देश के पांच राज्यों में विधानसभा के चुनावी माहौल के बीच, राजनीति में रुचि रखने वालों की नजर सबसे ज्यादा जिस राज्य पर टिकी है, वह है मध्यप्रदेश. चुनाव-पूर्व विभिन्न सर्वेक्षणों में छत्तीसगढ़ के साथ मध्यप्रदेश में भी भाजपा और कांग्रेस के बीच तीखी चुनावी लड़ाई की बात कही जा रही है. ऐसे में मध्यप्रदेश की राजनीति और वहां के सियासतदानों की चर्चा लाजिमी हो जाती है. और यह चर्चा जरूरी भी है क्योंकि मध्यप्रदेश न सिर्फ देश का हृदयप्रदेश कहा जाता है, बल्कि विभिन्न कालखंडों में यहां के कई दिग्गज राजनीतिज्ञ अपनी राजनीति से देश को प्रभावित करते रहे हैं. ऐसे ही राजनीतिज्ञों की जमात का एक नाम है अर्जुन सिंह. यह महज संयोग ही है कि जिस नवंबर महीने में मध्यप्रदेश में चुनावी संग्राम छिड़ा हुआ है, उसी महीने में वर्ष 1930 में प्रदेश के चुरहट नामक स्थान पर अर्जुन सिंह का जन्म हुआ था. उनका नाम चर्चित भोपाल गैस त्रासदी के साथ भी जोड़कर देखा जाता है. क्योंकि भोपाल में यूनियन कार्बाइड के जिस प्लांट में वर्ष 1984 में जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस का रिसाव हुआ और हजारों लोग प्रभावित हुए, उस समय मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ही थे. इसके अलावा चुरहट लॉटरी केस में भी अर्जुन सिंह का नाम आया था. Also Read - अस्पताल में भर्ती भाजपा सांसद को देखने गए पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़

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सियासत की बारीकियां समझने वाला नेता
अर्जुन सिंह का नाम मध्यप्रदेश के ऐसे कांग्रेस नेताओं में शुमार किया जाता है, जो कांग्रेस में रहते हुए भी पार्टी के अलग-अलग गुटों से सामंजस्य बनाने में उस्ताद माने जाते थे. वरिष्ठ पत्रकार और मध्यप्रदेश को नजदीक से जानने वाले डॉ. रामशरण जोशी ने अपनी किताब ‘अर्जुन सिंहः एक सहयात्री इतिहास का’ में इसे बखूबी लिखा भी है. नजीर के तौर पर देखें तो अर्जुन सिंह ने मध्यप्रदेश के कद्दावर नेता और सीएम रहे डीपी मिश्रा के साथ भी अपनी ‘केमिस्ट्री’ बनाए रखी तो वहीं उनकी सोच के उलट देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू और उनकी बेटी इंदिरा गांधी के भी करीबी बने रहे. इसके अलावा इमरजेंसी के दिनों में जब कांग्रेस में संजय गांधी का प्रभाव बढ़ा तो सिंह ने इंदिरा के बेटे के साथ भी करीबी बना ली. यह सही मायने में सिर से पांव तक राजनीतिज्ञ होना माना जा सकता है. उनके कांग्रेस पार्टी में विधायक से लेकर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनने, केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालय संभालने और एक समय में प्रधानमंत्री पद के बड़े दावेदार माने जाने तक के सफर को देखें, तो सियासत के खेल को समझने की यही कला अर्जुन सिंह को बाकी नेताओं से अलग करती है. Also Read - यूपी के मंत्री ने कहा- कांग्रेस ने भ्रम फैलाकर पाया वोट, पछता रहे हैं मध्यप्रदेश के लोग

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ज्योतिषी ने बचपन में ही कर दी थी भविष्यवाणी
अर्जुन सिंह मध्यप्रदेश के रीवा राजघराने से ताल्लुक रखते थे. उनके पिता रीवा राजघराने के अंतर्गत चुरहट के जागीरदार थे. इसलिए बचपन से ही अर्जुन सिंह का लालन-पालन पूरे ऐशो-आराम के साथ हुआ था. उनके जन्म के करीब 10 साल बाद पिता राव साहब शिव बहादुर सिंह ने अपने दोनों बेटों की कुंडली ज्योतिषी से दिखवाई थी. अर्जुन सिंह और उनके भाई डॉ. सज्जन सिंह की कुंडली देखते ही ज्योतिषी ने जो भविष्यवाणी की थी, वह आगे चलकर एकदम सही साबित हुई. ज्योतिषी ने दोनों भाइयों की कुंडली देखकर राव साहब से कहा था कि आपका एक बेटा तो संन्यासी हो जाएगा लेकिन दूसरा बेटा राजनीति में बहुत ऊपर तक जाएगा. राव साहब के छोटे बेटे अर्जुन सिंह के लिए की गई ज्योतिषी की यह भविष्यवाणी अक्षरशः हकीकत में तब्दील हुई.

