छतरपुर: बुंदेलखंड के दिग्‍गज कांग्रेसी नेता व पूर्व महासचिव व पूर्व सांसद सत्‍यव्रत चतुर्वेदी के बेटे नितिन चतुर्वेदी ‘बंटी’ ने गुरुवार को पार्टी को झटका देते हुए राजनगर विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी से पर्चा दाखिल कर दिया. बता दें नितिन ने राजनगर से कांग्रेस पार्टी से मांग की थी. लेक‍िन कांंगेेेस  ने उनकी मांग को दर‍किनार करते हुए वर्तमान विधायक विक्रम सिंह उर्फ नाती राजा पर ही भरोसा जताया और चुनावी मैदान में उतारा है.

कांग्रेस के अंदर से ही ज्योतिरादित्य सिंधिया को कमजोर करने की पहली चाल सफल!

जब कांंग्रेस के सीनियर नेता सत्‍यव्रत चतुर्वेदी से  इस बारे मेें पूछा गया तो उन्‍होंने कहा, ” न मैंने कांग्रेस छोड़ी है न ही कांग्रेस की विचारधारा. अगर कांग्रेस ने 15 साल तक कोई गलती की और उस गलती को दोहराया जा रहा है तो अन्‍याय करना जितना बड़ा पाप है, उतना ही बड़ा पाप अन्‍याय सहना है.

इसलिए इस अन्याय के खिलाफ मेरे बेटे ने यह फैसला लिया कि वह जनता की अदालत में जाएगा और जनता से फैसला मांगेगा कि वो क्या कहती है.”

समाजवादी पार्टी में पुत्र के जाने और प्रचार के सवाल पर सत्यव्रत ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय उसका स्वयं का है, वह बालिग़ है. दो बच्चों का पिता है। जितना सहयोग पुत्र के लिए हो सकता है पूरा सहयोग करूंगा. मैं छुप-छुप कर राजनीति नहीं करता.”

इस मौके पर नितिन चतुर्वेदी ने दो टूक शब्दों में कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व पर जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के आरोप लगाए. उन्होंने साफ़ किया यह निर्णय मेरा है कि मैं समाजवादी पार्टी से चुनाव लडूं.’

सूत्रों के मुताबिक, एमपी विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले वर्तमान एमएलए विक्रम सिंह ने स्‍वयं इस सीट से चुनाव नहीं लड़ने और खुद के लिए लोकसभा चुनाव में खड़े होने की बात कही थी. कांग्रेस विधायक ने ये बात स्‍वयं चतुर्वेदी के सामने रखी थी. इस पर एमपी कांग्रेस की शीर्ष लीडरशिप की सहमति भी बताई जा रही थी.

सत्‍यव्रत चतुर्वेदी और उनके बेटे नितिन ने राजनगर क्षेत्र में जनसंपर्क करना शुरू कर दिया था. लेकिन जब बात आगे बढ़ी तो विक्रम सिंह ने यू टर्न लेते हुए विधानसभा चुनाव में अपनी दावेदारी इस सीट पर पेश कर दी. ऐसे में पार्टी नेतृत्‍व वर्तमान विधायक के विद्रोही बनने या बीजेपी में जाने की खबरों के मद्देनजर विक्रम सिंह नाती राजा को यहां से उम्‍मीदवार घोषित कर दिया. वहीं, बीजेपी ने भी इस सीट पर अपने उम्‍मीदवार की घोषणा काफी दिनों बाद गुरुवार को कर दी.

सियासी घमासान के बीच माना जा रहा है कि सत्‍यव्रत कांग्रेस के ऐसे नेता हैं, जो लगातार ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया को सीएम का चेहरा बनाने के लिए आवाज उठाते रहे हैं. दिग्‍विजय सिंह के धुर विरोधी रहे सत्‍यव्रत चतुर्वेदी बुंदेलखंड के कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा हैं. वह अर्जुन सिंह कैबिनेट में मंत्री, एक बार लोकसभा सदस्‍य और दो बार राज्‍यसभा सदस्‍य रहे हैं. पार्टी में महासचिव और प्रवक्‍ता समेत  महाराष्‍ट्र समेत कुछ अन्‍य राज्‍यों में संगठन के राज्‍य प्रभारी रहे हैं. वह कई महत्‍वपूूूूर्ण संसदीय समितियों में सदस्‍य भी रहे हैं.

कांग्रेस का रक्‍त अपनी नशों में बहने की बात कहने  वाले सत्‍यव्रत के लिए यह एक बड़ी अग्‍न‍िपरीक्षा होगी, जब वह पार्टी के लिए प्रचार करेंगे और बेटा दूसरी पार्टी से चुनाव लड़ रहा होगा. दिग्‍व‍िजय सिंह के पहले कार्यकाल में उनसे मतभेदों के चलते सत्‍यव्रत ने विधानसभा की सदस्‍यता से इस्‍तीफा दे दिया था. इसके बाद उन्‍होंने लगभग राजनीति से दूर रहने का मन बना लिया था. लेकिन 1999 में लोकसभा चुनाव की बारी आई तो कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्‍व ने छतरपुर आकर सत्‍यव्रत को लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए तैयार किया. लोकसभा में पहुंचने के बाद सत्‍यव्रत चतुर्वेदी की राजनीति की दूसरी पारी शुरू हुई थी.

सत्‍यव्रत की मां विद्यवती चतुर्वेदी के इंदिरा गांधी से बेहद करीबी संबंध थे. कांग्रेस के नेतृत्‍व ने उन्‍हें लगातार दो बार 1966 और 1972 में राज्‍यसभा में भेजा था. उनकी मां दो बार राज्‍यसभा सदस्‍य रहने के बाद लोकसभा के लिए खजुराहो लोकसभा सीट 1980 से 1989 के बीच लगातार दो बार सांसद रही थी. सत्‍यव्रत के पिता बाबूराम चतुर्वेदी भी एमपी की कांग्रेस की प्रकाशचंद्र सेठी सरकार में मंत्री रहे हैं.

खास बात ये है कि छतरपुर की स्‍थानीय सीट से कांग्रेस ने सत्‍यव्रत के भाई आलोक चतुर्वेदी पज्‍जन को टिकट दिया है. पिछले बार वह महज कुछ वोटों से चुनाव हार गए थे. हालाकि, सत्‍यव्रत और उनके भाई पज्‍जन के बीच राजनीतिक दूरियां पिछले चुनाव से ही हैं.