नई दिल्ली: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम पर शुरू किया गया सालाना अंतरराष्ट्रीय ‘गांधी शांति पुरस्कार’ पिछले चार साल से नहीं दिया गया है. देश आज मंगलवार को महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मना रहा है. इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए प्रस्ताव प्राप्त करने वाली नोडल एजेंसी संस्कृति मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि इस सम्मान के लिए नामांकन हासिल किए गए लेकिन मंजूरी की प्रतीक्षा है. आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि नामांकन आए हैं लेकिन यह कहना मुश्किल है कि इसमें देरी क्यों हुई.

आखिरी बात 2014 में इसरो को मिला था पुरस्कार
महात्मा गांधी के सिद्धांतों को श्रद्धांजलि के तौर पर भारत सरकार ने यह पुरस्कार 1995 में उनकी 125वीं जयंती पर शुरू किया था. पिछली बार यह सम्मान 2014 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) को दिया गया था. यह पुरस्कार उन व्यक्तियों या संस्थाओं को दिया जाता है जिन्होंने सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक बदलावों के लिए अहिंसा एवं अन्य गांधीवादी तरीकों द्वारा योगदान किया है. 2014 से केंद्र में बीजेपी की सरकार है. कांग्रेस को बहुमत हासिल नहीं हुआ था.

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एक करोड़ रुपए दिए जाते हैं
इस पुरस्कार में एक करोड़ रुपये नकद और प्रशस्तिपत्र दिया जाता है. पुरस्कार विजेता का फैसला एक ज्यूरी द्वारा किया जाता है जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता, प्रधान न्यायाधीश और दो अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल होते हैं. जिस वर्ष यह पुरस्कार दिया जाता है, उस साल 30 अप्रैल तक संस्कृति मंत्रालय के कार्यालय द्वारा प्राप्त नामाकंनों पर विचार किया जाता है.

1995 में इन्हें दिया गया था पुरस्कार
यह पुरस्कार सबसे पहले 1995 में तंजानिया के पूर्व राष्ट्रपति जूलियस के न्येरेरे को दिया गया था. उसके अगले वर्ष यह सम्मान सर्वोदय श्रमदान आंदोलन के संस्थापक अध्यक्ष एआर टी एरियारत्ने को मिला था. 1997 में यह सम्मान जर्मनी के गेरहार्ड फिशर ने प्राप्त किया. 1998 में इस पुरस्कार के लिए रामकृष्ण मिशन तथा 1999 में बाबा आमटे का चयन किया गया था. यह पुरस्कार 2000 में नेल्सन मंडेला और ग्रामीण बैंक, बांग्लादेश को संयुक्त रूप से दिया गया था. 2005 में आर्कबिशप डेसमंड टूटू को यह पुरस्कार मिला. आठ साल के अंतराल के बाद 2013 में यह सम्मान चिपको आंदोलन से जुड़े पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट को दिया गया.