इंदौर. रसगुल्ला की प्रमाणिकता को लेकर ओडिशा और पश्चिम बंगाल के बीच जीआई टैग हासिल करने की ‘जंग‘ आपको याद होगी. कई महीनों तक रसगुल्ला को अपना बताने के लिए इन दोनों राज्यों के बीच तर्क-वितर्क चलता रहा. आखिरकार बंगाल को जीत हासिल हुई. बहरहाल, भारत के प्रसिद्ध पकवानों को जीआई टैग देने की दिशा में दो नए पकवानों के नाम सामने आए हैं. अगर गंभीरता से प्रयास किए जाएं, तो इंदौर के पोहे और बुरहानपुर की मावा (खोवा) जलेबी की जगह उन पारंपरिक पकवानों की सूची में पक्की हो सकती है, जिन्हें भौगोलिक पहचान (जीआई टैग) का वैश्विक तमगा हासिल है. चुनिंदा जायकों की इस फेहरिस्त की शोभा हैदराबाद का हलीम और पश्चिम बंगाल का रसगुल्ला जैसे व्यंजन बढ़ा रहे हैं. मध्यप्रदेश से निर्यात को बढ़ावा देने के उपायों पर केंद्रित भारतीय निर्यात-आयात बैंक (एक्जिम बैंक) की एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रदेश सरकार को इंदौरी पोहे और बुरहानपुरी मावा जलेबी जैसे उत्पादों को भौगोलिक उपदर्शन (जीआई) प्रमाण पत्र दिलाने की दिशा में प्रयास करने चाहिए. Also Read - इन तीन सरकारी बैंकों में उप प्रबंध निदेशक के कई पद खाली, वित्त मंत्रालय ने मांगे आवेदन

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मंत्री बोलीं- बुरहानपुर की जलेबी को दिलाएंगे जीआई टैग
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद राज्य की महिला एवं बाल विकास अर्चना चिटनीस ने कहा, ‘हम बुरहानपुर की मावा जलेबी के बारे में विस्तृत अध्ययन कराएंगे, ताकि इसे जीआई टैग दिलाने के लिए विधिवत आवेदन किया जा सके.’ मुगल काल में ‘दक्षिण के प्रवेश द्वार’ के रूप में मशहूर ऐतिहासिक शहर बुरहानपुर की जलेबी मावे (खोवा) से बनती है. मुंह में पानी ला देने वाली अनोखी मिठास के लिए यह व्यंजन दूर-दूर तक मशहूर है. चिटनीस बुरहानपुर की विधायक भी हैं. उन्होंने कहा कि मावे की जलेबी बुरहानपुर की मीठी विरासत है और इस पारंपरिक व्यंजन पर उनके गृह क्षेत्र का दावा बेहद मजबूत है. वहीं, पोहा, इंदौर का सबसे पसंदीदा नाश्ता है. अपने पारंपरिक जायकों के लिए देश-दुनिया में मशहूर शहर में पोहे की हजारों दुकानें हैं. खासकर सुबह के वक्त इन दुकानों पर स्वाद के शौकीनों की भीड़ उमड़ी रहती है.

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इंदौरी पोहे को कड़ी टक्कर देगा महाराष्ट्र
बहरहाल, बौद्धिक संपदा अधिकार से जुड़े कानूनों के जानकार प्रफुल्ल निकम का कहना है कि पोहे को जीआई टैग दिलाना मध्यप्रदेश के लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकता है. उन्होंने कहा, ‘अगर मध्यप्रदेश पोहे को अपना पारंपरिक व्यंजन बताकर इसे जीआई प्रमाणपत्र दिलाने के लिए औपचारिक आवेदन करता है, तो बहुत संभव है कि इस दावे को महाराष्ट्र की ओर से तगड़ी चुनौती मिले.’ निकम ने कहा, ‘महाराष्ट्र में सदियों से पोहा खाया जा रहा है. खासकर पुणे के करीब 90 प्रतिशत घरों में पारंपरिक तौर पर हर सुबह नाश्ते के रूप में पोहा ही पकता है.’ उन्होंने कहा कि गुजरे बरसों में बासमती चावल, रसगुल्ला और कड़कनाथ चिकन को जीआई प्रमाणपत्र दिलाने के मामले में अलग-अलग राज्यों में रस्साकशी देखी गई है. लिहाजा अगर मध्यप्रदेश इंदौरी पोहे और बुरहानपुरी जलेबी को भौगोलिक पहचान का यह विशिष्ट टैग दिलाना चाहता है, तो उसे दोनों व्यंजनों के बारे में ऐतिहासिक सबूत जुटाने होंगे और विस्तृत शोध के जरिए पुख्ता प्रस्ताव तैयार करना होगा.

Indori-Poha

 

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जीआई टैग से मिलती है वैश्विक पहचान
आज की तारीख में किसी भी खाद्य उत्पाद को जीआई टैग मिलना, उसकी वैश्विक पहचान के लिए जरूरी है. हाल के दिनों में रसगुल्ला को लेकर ओडिशा और बंगाल के बीच प्रतिस्पर्द्धा देखने को मिली थी. आपको बता दें कि अप्रैल 2004 से लेकर अब तक कुछ ही भारतीय पकवानों को खाद्य उत्पादों की श्रेणी में जीआई टैग मिला है. जानकारों ने बताया कि जीआई पंजीयन का टैग विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाले ऐसे उत्पादों को प्रदान किया जाता है जो अनूठी खासियत रखते हैं. इस टैग के जरिए ग्राहकों को संबंधित उत्पादों की गुणवत्ता का भरोसा भी मिलता है. जीआई टैग के कारण अलग-अलग उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबारी पहचान हासिल होती है, जिससे इनके निर्यात को बढ़ावा मिलता है. उत्पादकों या निर्माताओं को इस खास टैग से न केवल उत्पादों की ब्रांडिंग और मार्केटिंग में मदद मिलती है, बल्कि नक्कालों के खिलाफ उन्हें पुख्ता कानूनी संरक्षण भी प्राप्त होता है.

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जीआई टैग में बंगाल आगे
पश्चिम बंगाल
जयनगर का मोआ
वर्धमान का सीताभोग
वर्धमान का ही मिहिदाना
बांग्लार रसगुल्ला

आंध्र प्रदेश
तिरुपति का लड्डू
बंदर लड्डू

कर्नाटक
धारवाड़ का पेड़ा

राजस्थान
बीकानेरी भुजिया

तेलंगाना
हैदराबादी हलीम

मध्यप्रदेश
रतलामी सेंव

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