पुणे: महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले में स्थित लोनार झील का पानी ‘हालोआर्चिया’ जीवाणुओं की बड़ी संख्या में मौजूदगी के कारण गुलाबी हुआ है. पुणे स्थित एक संस्थान ने यह निष्कर्ष निकाला है. आगरकर अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. प्रशांत धाकेफाल्कर ने बताया कि ‘हालोआर्चिया’ या ‘हालोफिलिक आर्चिया’ एक ऐसा जीवाणु होता है जो गुलाबी रंग पैदा करता है और यह खारे पानी में पाया जाता है. Also Read - Covid-19 Cases in Maharashtra: एक दिन में महाराष्ट्र में आए कोरोना के 12,822 नए मामले, कुल मामले 5 लाख के पार हुए

उन्होंने कहा, ‘‘शुरुआत में, हमें लगा था कि लाल रंग के दुनालीला शैवाल के कारण झील के पानी का रंग गुलाबी हो गया है, लेकिन झील के पानी के नमूनों की जांच के बाद हमें पता चला कि झील में हालोआर्चिया की बड़ी संख्या में मौजूदगी के कारण पानी गुलाबी हुआ.’’ Also Read - SS Rajput death case: महाराष्‍ट्र सरकार ने SC को सौंपा सीलबंद लिफाफा, 11 अगस्‍त को सुनवाई

धाकेफाल्कर ने कहा, ‘‘चूंकि यह (हालोआर्चिया) गुलाबी रंग पैदा करता है, इसलिए पानी की सतह पर गुलाबी रंग आ गया.’’ धाकेफाल्कर और संस्थान के अन्य अनुसंधानकर्ताओं ने इस संबंध में विस्तृत रिपोर्ट वन विभाग को भेजी है, जिसे विभाग बम्बई उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ को सौपेंगा. यह पीठ झील का रंग गुलाबी हो जाने संबंधी चिंताओं को लेकर याचिका की सुनवाई कर रही है. Also Read - Mumbai Rains latest Updates: मुंबई में झमाझम बारिश से बिगड़े हालात, दोपहर में हाई टाइड का अलर्ट

धाकेफाल्कर ने कहा कि उनका मानना है कि बारिश न होने, कम मानवीय हस्तक्षेप होने और अधिक तापमान के कारण जल वाष्पीकृत हो गया, जिसके कारण इसकी खारापन एवं पीएच स्तर बढ़ गया और इससे हालोआर्चिया को पनपने में मदद मिली.

उन्होंने बतया कि इस बात का भी पता लगाया गया कि क्या पानी का रंग स्थायी रूप से गुलाबी हो गया है. धाकेफाल्कर ने कहा, ‘‘हमने नमूना जल को कुछ देर के लिए रख दिया और हमने पाया कि जैव भार पानी के नीचे पहुंच गया और पानी पारदर्शी हो गया. वैज्ञानिकों ने कहा कि बारिश की वजह से खारापन कम होने के कारण झील का पानी पुन: अपने मूल रंग में लौट रहा है.

महाराष्ट्र के बुलढाणा में लोनार झील एक लोकप्रिय पर्यटक केंद्र है. करीब 50,000 साल पहले पृथ्वी पर एक धूमकेतु के टकराने से यह अंडाकार झील बनी थी. हाल ही में इस झील का पानी गुलाबी हो गया है, जिससे स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि प्रकृति प्रेमी और वैज्ञानिक भी चकित हैं.