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बॉलीवुड जाने का सपना नहीं हो सका साकार
अर्जुन सिंह को सिर्फ एक राजनेता के तौर पर जानने वालों के लिए यह जानकारी बड़ी रोचक हो सकती है कि कांग्रेस पार्टी का कद्दावर नेता कभी सियासत की दुनिया से दूर मायानगरी में अपना भविष्य तलाश रहा था. जी हां, अपनी नौजवानी के दिनों में अर्जुन सिंह के ऊपर भी फिल्मों में एक्टिंग करने का शौक चर्राया था. दरअसल, इसके पीछे की वजह थी फिल्में देखने की दीवानगी और जाने-माने अभिनेता प्रेमनाथ से दोस्ती. डॉ. जोशी ने अपनी किताब में इसका रोचक अंदाज में वर्णन किया है. प्रेमनाथ के पिता उस समय रीवा के आईजी हुआ करते थे. वह वहीं के कॉलेज में पढ़ते भी थे, जिसके कारण अर्जुन सिंह के साथ उनकी गाढ़ी मित्रता थी. प्रेमनाथ और अर्जुन सिंह उस समय के सभी नामचीन अभिनेता या अभिनेत्री की फिल्में देखा करते थे. ऊपर से प्रेमनाथ की बहन की शादी प्रख्यात फिल्मकार और शोमैन राजकपूर के साथ हुई थी, इसलिए कॉलेज के दिनों में फिल्मों पर खूब चर्चाएं हुआ करती थीं.

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यही वजह रही कि अर्जुन सिंह को भी अभिनेता बनने का चस्का लगा. लेकिन यह बात जब अर्जुन सिंह ने अपने पिता से कही तो उन्होंने ऐसा अद्भुत जवाब दिया कि भविष्य का यह नेता, फिल्मों में जाते-जाते रह गया. उनके पिता ने बड़ी चतुराई के साथ अर्जुन सिंह से कहा- ‘तुम अपनी वाईफ से पूछ लो’. डॉ. जोशी अपनी किताब में लिखते हैं कि अर्जुन सिंह का विवाह पढ़ाई के दौरान ही हो गया था. इसलिए फिल्मों में जाने से पहले पिता की सलाह आड़े आ गई. डॉ. जोशी ने लिखा है, ‘अर्जुन सिंह ने कहा- पिताजी ने ऐसा कहकर मेरे साथ डिप्लोमेसी कर दी. मेरी मुंबई जाने और फिल्मों में काम करने की योजना शुरू होने से पहले ही फेल हो गई.

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नेहरू से मनमोहन तक के नेता बने अर्जुन
अर्जुन सिंह के जीवन से जुड़ा एक राजनीतिक घटनाक्रम बड़ा ही विचित्र है. हुआ यूं था कि 1952 के चुनाव में अर्जुन सिंह के पिता चुरहट से कांग्रेस के उम्मीदवार थे. चूंकि यह देश में हो रहा पहला चुनाव था, इसलिए प्रचार के लिए खुद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू आने वाले थे. नेहरू आए भी, लेकिन मंच से उन्होंने जो कुछ कहा, वह ऐतिहासिक है और अर्जुन सिंह के लिए पीड़ादायक. डॉ. जोशी अपनी किताब में लिखते हैं- दरअसल, पंडित नेहरू ने राव साहब शिव बहादुर सिंह के बारे में मंच से कहा, ‘चुरहट से खड़ा होने वाला कांग्रेसी उम्मीदवार कांग्रेस का नहीं है. ताज्जुब है जिस इंसान के खिलाफ हाईकोर्ट में मुकदमा चल रहा है उसे पार्टी ने टिकट कैसे दे दिया. यह हमारा अधिकृत उम्मीदवार नहीं है.’ किसी भी व्यक्ति के लिए अपने पिता के बारे में ऐसा सुनना घनघोर पीड़ा देने वाला समय रहा होगा. लेकिन अर्जुन सिंह जैसे राजनीतिज्ञ ने इस स्थिति को सहा और 1957 में कांग्रेस के ही टिकट पर विधायक बने. बाद के दिनों में उन्होंने न सिर्फ कांग्रेस पार्टी को अपने हिसाब से साधा, बल्कि नेहरू-गांधी परिवार के करीबी बने और जमकर राजनीति की. वे इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह तक की सरकार में मंत्री पद का दर्जा पाते रहे.

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