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BJP ने रेखा के नाम पर ही क्यों लगाई मुहर? जानिये कैसी है दिल्ली की नई कैबिनेट, हर तबके को है साधने की कोशिश
दिल्ली में 27 साल बाद BJP की सरकार बन गई है. रेखा गुप्ता (Rekha Gupta) ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली. रेखा गुप्ता के साथ-साथ 6 विधायकों ने भी मंत्री पद की शपथ ली है. आइये जानते हैं कैसी है दिल्ली की नई कैबिनेट.
दिल्ली में नई सरकार का गठन हो चुका है. रेखा गुप्ता (Rekha Gupta) दिल्ली की मुख्यमंत्री पद पर काबिज हो चुकी हैं. सरकार का गठन भले ही हो गया हो, लेकिन लोगों के मन में ये सवाल अब भी जरूर आ रहा होगा कि आखिर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने फर्स्ट टाइम MLA रेखा गुप्ता को ही क्यों दिल्ली की कमान सौंपी, जबकि रेस में कई बड़े नाम थे. इनमें अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) को हराने वाले परवेश वर्मा से लेकर विजेंद्र गुप्ता पहली कतार में थे. बता दें कि BJP और RSS की कदम ताल पर बारीकी से नजर रखते हुए इंडिया.कॉम ने रेखा गुप्ता का नाम पहले ही ले लिया था.
पहली बार विधायक बनीं रेखा वैश्य समाज से आती हैं और मूल रूप से हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. BJP पर जिसने पैनी नजर रखी है वह जानता है कि अमित शाह और पीएम नरेंद्र मोदी किस तरह महिलाओं को आगे कर उनकी भागीदारी को बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं. चाहें 2014 में जब गुजरात से दिल्ली आ रहे थे तब उन्होंने महिला के हाथों में गुजरात की कमान छोड़ी थी. तब उन्होंने आनंदी बेन को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया था. या फिर बात करें अपनी कैबिनेट में महिलाओं को जिम्मेदारी सौंपने की.

महिलाओं पर फोकस BJP
बीजेपी ने सत्ता संभालते ही पहला नारा ‘बेटी बचाओ बेटी पढाओ’ दिया. मोदी सरकार ने महिलाओं को आगे लाने की कई योजनाएं लांच की. विडंबना यह है कि BJP फिलहाल 13 राज्यों में सत्ता में है, लेकिन अब तक पार्टी की कोई महिला सीएम नहीं थीं. रेखा के शपथ लेते ही यह आरोप भी अब खत्म हो गया. BJP का दिल्ली में 27 साल का सूखा खत्म हो गया है. सुषमा स्वराज 12 अक्टूबर 1998 से 3 दिसंबर 1998 तक दिल्ली की CM रहीं थीं. उन्हें भी दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाया गया था. सुषमा स्वराज तीन महीने तक ही सीएम रह सकीं, क्योंकि प्याज की बढ़ी कीमत की वजह से BJP चुनाव हार गई. इसके बाद शीला दीक्षित ने दिल्ली की कमान संभाली और 15 वर्षों तक सीएम रहीं. शीला ने दिल्ली की काया पलट कर रख दी.
क्यों मिली रेखा को कमान?
आइये जानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने आखिर रेखा को क्यों सीएम बनाया? रेखा इसलिए क्योंकि वह BJP में अपने छात्र जीवन से ही जुड़ गई थीं.. ABVP से लेकर महिला मोर्चा की अध्यक्ष रही हैं..बेदाग छवि होने के साथ-साथ रेखा RSS से भी जुड़ी रही हैं. उनकी संगठन में अच्छी पकड़ है. कहा यह भी जाता है कि BJP में बड़े नेता वही हैं, जिनकी पृष्ठभूमि कहीं न कहीं आरएसएस से जुड़ी हो या फिर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ा रहा हो. रेखा के साथ ये दोनों होना काम आया. हालांकि कई लोग रेखा के पहली बार विधायक बनने को लेकर बातें कर रहे हैं, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीति में वह नई नहीं हैं.

