भोपाल: मध्य प्रदेश में लोकतंत्र सेनानियों (मीसाबंदी) को मिलने वाली सम्मान निधि (पेंशन) फिर से तय किए जाने की पहल ने राजनीतिक हलकों में भूचाल ला दिया है. भाजपा से जुड़े लोग जहां इसे सियासी मुद्दा बनाने में लग गए हैं, वहीं कांग्रेसी इस सम्मान निधि पर ही सवाल उठा रहे हैं. इस बीच जो बात सामने आई है, वह चौंकानेवाली है, क्योंकि कई लोग तो ‘पर्ची’ के जरिए मीसाबंदी बन गए.

देश के अन्य हिस्सों के तरह मध्य प्रदेश में भी जून, 1975 में बड़ी संख्या में लोग मीसा कानून के तहत गिरफ्तार किए गए थे. लगभग 19 माह तक कई लोग जेलों में रहे. एक बड़ा वर्ग वह था जो माफी मांगकर जेल से बाहर आ गया. उपलब्ध जानकारी इस बात की गवाही देती है कि 70 फीसदी से ज्यादा लोग माफी मांगकर बाहर आ गए थे.

राज्य में भाजपा की सरकार ने जून, 2008 में सम्मान निधि का गजट नोटिफिकेशन जारी किया था. इसी आधार पर जुलाई, 2008 से सम्मान निधि दी जाने लगी. शुरुआत में एक से छह माह तक जेल में रहने वालों को 3000 रुपये मासिक और छह माह से ज्यादा समय जेल में रहने वालों को 6000 रुपये का प्रावधान किया गया. इसके बाद जनवरी, 2012 और सितंबर, 2017 में नोटिफिकेशन के जरिए सम्मान निधि की राशि को बढ़ाकर 25000 रुपये मासिक तक कर दिया गया.

कांग्रेस के सत्ता में आते ही मीसाबंदी पेंशन की समीक्षा और पुनर्निर्धारण का ऐलान हुआ. सरकार की ओर से एक आदेश जारी किया गया, इस आदेश के बाद मामला विवादों में आ गया. भाजपा से जुड़े लोग लामबंद हुए और उन्होंने सरकार की नीयत पर सवाल उठाए और आंदोलन का ऐलान कर दिया. भाजपा ने जहां इस मामले को हाथोहाथ लपका, वहीं कांग्रेस पार्टी और सरकार यह बात स्पष्ट करने में नाकाम रही कि उसकी वास्तविक मंशा क्या है.

मीसाबंदी साबित करने का ये है प्रावधान
भाजपा सरकार के शासनकाल में एक नोटिफिकेशन के जरिए यह प्रावधान कर दिया गया था कि दो मीसाबंदी जिस व्यक्ति को प्रमाणित कर देंगे कि उक्त व्यक्ति उस वक्त जेल गया था उसे मीसाबंदी मान लिया जाएगा और उनकी पेंशन की पात्रता होगी. कांग्रेस ने इसी नोटिफिकेशन के आधार पर मीसाबंदियों की पेंशन के पुनर्निर्धारण की योजना बनाई और उसका विधिवत आदेश भी जारी कर दिया.

इस संदर्भ में लेाकतंत्र सेनानी संघ के प्रांताध्यक्ष तपन भौमिक का कहना है कि राज्य में हर जिले में शासन की चार सदस्यीय समिति है, जो दो मीसाबंदियों की अनुशंसा की समीक्षा करती है, उसके बाद ही पेंशन मिलती है.

उन्होंने बताया कि पेंशन के दो स्तर हैं- एक वह, जो एक माह तक जेल में रहे. उन्हें 10,000 रुपये की पेंशन और एक माह से ज्यादा रहने वालों को 25,000 रुपये. इसी आधार पर पेंशन दी जाती रही है, कांग्रेस सरकार ने उसे बंद करने का फैसला ले लिया, यह अच्छा नहीं है. लिहाजा, मीसाबंदी आंदोलन की राह पर हैं.

दरअसल, सन् 1975 के आपातकाल के दौरान बड़ी संख्या में लोग माफी मांगकर जेल से छूट आए थे. इनमें बहुत से लोग ऐसे हैं जो एक माह से लेकर तीन माह भी जेल में नहीं रहे. अब यही लोग दूसरे साथियों के द्वारा प्रमाणित किए जाने पर पेंशन पा रहे हैं. इसके अलावा सरकारी स्तर पर रिकार्ड को जला दिया गया है, इसी बात का कई लोग लाभ ले रहे हैं.

दूसरे कारणों से जेल गए लोग भी ले रहे फायदा

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री सुभाष सोजतिया का कहना है कि राज्य में बड़ी संख्या में वे लोग मीसाबंदी की पेंशन का लाभ ले रहे हैं, जो जेल दूसरे कारणों से गए थे और कुछ ही दिन जेल में रहे. इतना ही नहीं, साजिशन कई जेलों का रिकार्ड भी जला दिया गया है. जो लोग दूसरे कारणों से जेल गए, कुछ दिन जेल में रहे और माफी मांगकर छूट गए, वे इस सुविधा का लाभ ले रहे हैं.

उन्होंने आगे कहा कि राज्य सरकार ने पुनर्निर्धारण की जो बात कहीं है, इसमें सभी की पोल खुल जाएगी. लिहाजा, ऐसे लोग सच को सामने नहीं आने देना चाहते और अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं.

सोजतिया का कहना है कि जो लोग आपराधिक मामलों में भी जेल गए, वे लोग भी अपने को मीसाबंदी बताकर आम जनता के पैसे डकार रहे हैं. कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद ऐसे लोगों चेहरे बेनकाब होने वाले हैं. लिहाजा, लोग इस मामले को भावनात्मक रंग देने लगे हैं. वोट के लिए मंदिर को मुद्दा बनाने वाले अब मीसाबंदियों के मामले को भावनात्मक रूप दे रहे हैं.

मीसाबंदी और कम्युनिस्ट पार्टी के नेता बादल सरोज का कहना है कि जो मीसाबंदी आज 80-85 साल की आयु में पहुंच गए हैं और पेंशन पा रहे हैं, उन्हें यह मिलती रहनी चाहिए, क्योंकि यह पेंशन उनकी जरूरत है. जो लोग माफी मांगकर बाहर आ गए या फर्जी तरह से पेंशन पर रहे हैं, उनकी जांच होनी चाहिए. इसके अलावा उन लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए, जिन्होंने दूसरे को मीसाबंदी प्रमाणित किया. इसके लिए जिम्मेदार अफसरों को भी नहीं बख्शा जाना चाहिए.