इंदौर: मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों में सत्तारूढ़ भाजपा के प्रचार अभियान को गति देने के लिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 18 नवंबर से सूबे के मालवा-निमाड़ अंचल के दौरे की शुरूआत करेंगे. अपने इस गढ़ में विभिन्न चुनावी चुनौतियों का सामना कर रही भाजपा ने इस दौरे में “मोदी फैक्टर” को भुनाने की कोशिश के तहत शहरी बाशिंदों, आदिवासियों और किसानों को साधने की योजना बनायी है.

भाजपा के एक प्रवक्ता ने गुरुवार को बताया कि प्रधानमंत्री के मालवा-निमाड़ अंचल के दौरे का आगाज इंदौर शहर से होगा. मोदी सूबे की आर्थिक राजधानी के लव-कुश चौराहे पर 18 नवंबर को आयोजित सभा को संबोधित करेंगे. प्रवक्ता के मुताबिक, इस सभा में इंदौर समेत मालवा- निमाड़ अंचल के 17 विधानसभा क्षेत्रों के लोगों को जुटाने की कोशिश की जा रही है.

उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री इस अंचल के आदिवासी बहुल इलाके झाबुआ में 20 नवंबर को और मंदसौर में 23 नवंबर को चुनावी सभाओं को संबोधित करेंगे. मंदसौर, सूबे में किसान आंदोलन के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा है. राजस्थान सीमा से सटे इस क्षेत्र में पिछले वर्ष किसान आंदोलन के दौरान पुलिस गोलीबारी में छह कृषकों की मौत हो गयी थी. भाजपा सूत्रों की मानें तो पार्टी ने अपनी रणनीति के तहत चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में मालवा-निमाड़ अंचल में प्रधानमंत्री के दौरों का खाका तैयार किया है, ताकि मतदाताओं के बीच उनकी मौजूदगी का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाया जा सके. सूबे में 28 नवम्बर को विधानसभा चुनावों के लिए मतदान होना है.

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बहरहाल, मोदी के प्रस्तावित कार्यक्रम से पखवाड़े भर पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी 29 और 30 अक्टूबर को मालवा-निमाड़ का दो दिवसीय चुनावी दौरा कर चुके हैं. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी इस अंचल में लगातार चुनावी सभाओं को संबोधित कर रहे हैं.

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कुल 230 सीटों वाली प्रदेश विधानसभा में मालवा-निमाड़ अंचल की 66 सीटें शामिल हैं. पश्चिमी मध्यप्रदेश के इंदौर और उज्जैन संभागों में फैले इस अंचल को सूबे की “सत्ता की चाबी” भी कहा जाता है. सत्ताविरोधी रुझान को लेकर कांग्रेस के आरोपों के बीच सियासी जानकारों का मानना है कि भाजपा के लिये इस बार मालवा-निमाड़ में चुनावी लड़ाई आसान नहीं है. सत्तारूढ़ दल को टिकट वितरण पर अपने ही नेताओं के गहरे असंतोष का सामना भी करना पड़ा है.

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वर्ष 2013 के पिछले विधानसभा चुनावों में मालवा-निमाड़ की 66 सीटों में से भाजपा ने 56 सीटें जीती थी, जबकि कांग्रेस को केवल नौ सीटों से संतोष करना पड़ा था. भाजपा के बागी नेता के खाते में एक सीट आयी थी जिसने अपनी पार्टी से टिकट नहीं मिलने के कारण निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था.