Oldest Ramlila in Delhi: रामलीलाएं हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं. कई पीढ़ियों से यह संस्कारों को अगली पीढ़ी में पहुंचाने का माध्यम भी रही हैं. ऐसे में जब आपको खबर मिलती है कि 180 वर्ष से भी ज्यादा समय से हो रही रामलीला (Ramlila) इस साल नहीं हो पाएगी तो मन दुखी हो जाता है. अजीब सा नॉस्टाल्जिया घेर लेता है और फिर पुरानी यादें आंखों के सामने तैरने लगती हैं. पुराने दिन रह-रहकर याद आते हैं. याद आता है कैसे आजादी से पहले और उसके बाद देश के बड़े-बड़े नेता इस रामलीला में पहुंचते थे. कैसे यह रामलीला लोगों में आजादी और लोकतंत्र की अलख जगाने का काम करती थी. कई लोगों के तो रिश्ते इस रामलीला में जुड़े होंगे. लोग रामलीला देखने आते थे और यहीं पर शादी-ब्याह के अटूट बंधन जुड़ जाते थे. इससे पहले कि आप पुरानी यादों की गहराई में उतरकर आंसुओं का समंदर बहा दें, वापस वर्तमान में आ जाते हैं. बात हो रही है श्री रामलीला कमेटी द्वारा आयोजित होने वाली रामलीला की.
दिल्ली (Delhi) के दिल कहे जाने वाले चांदनी चौक (Chandni Chawk) में आयोजित होने वाली यह रामलीला 180 वर्ष से भी ज्यादा समय से हर वर्ष होती आई है. कोविड-19 के चलते पिछले वर्ष भी रामलीला का आयोजन नहीं हो पाया था, लेकिन इस वर्ष स्थितियां काबू में होने पर सभी को उम्मीद थी कि रामलीला का लुत्फ लेंगे. अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, श्री रामलीला कमेटी (Sri Ramlila Committee) का कहना है कि अधिकारियों ने रामलीला उत्सव के लिए अनुमति बहुत देर से दी, जिसके कारण इस बार भी आयोजन संभव नहीं हो पाया.
चांदनी चौक की रामलीला मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के शासनकाल में शुरू हुई थी. रामलीला सवारी और उत्सव चांदनी चौक से अजमेरी गेट तक होता था. लेकिन पिछले वर्ष कोविड के चलते और इस वर्ष अनुमति मिलने में देरी के कारण दिल्ली और आसपास के लोग इस भव्य रामलीला के दर्शन नहीं कर पाए.
दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए) ने 29 सितंबर को ही कोविड से जुड़े जरूरी मानदंडों, जैसे 50 फीसद सीटिंग कैपेसिटी का पालन करते हुए रामलीला के मंचन की मंजूरी दे दी थी, लेकिन आयोजकों को उत्सव के लिए अलग से अनुमति लेनी थी.
श्री रामलीला कमेटी के महासचिव राजेश खन्ना ने बताया कि हमने रामलीला मैदान में ही रामलीला मंचन और रामलीला सवारी के उत्सव की अनुमति के लिए आवेदन किया था. लेकिन इसके लिए हमें सिर्फ दो दिन पहले ही अनुमति मिल पायी. ऐसे में जब रामलीला के लिए जरूरी तैयारी ही पूरी नहीं हो पायी है तो फिर हम रामलीला का आयोजन कैसे कर सकते थे. रामलीला की तैयारी के लिए एक महीने से भी ज्यादा का समय लगता है.
आमतौर पर रामलीला का आयोजन नवरात्र के पहले दिन से शुरू होता है, इस बार गुरुवार 7 अक्टूबर से रामलीला का मंचन शुरू होना था. अब चूंकि कोविड के हालात काबू में हैं, इसलिए श्री रामलीला कमेटी को उम्मीद है कि अगले वर्ष भव्य तरीके से रामलीला का आयोजन होगा.
महासचिव राजेश खन्ना और श्री रामलीला कमेटी के अन्य सदस्यों का कहना है कि इतिहास में सिर्फ तीन बार ही ऐसा हुआ है, जब रामलीला का आयोजन नहीं हो पाया. ‘पिछले वर्ष कोविड के कारण रामलीला नहीं हो पाई और इस वर्ष भी अनुमति मिलने में देरी के कारण ऐसा हुआ. इसके अलावा 1947-48 में देश के बंटवारे के दौरान रामलीला का मंचन नहीं हो पाया था. यह दिल्ली की सबसे पुरानी रामलीला है, जिसे मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर का भी समर्थन हासिल था.’ श्री रामलीला कमेटी के सदस्य विजय सारथी ने कहा, ‘दो साल रामलीला नहीं हो पाई, लेकिन हमें पूरी उम्मीद है कि अगले साल से पहले की तरह ही भव्य रामलीला का आयोजन होगा.’
व्यापारियों की एक संस्था चांदनी चौक सर्व व्यापार मंडल के अध्यक्ष संजय भार्गव कहते हैं, ‘त्योहारों के मौसम में रामलीला सवारी एक बड़ा आकर्षण हुआ करता था. इसे देखने के लिए दिल्ली के कोने-कोने से लोग पहुंचते थे.’ भार्गव पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं, ‘हर रोज शाम करीब 4 बजे एस्प्लेनेड रोड से रामलीला सवारी शुरू होती थी और फिर अजमेरी गेट स्थित रामलीला मैदान में जाकर खत्म होती थी. इन 9-10 दिनों में लोग इस शानदार नजारे को देखने के लिए घरों से निकलकर सड़क पर आ जाते थे. हर कोई त्योहार के रंग में रंग जाता था, फिर चाहे वह व्यापारी हों या आम निवासी.’
भार्गव ने कहा, रामलीला की वह रंगत पिछले कुछ वर्षों में थोड़ी मंदी जरूर पड़ी है, क्योंकि बहुत से लोग यहां से छोड़कर दूसरी जगहों में जा बसे हैं. कोविड महामारी ने रामलीला के भव्य स्वरूप को प्रभावित किया है, लेकिन इसके अलावा अन्य कारण भी हैं. जब से लोग दूसरे इलाकों में जाकर बस गए हैं, तब से रामलीला का आकर्षण कुछ हद तक कम हो गया है.
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