इंदौर: सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम से पता चला है कि वित्तीय वर्ष 2017-18 में बकायादारों से वास्तविक वसूली के कारण सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के फंसे कर्जों (एनपीए) में 64,106 करोड़ रुपये की कमी आयी. हालांकि, यह रकम ऊंट के मुंह में जीरा साबित हुई क्योंकि 31 मार्च को इस वित्तीय साल की समाप्ति के वक्त इन बैंकों का सकल फंसा कर्ज (ग्रॉस एनपीए) बढ़ते-बढ़ते 8,95,601 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गया था. Also Read - Coronavirus: EMI भुगतान के SMS से कर्जदारों में तीन महीने की मोहलत को लेकर भ्रम

मध्यप्रदेश के नीमच निवासी आरटीआई कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ ने बताया कि उन्हें भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से यह जानकारी मिली है. गौड़ के आवेदन पर आरटीआई के तहत सामने आये आंकड़ों के मुताबिक बकायादारों से वास्तविक वसूली के कारण सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के फंसे कर्ज वित्तीय वर्ष 2016-17 में 53,250 करोड़ रुपये घट गये थे. वित्तीय वर्ष 2015-16 में बकाया वसूली के चलते इन बैंकों के फंसे कर्जों में 40,903 करोड़ रुपये की कमी आयी थी. Also Read - कोरोना का कहर, सरकार और RBI के प्रोत्साहन के बावजूद झेलनी पड़ी आर्थिक गिरावट

पब्लिक सेक्टर के बैंकों की 70 विदेशी शाखाएं बंद करने का प्लान, 41 थींं घाटे में Also Read - Coronavirus: इंदौर में ड्यूटी पर तैनात 3,000 पुलिसकर्मियों को परिवार से दूरी बनाए रखने की सलाह

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की मौजूदा तादाद 21
आरटीआई अर्जी पर आरबीआई के 24 अगस्त को भेजे जवाब से पता चलता है कि वित्तीय वर्ष 2016-17 की समाप्ति के समय सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का फंसा कर्ज 6,84,732 करोड़ रुपये के स्तर पर था. वित्तीय वर्ष 2015-16 की समाप्ति के समय इन बैंकों को 5,39,968 करोड़ रुपये के फंसे ऋण वसूलने थे. देश में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की मौजूदा तादाद 21 है.

मूडीज की रिपोर्ट: सरकार की मदद मिलने के बावजूद भी बैंकों पर बना रहेगा दबाव

एनपीए में कमी के बारे में बैंकवार ब्‍योरा नहीं मिला
हालांकि, गौड़ को आरटीआई के तहत भेजे जवाब में आरबीआई ने एनपीए और कर्ज वसूली से एनपीए में कमी के बारे में बैंकवार ब्योरा नहीं दिया है. इस बीच, अर्थशास्त्री जयंतीलाल भंडारी ने सुझाव दिया कि एनपीए के साल-दर-साल बढ़ते बोझ के मद्देनजर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की तादाद 21 से घटाकर 10 के आस-पास की जानी चाहिए. लगातार खराब प्रदर्शन कर रहे सरकारी बैंकों को सार्वजनिक क्षेत्र के अन्य बैंकों में विलीन किया जाना चाहिए.