नई दिल्‍ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को मध्‍य प्रदेश विधानसभा में कल यानि शुक्रवार को फ्लोर टेस्‍ट कराने का आदेश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, फ्लोर टेस्‍ट कानून के मुताबिक हाथ उठाकर कराया जाएगा और कल 5 बजे तक पूरा हो जाना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा यदि बागी विधायक विधानसभा आना चाहते हैं तो दोनों कर्नाटक डीजीपी और मध्‍य प्रदेश के डीजीपी उन्‍हें पर्याप्‍त सुरक्षा प्रदान करें. Also Read - Coronavirus: मध्य प्रदेश में 19 नए मामले, इंदौर में 17 और लोग हुए संक्रमण का शिकार, राज्य में कुल 66 लोग संक्रमित

विधानसभा का सत्र 20 मार्च को बुलाने का आदेश देते हुए न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की पीठ ने कहा कि फ्लोर टेस्‍ट की वीडियो रिकॉर्डिंग की जाए. उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया कि विधानसभा का एकमात्र एजेंडा बहुमत साबित करने का होगा और किसी के लिए भी बाधा उत्पन्न नहीं की जानी चाहिए. Also Read - कोरोना वायरस के बारे में सही सूचना के लिये 24 घंटे में पोर्टल बनाये केन्द्र: सुप्रीम कोर्ट

उच्चतम न्यायालय ने मध्य प्रदेश विधानसभा सचिव को आदेश दिया कि सुनिश्चित किया जाए कि कानून व्यवस्था खराब नहीं हो. Also Read - Covid-19: कोरोना के चलते मजदूरों का पलायन, केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा- 23 लाख लोगों को दे रहे हैं खाना

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद राजनीतिक संकट से जूझ रही कमलनाथ सरकार का कल भविष्‍य तय हो जाएगा. च्चतम न्यायालय द्वारा शुक्रवार शाम पांच बजे तक मध्यप्रदेश में शक्ति परीक्षण कराने के आदेश पर शिवराज सिंह चौहान ने कहा, कमलनाथ, दिग्विजय सिंह योजना विफल रही.

पीठ ने कहा कि संवैधानिक सिद्धांत यही है कि अध्यक्ष के समक्ष इस्तीफे या अयोग्यता का मामला लंबित होना सदन में शक्ति परीक्षण के लिए मतदान में बाधक नहीं है. पीठ ने कहा कि इसलिए न्यायालय को ही यह देखना होगा कि क्या राज्यपाल ने उन्हें अधिकारों के दायरे से बाहर जाकर कार्यवाही की है.

इस मामले में सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि अगर विधानसभा का सत्र नहीं चल रहा हो और सरकार बहुमत खो दे तो विधानसभा का सत्र आहूत करने का अध्यक्ष को निर्देश देने का अधिकार राज्यपाल को है.

सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि मध्यप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष एन पी प्रजापति को कांग्रेस के बागी विधायकों से वीडियो लिंक के माध्यम से बातचीत करनी चाहिए या फिर विधायकों को बंधक बनाये जाने की आशंका को दूर करने के लिए शीर्ष अदालत पर्यवेक्षक नियुक्त कर सकती है, लेकिन अध्यक्ष ने शीर्ष अदालत के इस सुझाव को अस्वीकार कर दिया.

इससे पहले, दिन में सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सुझाव दिया था कि अध्यक्ष को कांग्रेस के बागी विधायकों से वीडियो लिंक के माध्यम से बातचीत करनी चाहिए या फिर विधायकों को बंधक बनाकर रखे जाने की आशंका को दूर करने के लिए न्यायालय एक पर्यवेक्षक नियुक्त कर सकता है. लेकिन, अध्यक्ष ने शीर्ष अदालत के इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था.

