देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के निकाय चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने सभी को चुकाते हुए शानदार प्रदर्शन किया। वे शिवसेना से सीटों के मामले में आगे तो नहीं गए मगर उनसे केवल 3 सीट ही पीछे रहे। इन नतीजों के बाद भले ही शिवसेना सबसे बड़ी पार्टी बनी हो मगर 114 के जादुई आकडे से काफी दूर है। चुनाव से पहले अपने दम पर सत्ता बनाने का दावा करने वाले उद्धव ठाकरे के मंसूबो पर नतीजों ने पानी फेर दिया। यह भी पढ़े: पहली बार पिता बाल ठाकरे की छाया से बाहर निकले उद्धव, दिखाया अपना दम Also Read - शिवसेना का पीएम पर तंज, मुखपत्र में लिखा- संकट से ताली बजाकर या दिया जलाकर नहीं निपटा जा सकता

बता दें की 227 सदस्यों वाली बीएमसी में शिवसेना को 84 सीट मिली है वहीं बीजेपी 81 सीटों पर जीत दर्ज की है। मुंबई की जनता ने किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं दिया है। बीजेपी, शिवसेना से नाता तोड़ने पर और मज़बूत हुई है। कांग्रेस जो पिछले चुनाव में 52 पर थी वह इस चुनाव के बाद 31 पर आ गयी है। Also Read - कांग्रेस ने सांसदों के वेतन में कटौती का स्वागत किया, सांसद निधि बहाल करने की मांग

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मुंबई में बहुमत के लिए 114 सीटों की जरूरत है। अगर शिवसेना एमएनएस (7), एनसीपी (9) और अन्य (5) को साथ लेती है तो भी 105 तक ही पहुँच पायेगी | अगर समाजवादी पार्टी के (6) पार्षद और एमआईएम (3) शिवसेना का साथ देते है तो फिर शिवसेना सत्ता में वापस आ सकती है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो शिवसेना को फिर एक बार बीजेपी से ही हाथ मिलाना पड सकता है। चुनावों में शिवसेना और बीजेपी दोनों ने ही एक दूसरे पर व्यक्तिगत हमले किये थे। मगर सत्ता के लिए दोनों के फिर से एक साथ आने की गहरी संभावना है।

शिवसेना के पास एक विकल्प कांग्रेस भी है। कांग्रेस के 31 पार्षद जीते है अगर दोनों पार्टियां एक साथ आयी तो सत्ता स्थापित कर सकते है मगर ऐसा होने की संभावना काफी कम है। महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष अशोक चव्हाण पहले ही शिवसेना से हाथ मिलाने से इनकार कर चुके है। ऐसे में शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी के हाथ मिलाने की ज़्यादा संभावना है ।

बात की जाये 2012 बीएमसी चुनावों की तो उस समय शिवसेना-बीजेपी एक साथ चुनाव लड़ी थी और उन चुनावों में शिवसेना को 75 और बीजेपी को 31 सीट मिली थी। 2014 लोकसभा चुनावों के दौरान भी ये गठबंधन कायम रहा था और जनता ने इस गठबंधन का साथ दिया था। मगर 2014 विधानसभा चुनावों के दौरान दोनों ही पार्टियों के बीच सीटों के बटवारे को लेकर खींचातानी हुई और गठबंधन टूट गया। दोनों ही पार्टियां अपने दम पर चुनाव लड़ी और बीजेपी नंबर 1 की पार्टी बनी। उसके बाद हुए कल्याण-डोम्बिवली हो या फिर मुंबई महानगरपालिका चुनाव दोनों ही पार्टियों ने एक दुसरे से नाता तोड़ दिया।

इस बार का प्रचार बेहद आक्रामक था। शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी ने एक-दुसरे पर गंभीर आरोप लगाए। उद्धव ठाकरे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऊपर भी गंभीर आरोप लगाया | दोनों पार्टियों के आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला वोटिंग वाले दिन तक चला | सेना ने तो राज्य सरकार से समर्थन वापस लेने की भी धमकी दी और बोला की परिणाम आने के बाद पार्टी इस पर निर्णय लिया जायेगा | चुनाव नतीजे देखकर ऐसा लगता है की एक बार फिर उद्धव ठाकरे को बीजेपी को साथ लेना ही होगा।