ओपिनियन: खर्च कम, काम ज्यादा…वित्तीय अनुशासन के रोल मॉडल बने योगी

Written By: India.com Hindi News Desk Updated by: Rishabh Kumar
Updated Date:May 14, 2026 10:13 PM IST

महंगाई और वैश्विक संकट के बीच योगी सरकार ने सरकारी खर्च घटाने, वर्चुअल मीटिंग बढ़ाने और गाड़ियों की संख्या कम करने जैसे बड़े फैसले लिए हैं.

डॉ. शिरीष मिश्र: संकट केवल आर्थिक मंदी या राजस्व की कमी तक सीमित नहीं होता. संकट का अर्थ होता है, संसाधनों पर बढ़ता दबाव, जनसंख्या की बढ़ती जरूरतें, अवसंरचना पर अतिरिक्त भार और वैश्विक परिस्थितियों का अनिश्चित होना. ऐसे समय में शासन के सामने सबसे बड़ी परीक्षा उसकी नीतियों की नहीं, बल्कि उसके संयम की होती है. क्योंकि जब संसाधन सीमित हों और अपेक्षाएं असीमित, तब संतुलन ही सुशासन का सबसे बड़ा प्रमाण बन जाता है. संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग का कोई विकल्प नहीं है. किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार केवल नीतियां नहीं बनाती, वह एक उदाहरण भी प्रस्तुत करती है. जब शीर्ष नेतृत्व स्वयं अपने आचरण में मितव्ययिता दिखाता है, तो उसका प्रभाव प्रशासनिक संरचना से लेकर आम नागरिक के व्यवहार तक फैलता है. मिडिल ईस्ट में लंबे समय से जारी युद्ध से उपजे वर्तमान वैश्विक संकट को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी की प्रेरणा से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सरकारी फ्लीट में कटौती, अनावश्यक यात्राओं पर नियंत्रण और डिजिटल माध्यमों के अधिकतम उपयोग जैसे कदम उठाने का निर्णय लेकर वित्तीय अनुशासन का ऐसा उदाहरण सामने रखा है जो अन्य राज्यों के लिए अनुकरणीय उदाहरण बनेगा. ऐसे निर्णय केवल तकनीकी या प्रशासनिक सुधार नहीं रहते, बल्कि एक सांस्कृतिक संदेश बन जाते हैं कि राज्य स्वयं संयम का पालन कर रहा है.

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एक नई कार्यसंस्कृति का जन्म

जनता की गाढ़ी कमाई से संचित राजकोष का एक-एक पैसा सार्वजनिक धरोहर है. आज जब मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष के चलते विश्व अर्थव्यवस्था की धीमी होती रफ्तार और महंगाई राज्य सरकारों के सामने संसाधनों की तंगी एक वास्तविक चुनौती बन चुकी है, तब सरकारी खर्चों में कटौती महज एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि एक गहरी नैतिक जिम्मेदारी है. उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री समेत मंत्रियों के फ्लीट में 50 प्रतिशत की कटौती, वर्क फ्रॉम होम की संस्कृति को प्रोत्साहन देना, स्वर्ण की अनावश्यक खरीद को हतोत्साहित करना, पीएनजी, मेट्रो और सार्वजनिक परिवहन के उपयोग पर जोर देना, और सरकारी बैठकों, सम्मेलनों तथा सेमिनारों को वर्चुअल माध्यम से आयोजित करने की पहल इस नैतिक दृष्टिकोण की परिचायक है. यह केवल धन बचाने की कवायद नहीं है, यह एक नई कार्यसंस्कृति भी है. जब मुख्यमंत्री की अपनी कॉन्फ्रेंस वर्चुअली होती है, तो हर अधिकारी और कर्मचारी को स्वयं ही समझ आ जाता है कि आज का युग डिजिटल है और इस युग में यात्राओं, आयोजनों और दिखावे पर होने वाले खर्च को न्यूनतम करना न केवल संभव है, बल्कि आवश्यक भी है. प्रौद्योगिकी का यह सदुपयोग एक साथ कई उद्देश्य साधता है, समय व संसाधनों की बचत और पर्यावरण पर पड़ने वाले दबाव में कमी.