पीठ ने यह भी कहा था, ‘‘हम बेंगलुरू या किसी अन्य स्थान पर पर्यवेक्षक नियुक्त कर सकते हैं ताकि बागी विधायक वीडियो कांफ्रेन्सिग के माध्यम से अध्यक्ष से संपक कर सकें और इसके बाद वह निर्णय ले सकते हैं.’’

पीठ ने अध्यक्ष से यह भी जानना चाहा था कि क्या उन्होंने बागी विधायकों के इस्तीफे के बारे में कोई जांच पड़ताल की थी और उनके बारे में उन्होंने क्या निर्णय लिया था.

अध्यक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि जिस दिन न्यायालय अध्यक्ष को समयबद्ध तरीके से काम करने का निर्देश देने लगेगी तो यह संवैधानिक दृष्टि से बहुत ही जटिल हो जायेगा.

मध्य प्रदेश के राज्यपाल लालजी टंडन की ओर से पेश वकील ने पीठ से कहा कि सारे घटनाक्रम में कमलनाथ एक तरफ हैं और अब अध्यक्ष ही न्यायालय में राजनीतिक लड़ाई की कमान संभाले हुये हैं. पीठ ने सभी पक्षों से जानना चाहा कि विधायकों के इस्तीफे और अयोग्यता के मामले में अध्यक्ष के निर्णय से शक्ति परीक्षण पर क्या असर पड़ेगा.

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि संवैधानिक सिद्धांत तो यही है कि अध्यक्ष के समक्ष विधायकों के त्यागपत्र या अयोग्यता का मामला लंबित होना विश्वास मत की प्रक्रिया में बाधक नहीं है. पीठ ने कहा कि इसलिए न्यायालय यह देखेगा कि क्या राज्यपाल ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई की है.

पीठ ने यह भी कहा कि सदन का सत्र अगर नहीं चल रहा हो और सरकार बहुमत खो दे तो राज्यपाल को विधानसभा का सत्र आहूत करने का अध्यक्ष को निर्देश देने का अधिकार है. पीठ ने कहा, ”जब विधानसभा के सत्र का अवसान हो जाता है और सरकार बहुमत गंवा देती है तो राज्यपाल विधानसभा की बैठक आहूत कर सकते हैं.”

सिंघवी ने कहा कि विधानसभा के कामकाज के संबंध में राज्यपाल के पास बहुत ही सीमित शक्ति है और वह सिर्फ सदन का सत्र आहूत कर सकते हैं, सत्रावसान कर सकते हैं और सदन को भंग कर सकते हैं, लेकिन वह विधानसभा के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं कर सकते क्योंकि यह अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में आता है.

सिंघवी ने कहा कि राज्यपाल अध्यक्ष से यह नहीं कह सकते कि उन्हें यह करना चाहिए और यह नहीं करना चाहिए. यह उनके अधिकार के दायरे से बाहर है.

राज्यपाल द्वारा 16 मार्च को सदन में राज्यपाल के अभिभाषण के तुरंत बाद कमल नाथ सरकार को विश्वास मत हासिल करने के निर्देश का पालन किये बगैर ही विधानसभा की कार्यवाही 26 मार्च के लिये स्थगित करने की अध्यक्ष की घोषणा के बाद पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा के नौ विधायकों ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की थी.

राज्यपाल लालजी टंडन ने शनिवार की रात मुख्यमंत्री कमलनाथ को इस संबंध में पत्र लिखा था कि उनकी सरकार अल्पमत में आ गयी है, इसलिए राज्यपाल के अभिभाषण के तुरंत बाद वह सदन में विश्वास मत हासिल करें. इसके बाद, मप्र कांग्रेस विधायक दल ने भी उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर की थी.

राज्य की 222 सदस्यीय विधानसभा में इस समय कांग्रेस के 16 बागी विधायकों सहित कुछ 108 सदस्य हैं जबकि भाजपा के 107 सदस्य हैं. अध्यक्ष कांग्र्रेस के छह विधायकों के इस्तीफे पहले ही स्वीकार कर चुके हैं.