कांग्रेस के सीनियर नेता 80 साल के रविशंकर शुक्ल जब मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तो किसी ने याद दिलाया कि आज तो अमावस्या की रात है. शुक्ल थोड़ा असहज हुए, हालांकि तुरंत ही संभले और कहा, इस अंधेरे को मिटाने के लिए हजारों दिए तो जल रहे हैं. एक नवंबर 1956 जिस दिन मध्य प्रदेश का जन्म हुआ उस दिन दिवाली और अमावस्या एक साथ थी. पत्रकार और लेखक दीपक तिवारी अपनी किताब राजनीतिनामा मध्यप्रदेश राजनेताओं के किस्से (1956 से 2003) में इस घटना का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि अमावस्या की रात का असर था या नहीं, लेकिन इसे विधि का विधान ही कहा जाएगा कि शपथ ग्रहण के दो महीने बाद ही शुक्ल इस दुनिया में नहीं रहे. Also Read - UP Vidhan Parishad Election: यूपी विधान परिषद की 11 सीटों के लिए हुए चुनाव में 55.47% मतदान

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तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने जब नए मध्यप्रदेश का नक्शा देखा तो कहा कि यह ऊंट की तरह दिखने वाला राज्य बना दिया. जबलपुर को मध्य प्रदेश की राजधानी बनना था, लेकिन बन गया भोपाल. विरोध में जबलपुर के लोगों ने दिवाली नहीं मनाई. मध्य प्रदेश के पहले सीएम रविशंकर शुक्ल 2 अगस्‍त 1877 को सागर में पैदा हुए थे. यहीं उन्होंने स्कूली शिक्षा हासिल की. शुक्ल खैरागढ़ राज्‍य के हाई स्‍कूल और बस्‍तर कवर्धा व खैरागढ़ के राजकुमारों के शिक्षक रहे, लेकिन मन नहीं लगा और उन्होंने टीचिंग छोड़ वकालत शुरू कर दी.

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महात्‍मा गांधी के नेतृत्‍व में असहयोग आंदोलन प्रारंभ होने पर शुक्ल वकालत छोड़कर राजनीति में आ गए. प्रदर्शन करने के लिए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. 1930 में तीन साल की सजा हुई साथ ही उन पर 500 रुपए का जुर्माना भी लगा. इतना ही नहीं वकीलों की लिस्ट से उनका नाम हटा दिया गया. हालांकि 1935 में उन्होंने फिर से वकालत शुरू कर दी. मध्य प्रदेश राज्य बनने से पहले 1936 में प्रान्‍तीय धारा सभा के चुनाव में बहुमत से कांग्रेस की विजय हुई और डॉक्‍टर एन.बी. खरे के नेतृत्‍व में मंत्रिमण्‍डल बना, शुक्ल शिक्षा मंत्री बने और आपने विद्यामंदिर योजना का सूत्रपात किया. इसकी तारीफ महात्‍मा गांधी ने की थी. शिक्षा के क्षेत्र में यह एक नया प्रयोग था.

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कहा जाता है कि रविशंकर शुक्ल के घर में 52 कमरे थे. मेहमानों के सत्कार के लिए उनकी ख्याति कक्का के रूप में थी. हालांकि शुक्ल परंपरावादी कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे. उन्होंने 1912 में मध्य प्रदेश कान्यकुब्ज ब्राह्मण महासभा की स्थापना करवाई. वह अपने साथ खुद का रसोइया लेकर चलते थे. उन पर ब्राह्मण को प्रश्रय देने का आरोप लगा, खासकर कान्यकुब्ज ब्राह्मणों को. एक समय तो ऐसी स्थिति बन गई कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर चेतावनी देनी पड़ी कि मध्यप्रदेश शासन में कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के पक्ष में कुछ ज्यादा ही माहौल है. नेहरू ने यह पत्र 1956 में द्वारिका प्रसाद मिश्र जो कि कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे सागर विश्वविद्यालय का कुलपति निर्वाचित करने पर लिखा था.

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रविशंकर शुक्ल के 6 बेटे और तीन बेटियां थीं. बाद में उनके बेटे श्यामाचरण शुक्ल तीन बार सीएम बने. वहीं विद्याचरण शुक्ल ने हमेशा केंद्र की राजनीति की. दोनों भाई लंबे समय तक राजनीति में सक्रिय रहे. जब मध्य प्रदेश बना उस समय कांग्रेस ने रविशंकर शुक्ल को सीएम तो बना दिया लेकिन दो महीने बाद ही आलाकमान ने उन्हें हटाने का फैसला कर लिया. 1957 में होने वाले आम चुनावों में प्रत्याशियों की लिस्ट पर मुहर लगवाने के लिए वह दिल्ली आए थे. उस समय पार्टी ने कहा कि आपको राज्यपाल बनाकर कहीं और भेजने पर विचार किया जा रहा है. कहा जाता है कि उन्हें बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि दो महीने में ही पार्टी उन्हें सीएम पद से हटा देगी. उन्हें बहुत गहरा धक्का लगा और हार्ट अटैक से उनकी मौत हो गई.