भोपाल: मध्य प्रदेश में चुनावी बुखार अपने चरम पर है. देश के बीचोबीच स्थित इस राज्‍य की सत्‍ता पर काबिज होने का अपना अलग महत्‍व है. अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में बंटे इस राज्‍य का राजनी‍ि रुख काफी हद तक बुंदेलखंड से तय होता है. विकास की दौड़ में पीछे छूटे राज्‍य के इस हिस्‍से में समस्‍याओं की कमी नहीं. सबसे बड़ी समस्‍या पानी की है और भाजपा के लिए इस बार पानी का मुद्दा मुश्किलें खड़ी कर सकता है.Also Read - UP कांग्रेस के चुनाव प्रचार अभियान का चेहरा होंगी प्रियंका गांधी, सपा, बसपा पिछड़ीं: पीएल पुनिया

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बुंदलेखंड क्षेत्र में विधानसभा की 32 सीटें हैं. 2013 के चुनावों में इनमें से 24 सीटों पर भाजपा और केवल आठ सीटों पर कांग्रेस पार्टी को जीत मिली थी. भाजपा को लगातार तीसरी बार सत्‍ता तक पहुंचाने में इसकी अहम भूमिका रही थी. भाजपा हो या कांग्रेस, दोनों ही पार्टियां इस बार भी मतदाताओं का दिल जीतने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं. दोनों पार्टियों के शीर्ष नेता इस इलाके में रैलियां कर चुके हैं लेकिन मतदाताओं का रुख अब तक स्‍पष्‍ट नहीं है. सत्‍ता-विरोधी लहर से जूझ रही भाजपा के लिए ज्‍यादा परेशानी है और ताज्‍जुब यह है कि इसकी एक बड़ी वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं. Also Read - UP Election 2022: BSP के 'जाटव' वोटों में सेंध की तैयारी में BJP, मायावती के खिलाफ प्रत्याशी के नाम पर मुहर

चुनाव में प्रचार के लिए बुंदेलखंड के छतरपुर में जनसभा को संबोधित करने पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कह दिया कि इस इलाके के तालाबों को अतिक्रमण मुक्त कर दिया गया है, यहां पानी की समस्या का समाधान हो गया है. हालांकि, तस्वीर प्रधानमंत्री के इस दावे से ठीक उलट है. अगर इस इलाके में पानी होता तो किसान, मजदूर और युवा आखिर अपने गांव को छोड़कर परदेस क्यों जाते. सवाल उठ रहा है कि प्रधानमंत्री से तथ्यात्मक रूप से गलत बात किसने बुलवाई?

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चुनावी मौसम है और नवंबर का महीना चल रहा है. बुंदेलखंड के किसी भी इलाके में चले जाइए, आपको तालाबों के आधे से कम हिस्से में अथवा क्षमता के मुकाबले आधा पानी ही भरा नजर आएगा. जल योजनाओं का बुरा हाल है. पानी घरों तक पहुंचता नहीं और लोगों को हैंडपंपों पर कतार में खड़ा आसानी से देखा जा सकता है.

बुंदेलखंड में दो दशक से जल संरक्षण और संवर्धन के लिए काम करने वाले ‘जल-जन जोड़ो’ के राष्ट्रीय संयोजक संजय सिंह का कहना है कि बुंदेलखंड में जल संकट ही तो है सबसे बड़ी समस्या. यहां की इस समस्या का निदान हो जाता तो क्यों हजारों परिवार हर साल गांव, घर छोड़ने को मजबूर होते. खेत मैदान में क्यों बदले नजर आते. यह इलाका कभी जल संरचनाओं के कारण ही पहचाना जाता था, मगर अब यह जल संरचनाएं गुम हो गई हैं. इन पर अतिक्रमण की भरमार है, जल स्त्रोतों तक पानी जाने के रास्ते बंद पड़े हैं.

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सिंह याद दिलाते हैं कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दिसंबर 2017 को खजुराहो में हुए राष्ट्रीय सूखा मुक्ति सम्मलेन में बुंदेलखंड के तालाबों के चिन्हीकरण, सीमांकन आदि का वादा किया था लेकिन तालाबों का न तो सीमांकन हुआ और न ही चिन्हीकरण. हो भी कैसे, इन तालाबों पर कब्जे जो हो चुके हैं. इतना ही नहीं, इसके ठीक उलट तालाबों को मिट्टी से पाट जरूर दिया गया. बुंदेलखंड के जलसंकट का कारण जल संरचनाओं का गुम होना भी है.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छतरपुर की जनसभा में कहा था कि बुंदेलखंड में 15 वर्षों में बड़ा बदलाव आया है. जो बदलाव न राजा न महाराज ला पाए, वह शिवराज लाए हैं. संगठन के काम के सिलसिले में कई बार छतरपुर आया हूं. उस समय छतरपुर में नहाने के लिए भी पानी की दिक्कत होती थी. आज यहां सिचाई के क्षेत्र में अनेक काम हो रहे हैं. कांग्रेस की सरकार ने वर्षो तक बरियापुर डैम के काम को लटकाए रखा, उसे भाजपा की सरकार ने पूरा कराया. कांग्रेस के समय में छोटे तालाबों पर बड़े-बड़े दबंगों के कब्जे थे, शिवराज ने इसके लिए अभियान चलाया. नए तालाब बनवाए. अब इनका पानी किसानों को मिल रहा है.

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कांग्रेस के मीडिया सेल के प्रमुख रणदीप सिंह सुरजेवाला ने बुंदेलखंड की बदहाली के लिए भाजपा की सरकार को जिम्मेदार ठहराया है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस की यूपीए सरकार के समय मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड के लिए 3000 करोड़ से ज्यादा की राशि दी गई, लेकिन वह राशि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई. भाजपा नेताओं ने उस राशि को विकास कार्य में लगाने की बजाय अपनी जेब में डाल लिया. क्षेत्रीय राजनीतिक विश्लेषक रवींद्र व्यास का कहना है कि बुंदेलखंड की पानी की समस्या अब भी वही है जो दो दशक पहले थी. यह सही है कि प्रधानमंत्री गांव और गली में जाकर पता नहीं कर सकते, उन तक जो जानकारी पहुंची होगी, वह प्रदेश सरकार से जुड़े लोगों और भाजपा नेताओं ने पहुंचाई होगी. सवाल उठता है कि प्रधानमंत्री को आखिर यह झूठी जानकारी किसने दी.

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प्रधानमंत्री ने एक तरफ बुंदेलखंड की पानी समस्या के निदान की बात की दूसरी ओर छत्रसाल विश्वविद्यालय का जिक्र कर वाहवाही लूटनी चाही, मगर यहां का हर वर्ग दोनों की स्थिति से वाकिफ है. यही कारण है कि जो इन दोनों बातों को सुन रहा है, वह सवाल भी कर रहा है कि प्रधानमंत्री के मुंह से गलत तथ्य किसने बुलवा दिया.