सागर: मध्यप्रदेश में इस बार का विधानसभा चुनाव पिछले चुनावों के मुकाबले कहीं ज्यादा रोचक और कांटे की टक्कर वाला नजर आ रहा है. बागियों ने सत्ताधारी दल की मुसीबतें बढ़ा दी हैं. यही कारण है कि बुंदेलखंड के 29 विधानसभा क्षेत्रों में से पांच में भाग्य आजमा रहे मंत्रियों के लिए इस बार की राह आसान नजर नहीं आ रही है.

बीते तीन विधानसभा और लोकसभा चुनाव से बुंदेलखंड भाजपा का गढ़ बन चुका है. यही कारण है कि पिछले विधानसभा चुनाव में 29 में से 23 सीटों पर भाजपा ने कब्जा जमाया था. कांग्रेस सागर में देवरी, दमोह में जबेरा, पन्ना में पवई, छतरपुर में राजनगर और टीकमगढ़ में खरगापुर व जतारा सीटों पर विजयी रही थी. शेष सभी 23 स्थानों पर भाजपा के उम्मीदवार जीते थे. इस चुनाव में हालात कुछ बदले हुए हैं.

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक संतोष गौतम ने कहा, “इस बार का चुनाव बगैर मुद्दों और लहर का है. यही कारण है कि चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर है. इस इलाके में भाजपा की स्थिति पिछले चुनावों जैसी नहीं है. भाजपा के लिए अपनी पुरानी स्थिति को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि भाजपा के कई नेता बगावत कर गए हैं. इसका असर नतीजों पर पड़ने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता.”

बुंदेलखंड में भाजपा ने पांच मंत्रियों खुरई से भूपेंद्र सिंह, रहली से गोपाल भार्गव, दमोह से जयंत मलैया, मलेहरा से ललिता यादव और दतिया से नरोत्तम मिश्रा को मैदान में उतारा है. एक मंत्री कुसुम महदेले का टिकट काटा गया है. एक तरफ महदेले पन्ना में भाजपा के लिए ज्यादा सक्रिय नहीं हैं तो दूसरी ओर पूर्व मंत्री डॉ. रामकृष्ण कुसमारिया ने पार्टी से बगावत कर दी है. वे दमोह और पथरिया विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में हैं.

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डॉ. कुसमारिया लगातार एक ही बात कह रहे हैं कि उनके निर्दलीय चुनाव लड़ने से भाजपा को ही फायदा होने वाला है, मगर राजनीति के जानकार कहते हैं कि कुसमारिया ने दमोह में मलैया और पथरिया में लखन पटेल की मुसीबतों को बढ़ाने का काम कर दिया है. वहीं ललिता यादव की सीट बदलकर उन्हें छतरपुर से मलेहरा में चुनाव लड़ाया जा रहा है. क्षेत्र नया है और जातीय समीकरण ने यहां चुनाव को रोचक बना दिया है.

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बुंदेलखंड में सबसे रोचक चुनाव दतिया में है, जहां भाजपा ने मंत्री नरोत्तम मिश्रा को मैदान में उतारा है तो कांग्रेस से राजेंद्र भारती उनके सामने हैं. यह चुनाव रोचक इसलिए हो गया है, क्योंकि अन्य दलों ने यहां से उम्मीदवारों को मैदान में नहीं उतारा है. उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित जिला होने के कारण यहां सपा-बसपा का भी वोट बैंक है. यह किसके खाते में जाता है, यह बड़ा सवाल है और यही वोट निर्णायक भी हो सकता है.

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उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे इस इलाके में भाजपा ने पूरी ताकत लगा दी है. कांग्रेस भी जोर लगाए हुए है, मगर यहां अब तक किसी भी दल के पक्ष में माहौल नहीं बन पाया है और मतदाता भी पूरी तरह मौन है, जिससे दोनों ही दलों और खासकर मंत्रियों की चिंताएं बढ़ गई हैं.