सचिन श्रीवास्तव
मुंगावलीः चुनावी राजनीति में जीत-हार के मायने हमेशा बड़े होते हैं. एक ऐसे समय में जब मध्य प्रदेश की जनता आगामी विधानसभा चुनावों को बदलाव के मौके के रूप में देख रही है, तब हार-जीत के मायने भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं. इसीलिए कोलारस और मुंगावली के चुनावी नतीजे संकेतों से कहीं ज्यादा महत्व रखते हैं. असल में ये नतीजे ऐतिहासिक भी हो सकते हैं. इन चुनावों के नतीजे ज्योतिरादित्य सिंधिया की प्रदेश की राजनीति में राह आसान करेंगे, यह तय हो चुका है. Also Read - राहुल गांधी का मोदी सरकार पर हमला, बोले- जब जब देश भावुक हुआ, फाइलें गायब हुईं

गौरतलब है कि 24 फरवरी को दोनों विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव के लिए वोटिंग हुई थी. मुंगवली में 77.05 फीसदी मतदान दर्ज किया गया था तो कोलारस में 70.4 फीसदी वोटिंग हुई थी. मतगणना के दौरान सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे. कोलारस उपचुनाव के वोटों की गिनती 23 राउंड में और मुंगावली में मतों की गणना 19 राउंड में हुई. कोलारस उपचुनाव में 22 और मुंगावली में 13 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे. बता दें कि दोनों स्थानों पर कांग्रेस विधायकों के निधन के चलते उपचुनाव कराए गए थे. कोलारस में कांग्रेस के महेंद्र यादव का भाजपा के देवेंद्र जैन से मुकाबला था, वहीं, मुंगावली में कांग्रेस के बृजेंद्र यादव के सामने भाजपा के बाई साहब थे. Also Read - पंजाब में कांग्रेस का कलह: MP प्रताप सिंह बाजवा के बागी बोल, अमरिंदर सरकार वापस लेगी सिक्‍युरिटी

असली लड़ाई सिंधिया और शिवराज के बीच
यह उपचुनाव भाजपा और कांग्रेस के लिए नाक की लड़ाई हो चुके थे. एक तरफ जहां शिवराज सिंह सरकार का पूरा मंत्रिमंडल और विधायकों की बड़ी टोली थी. वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने अपने गढ़ में बीते डेढ़ दशक से कोई उपचुनाव न हारने के रिकॉर्ड को बरकरार रखने की चुनौती थी. इन दोनों ही उपचुनाव में प्रत्याशी महज औपचारिकता भर थे, असली लड़ाई तो मध्य प्रदेश की राजनीति के दो सबसे लोकप्रिय चेहरों के बीच थी और नतीजों से स्पष्ट हो गया है कि ज्योतिरादित्य अपने गढ़ को बचाने के साथ-साथ लोकप्रियता की जंग में भी आगे निकल चुके हैं. Also Read - कांग्रेस को फिर लगा बड़ा झटका, पूर्व मंत्री सहित दो बड़े नेताओं ने छोड़ी पार्टी, भाजपा में हुए शामिल

इन चुनावी नतीजों से ज्योतिरादित्य सिंधिया का कद कांग्रेस की प्रदेश स्तरीय राजनीति में कुछ और ऊंचा हो जाएगा. वहीं शिवराज सिंह सरकार को जनता का साफ इशारा है कि वह अपनी घोषणाओं को जमीन पर उतारने की कवायद भी करें. इस बड़ी जीत के साथ यह साफ हो गया है कि कांग्रेस के भीतर ज्योतिरादित्य सिंधिया को अब और तीखी चुनौती मिलने के आसार हैं.

क्या लोकल फैक्टर रहे पीछे
किसी भी विधानसभा उपचुनाव की ऊपरी तस्वीर तो प्रदेश स्तर की राजनीति को ही इंगित करती है, लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि आखिर जनता के लिए रोजमर्रा की तकलीफें वोट से हल होने की उम्मीद होती है. ऐसे में समझा जाना चाहिए कि इन दोनों चुनावों के नतीजों की आहट उस तकलीफ का बड़ा मिसरा है. मुंगावली की बात करें तो यहां कांग्रेस के महेंद्र सिंह कालूखेड़ा के निधन के बाद कई उम्मीदवार थे, जो कांग्रेस के लिए जीत तय कर सकते थे, लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ब्रजेन्द्र सिंह यादव पर दांव खेला. इसकी बड़ी वजह क्षेत्र में यादव वोटरों का प्रभुत्व है. यह यादव प्रभुत्व दिवंगत देशराज सिंह यादव की राजनीतिक जमीन की देन था. इसी वजह से भाजपा ने भी देशराज सिंह यादव की पत्नी बाई साहब पर दांव लगाया. लेकिन कांग्रेस को जो बढ़त मिली वह आदिवासी और दलित वोटरों की बदौलत मिली है. वहीं जैन वोटरों के लगभग आधे-आधे वोट दोनों पार्टियों के पास गए हैं. अन्य गैर-दलित वोटों में भाजपा को ज्यादा फायदा मिला.

मतदाताओं पर खूब हुई पैसे की बारिश
कोलारस की बात करें तो यहां स्थानीय स्तर पर प्रत्याशी का चेहरा ज्यादा महत्वपूर्ण रहा और आखिरी वक्त में कांग्रेस प्रत्याशी की पिटाई का मुद्दा भी मतदाता का रुझान बदलने की कामयाब रणनीति साबित हुआ. इन चुनावों से एक बात और साफ हुई है कि भाजपा और कांग्रेस चुनाव जीतने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं. उपचुनावों में पैसे की बारिश मतदाताओं पर खूब हुई है, लेकिन अब मतदाता पैसों से प्रभावित भी होगा, यह कोई तयशुदा ढंग से नहीं कह सकता. सूत्र तो यह भी कहते हैं कि शहरी क्षेत्रों में मतदाताओं को लुभाने के लिए 500 से हजार रुपए तक और ग्रामीण क्षेत्रों में 200 से 500 रुपए तक दिए गए.

बहरहाल, चुनावी राजनीति की अपनी मजबूरियां, परेशानियां और चेहरा है. इस चेहरे को इन उपचुनावों ने बेनकाब भी किया है, तो वहीं काफी हद तक बनी-बनाई मान्यताओं को मजबूत भी किया है. राजनीतिक दलों को समझना होगा कि अब वह महज वायदों से जनता बहलने वाली नहीं है. 14 साल के वादों को 5 महीने में पूरा करने की जल्दबाजी में भाजपा भूल गई थी कि महज कुछ दिनों के लिए क्षेत्र में दिग्गजों को उतारकर वह जनता को जो संदेश देना चाहती है, वह वोटर अच्छी तरह से समझता है. बीते कुछ महीनों में ज्योतिरादित्य सिंधिया जिस तरह बुंदेलखंड और प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हुए हैं, उससे लगता है कि आने वाले चुनावों पर मुंगावली-कोलारस के उपचुनावों को लंबे समय तक याद रखा जाएगा.

(लेखक पत्रकार हैं. लेख में व्यक्त विचार उनके अपने हैं)