नई दिल्‍ली/ मुंबई: महाराष्‍ट्र में तीन दलों शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस की सरकार के बीच मतभेद गहराते नजर आ रहे हैं. एक पिछले हफ्ते कांग्रेस नेता अशोक चव्‍हाण और बालासाहेब थोरात के बयानों के बाद शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना में कांग्रेस को ‘पुरानी खाट’ तक बता दिया है. Also Read - अनोखा शौक: कोरोना संकट में इस शख्‍स ने 3 लाख रुपए का सोने का मास्‍क बनवाया

सामना में शिवसेना ने कांग्रेस को खूब खरी-खोटी सुनाई है. वहीं, सामना के संपादकीय पर शिवसेना संजय राउत ने कहा, कांग्रेस के कुछ नेताओं का इंटरव्यू मैंने पढ़ा,खासकर अशोक चव्हाण जी का. उनकी कोई शिकायत है, तो वो मुख्यमंत्री जी से बात करें. ये बात प्रशासन और सरकार के संघर्ष की नहीं है. वैसे ही इस समय महाराष्ट्र पर कोरोना और चक्रवात का बहुत बड़ा संकट है. Also Read - Dy SP समेत 8 पुलिस जवानों की शहादत: कांग्रेस, BSP, SP ने UP सरकार पर बोला हमला

वहीं, सामना के लेख के बाद बीजेपी ने भी सियासी हमला किया है. भाजपा नेता राम कदम ने कहा है कि मुंबई में आदमी कोरोना के बेड ना मिलने के कारण तड़प-तड़प कर मर रहा है और इन तीनों पार्टियों को कुर्सी की पड़ी है. Also Read - प्रियंका गांधी को खाली करना होगा सरकारी बंगला, केंद्र सरकार ने एक महीने का समय दिया

दसअल, सामना के संपादकीय जिसका शीर्षक है खटिया क्यों चरमरा रही है?..में लिखा गया है, ”सरकार ने छह महीने का चरण पूरा कर लिया है. तीन विविध विचारधारा वाले दलों की सरकार बनी. उस सरकार की बागडोर सर्वसम्मति से उद्धव ठाकरे को दी गई. राज्य के मामले में मुख्यमंत्री का निर्णय ही अंतिम होता है, ऐसा तय होने के बाद कोई और सवाल नहीं रह जाता. कांग्रेस पार्टी भी अच्छा काम कर रही है, लेकिन समय-समय पर पुरानी खटिया रह-रह कर कुरकुर की आवाज करती है. खटिया पुरानी है लेकिन इसकी एक ऐतिहासिक विरासत है. इस पुरानी खाट पर करवट बदलने वाले लोग भी बहुत हैं. इसलिए यह कुरकुर महसूस होने लगी है.”

सामना के संपादकीय में लिखा है. ” यहां तो तीन दलों की सरकार है. थोड़ी बहुत कुरकुर तो होगी ही. ‘मुख्यमंत्री से मिलकर बात करेंगे’ थोरात ने ऐसा कहा. उसी खाट पर बैठे अशोक चव्हाण ने भी ‘इंडियन एक्सप्रेस’ को एक साक्षात्कार दिया और उसी संयम से कुरकुराए, ‘सरकार को कोई खतरा नहीं है, लेकिन सरकार में हमारी भी बात सुनी जाए. प्रशासन के अधिकारी नौकरशाही विवाद पैदा कर रहे हैं. हम मुख्यमंत्री से ही बात करेंगे!’ अब ऐसा तय हुआ है कि कुरकुर की आवाज वाली खाट के दोनों मंत्री महोदय मुख्यमंत्री से मिलकर अपनी बात कहनेवाले हैं. मुख्यमंत्री उनकी बातें सुनेंगे और निर्णय लेंगे. लेकिन कांग्रेस क्या कहना चाहती है? राजनीति की यह पुरानी खटिया क्यों कुरकुर की आवाज कर रही है? ”

सामना की संपादकीय में आगे लिखा है, ” हमारी बात सुनो का मतलब क्या? यह भी सामने आ गया है. थोरात और चव्हाण दिग्गज कांग्रेसी नेता हैं, जिन्हें सरकार चलाने का बहुत बड़ा अनुभव है. हालांकि, उन्हें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इस तरह का दीर्घ अनुभव शरद पवार और उनकी पार्टी के लोगों को भी है. हालांकि कुरकुर या कोई आहट होती नहीं दिख रही. प्रशासन के कुछ अधिकारी ऐसा व्यवहार कर रहे हैं मानो वे ही प्रभारी हैं और वे कांग्रेस नेताओं के साथ उचित व्यवहार नहीं कर रहे हैं, ऐसी खबरें प्रकाशित हुई हैं.

संपादकीय में लिखा है, शिवसेना ने सत्ता के वितरण में सबसे बड़ा त्याग किया है. कांग्रेस-राकांपा ने विधानसभा अध्यक्ष के पद पर विवाद शुरू किया. शरद पवार थोड़ा नाराज हुए, तो उन्होंने यह कहकर विवाद सुलझा दिया कि कांग्रेस विधानसभा अध्यक्ष पद ले ले और बदले में शिवसेना अपने हिस्से का एक कैबिनेट मंत्री का पद राष्ट्रवादी को दे, इस पर मामला सुलझ गया. कांग्रेस के राज्यमंत्रियों का प्रमोशन करके दो कैबिनेट दिए. समान सत्ता वितरण में भी हिस्से में इतना नहीं आता. लेकिन मुख्यमंत्री ने बेझिझक होकर सब दिया और इसके बाद 6 महीने किसी की खाट में कुरकुर की आवाज नहीं हुई.

शिवसेना के मुखपत्र में लिखा है.. इस खेल में पत्तों का पिसना कभी नहीं थमता. इसलिए सरकार को खतरा पैदा होगा और राजभवन के दरवाजे किसी के लिए अल-सुबह फिर से खुल जाएंगे, इस भ्रम में कोई न रहे. चाहे कांग्रेस हो या राकांपा, राजनीति में मंझे लोगों की पार्टी है. उन्हें इस बात का अनुभव है कि कब और कितना कुरकुराना है, कब करवट को बदलना है. उद्धव ठाकरे को सत्ता का लोभ नहीं. राजनीति अंततः सत्ता के लिए ही है और किसी को सत्ता नहीं चाहिए, ऐसा नहीं है लेकिन उद्धव ठाकरे ऐसे नेता नहीं हैं, जो सत्ता के लिए कुछ भी करेंगे. हर किसी के गले में मंत्री पद का हार है. यह नहीं भुलाया जा सकता कि इसमें शिवसेना का त्याग भी महत्वपूर्ण है. खाट कितनी भी क्यों न कुरकुराए, कोई चिंता न करे, बस इतना ही कहना है.”