राजनीति का अनुभव कम नहीं
रेखा दिल्ली नगर निगम की पार्षद रही हैं. बता दें कि रेखा गुप्ता पिछली दो बार से दिल्ली में विधानसभा चुनाव लड़ती रही हैं, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. इस बार रेखा ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी और आम आदमी पार्टी की बंदना कुमारी को 29 हजार से अधिक वोटों से हराया. ये बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा था. हालांकि कुछ राजनीतिक जानकार रेखा गुप्ता और अरविंद केजरीवाल में भी समानताएं निकाल रहे हैं. अरविंद केजरीवाल और रेखा गुप्ता दोनों हरियाणा से आते हैं और बनिया जाति से हैं. भारत की चुनावी राजनीति में पिछले एक दशक पर अगर नजर डालें तो आप पाएंगे कि महिलाओं को वोट बैंक के रूप में सिर्फ देखा ही नहीं जा रहा है, बल्कि लुभाने का भरसक प्रयास किया जा रहा है और राजनीतिक पार्टियां इसमें सफल भी हो रही हैं.

बिठाया गया जातीय समीकरण
दिल्ली की नई कैबिनेट में BJP ने राष्ट्रीय राजधानी की सामाजिक संरचना को समझते हुए हर बड़े वर्ग, समुदाय के नेता को प्रतिनिधित्व दिया है. इससे आगामी चुनावों में उसे फायदा मिल सकता है. रेखा को सीएम बनाने का फैसला न सिर्फ व्यापारिक वर्ग को खुश करेगा, बल्कि ऐसा फैसला BJP के परंपरागत वोट बैंक को भी मजबूत करेगा. हालांकि व्यापारिक तबके में BJP की जड़ें पहले से ही गहरी हैं. ऐसा माना जा रहा है कि वैश्य समुदाय की सीएम बनाए जाने का कदम इसे और पक्का करेगा. इसके साथ ही महिला नेतृत्व देने से एक बार फिर से महिलाओं का झुकाव पार्टी की ओर बढ़ेगा.
बात करते हैं परवेश वर्मा की..एक बात जो यहां जाननी जरूरी है कि उनके पिता साहिब सिंह वर्मा दिल्ली के सीएम रह चुके हैं. जब वह सीएम बने तो वह भी शालीमार बाग से ही जीत कर आए थे. लेकिन परवेश को मंत्री बनाकर पार्टी ने जाट एवं गुर्जर समाज को भी साधा है. दिल्ली के ग्रामीण बाहरी इलाकों में जाट और गुर्जर समाज के मतदाताओं की बड़ी संख्या है. पूर्व सीएम रहे साहिब सिंह वर्मा के पुत्र परवेश वर्मा की जाटों की राजनीतिक पकड़ बहुत मजबूत है. भाजपा आगामी लाभ के लिए इस वर्ग को अपने पाले में बनाए रखना चाहती है. परवेश ने नई दिल्ली विधानसभा सीट पर 10 साल से दिल्ली की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल को मात दी थी.
मंत्रिमंडल से हर तबके को खुश करने की कोशिश!
दिल्ली की राजनीति में पंजाबी खासकर सिखों का बहुत बड़ा प्रभाव है, खासकर कारोबारी तबके और पश्चिमी दिल्ली में बड़ी संख्या में सिख समुदाय के वोटर्स हैं. पंजाबियों और इस वोट बैंक को साधने के लिए BJP ने मनजिंदर सिंह सिरसा और आशीष सूद को कैबिनेट में शामिल किया है..
दिल्ली में बड़ी संख्या में अनुसूचित जाति की है और बड़ी संख्या में वोटर्स हैं. बता दें कि ये बड़ा वर्ग आम आदमी पार्टी के वोटर्स हैं. भाजपा ने दलित समुदाय के वोटर्स को लुभाने के लिए रविंद्र इंद्राज को मंत्री बनाया है.
दिल्ली में ब्राह्मणों का दबदबा रहा है जो भाजपा के कोर वोटर्स भी यही हैं. ब्राह्मणों को खुश करने के लिए भाजपा ने कपिल मिश्रा को कैबिनेट में शामिल किया है. कपिल मिश्रा ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत ‘आप’ से की, लेकिन भाजपा में शामिल होने के बाद आक्रामक हिंदुत्व राजनीति का चेहरा माने जाते हैं.
दिल्ली में बड़ी संख्या में माइग्रेशन कर आए पूर्वांचली रहते हैं और इन्हें साधना हर राजनीतिक पार्टी अपना अहम धर्म मानती है. इसे साधने के लिए सभी पार्टियों ने एड़ी चोटी तक का जोर लगा डाला था. भाजपा विजयी रही और पूर्वांचली वोटरों को साधने के लिए पार्टी ने डॉ. पंकज कुमार सिंह को भी कैबिनेट में जगह दे दी है.
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