोगों का पता नहीं चल सका. इस घटना के बाद किले के नीचे जाने वाले दरवाजों को बंद कर दिया गया है.

राजकुमारी केसर दे ने तुगलक से बचने की दी थी जान, बौना चोर को पकड़ना था मुश्किल
एक और भयावाह घटना इस किले से जुडी हुई है. यहां के राजा मान सिंह थे. उनकी बेटी केसर दे की खूबसूरती के चर्चे थे. मुग़ल बादशाह मोहम्मद बिन तुगलक ने ये सुन केसर दे के लिए डोला (रिश्ता) भेजा, लेकिन राजा मान सिंह ने इसे मानने से इंकार कर दिया. इससे गुस्साए तुगलक ने गढ़कुंडार के किले पर आक्रामण कर दिया. तुगलक से बचने के लिए रानी केसर दे ने किले एक कुएं में आग जलवाकर उसमे कूद जौहर कर लिया था. रानी के साथ करीब 100 महिलाओं ने जान दी थी. इसके साथ बौना चोर की कहानियां भी इस किले से जुड़ी हैं. किले में बौने कद के चोर का कभी आतंक हुआ करता था. वह इतनी शातिर तरीके से चोरी करता था कि उसे पकड़ना बेहद मुश्किल होता था.

किले की इतनी कहानियां हैं कि इस पर पूरी किताब लिखी गई है.

किले की इतनी कहानियां हैं कि इस पर पूरी किताब लिखी गई है.

 

चन्देलों-खंगारों का रहा शासन, ये है किले का इतिहास
यह किला चंदेल काल में चंदेलों का सूबाई मुख्यालय व सैनिक अड्डा था. यशोवर्मा चंदेल (925-40 ई.) ने दक्षिणी-पश्चिमी बुंदेलखंड को अपने अधिकार में कर लिया था. इसकी सुरक्षा के लिए गढ़कुंडार किले में कुछ निर्माण कराया गया था. इसमें किलेदार भी रखा गया.1182 में चंदेलों-चौहानों का युद्ध हुआ, जिसमें चंदेल हार गए. इसमें गढ़कुंडार के किलेदार शियाजू पवार की जान चली गई. इसके बाद ही यहां नायब किलेदार खेत सिंह खंगार ने खंगार राज्य स्थापित कर दिया. 1182 से 1257 तक यहां खंगार राज रहा. इसके बाद बुंदेला राजा सोहन पाल ने यहाँ खुद को स्थापित कर लिया. 1257 से 1539 ई. तक यानी 283 साल तक इस पर बुंदेलों का शासन रहा. इसके बाद यह किला वीरान होता चला गया.1605 के बाद ओरछा के राजा वीर सिंह देव ने गढ़कुंडार की सुध ली. और जीर्णोधार कराया. 13वीं से 16 वीं शताब्दी तक यह बुंदेला शासकों की राजधानी रही. 1531 में राजा रूद्र प्रताप देव ने गढ़ कुंडार से अपनी राजधानी ओरछा बना ली.

खंगारों को जाता है नई पहचान देने का श्रेय
गढ़कुंडार किले के पुनर्निर्माण और इसे नई पहचान देने का श्रेय खंगारों को है. खेत सिंह गुजरात राज्य के राजा रूढ़देव का पुत्र था. रूढ़देव और पृथ्वीराज चौहान के पिता सोमेश्वर सिंह अभिन्न मित्र हुआ करते थे. इसके चलते पृथ्वीराज चौहान और खेत सिंह बचपन से ही मित्र हो गए. राजा खेत सिंह की गिनती पृथ्वीराज के महान सेनापतियों में की जाती थी. इस बात का उल्लेख चंदबरदाई के रासो में भी है. गढ़कुंडार में खेत सिंह ने खंगार राज्य की नींव डाली थी.