जन-विश्वास ही असली ताकत

यह सोचना भूल होगी कि ये उपाय केवल आर्थिक हैं. इनका एक गहरा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक आयाम भी है. जब आम नागरिक देखता है कि उसका मुखिया सार्वजनिक परिवहन की बात करता है, तो वह अपनी रोजमर्रा की कठिनाइयों को अलग नजर से देखने लगता है. जब वह जानता है कि शासन की बागडोर संभाले हाथ भी उन्हीं सिद्धांतों पर चलते हैं जो आम जन से अपेक्षित हैं, तो उसके मन में सरकार के प्रति एक विश्वास जागता है. वह विश्वास जो लोकतंत्र की असली ताकत है. मितव्ययिता जब ऊपर से शुरू होती है, तो वह नीचे तक स्वाभाविक रूप से उतरती है. थोपी हुई किफायत और स्वेच्छा से अपनाई गई किफायत में यही अंतर होता है.

गहरा व्यावहारिक प्रभाव

संकट के समय समाज और शासन दोनों की परीक्षा होती है. इतिहास के पन्नों को पलटें तो पाएंगे कि जिन राष्ट्रों ने विपरीत परिस्थितियों में धैर्य, संयम और सामूहिक अनुशासन का परिचय दिया, वे ही दीर्घकाल में समृद्ध और सशक्त बने. जापान की उबरने की कहानी हो, या सिंगापुर के उत्थान की गाथा, इन सबके मूल में एक साझा सूत्र है. संकट में सरकार ने पहले खुद को कसा, फिर जनता से अपेक्षा की. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से लिए गए निर्णय उसी परंपरा की एक धारा है. मुख्यमंत्री ने जो किया, उसका व्यावहारिक प्रभाव गहरा है. पचास प्रतिशत वाहनों की कटौती से जो धनराशि बचेगी, वह किसी गरीब बच्चे की शिक्षा में, किसी गांव की सड़क में, किसी अस्पताल की दवा में काम आ सकती है. वर्चुअल बैठकों से जो समय और धन बचेगा, वह नीति-निर्माण और क्रियान्वयन में लगाया जा सकता है. यह केवल कटौती नहीं है, यह प्राथमिकताओं का पुनर्निर्धारण है. कोविड काल में उत्तर प्रदेश ने धैर्यपूर्वक अपनी प्राथमिकताओं का पालन किया है और इसमें कोई दो राय नहीं कि राज्य अब भी यह कर सकता है.

अब प्रशासनिक तंत्र की जिम्मेदारी

आज जब युवा पीढ़ी अपने नेताओं में आदर्श ढूंढती है, जब जनता पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करती है, तब इस तरह के निर्णय एक सकारात्मक संदेश देते हैं. यह साबित होता है कि राजनीति में भी आत्म-अनुशासन संभव है. वित्तीय संकट में एक जिम्मेदार शासन वही करता है जो एक जिम्मेदार परिवार करता है, पहले खर्च घटाओ, फिर आय बढ़ाने के उपाय सोचो. हालांकि यह भी एक कड़वा सत्य है कि मुख्यमंत्री के निर्णयों की सफलता अब इस बात पर निर्भर करेगी कि यह भावना पूरे प्रशासनिक तंत्र में कितनी गहराई से उतरती है. मंत्री से लेकर क्लर्क तक, सचिवालय से लेकर तहसील तक, यदि मितव्ययिता का यह संकल्प एक जन-आंदोलन का रूप ले, तो इसके परिणाम केवल राजकोषीय नहीं, सामाजिक भी होंगे. ऐसा राज्य न केवल आर्थिक रूप से सुदृढ़ होगा, बल्कि नागरिकों का विश्वास भी अर्जित करेगा.

मितव्ययिता एक दर्शन

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मितव्ययिता का यह निर्णय केवल एक प्रशासनिक उपाय नहीं है, यह एक दर्शन है, एक संस्कार है. संकट में संयम, विपत्ति में विवेक और सीमित संसाधनों में असीमित सेवा का संकल्प.... यही वह धरातल है जिस पर विश्वसनीय शासन खड़ा होता है. जब जनता देखती है कि उसका नेता कड़े फैसले पहले खुद पर लागू करता है फिर दूसरों से अपेक्षा करता है, तो वह स्वयं भी उस यात्रा का हिस्सा बनने को तैयार हो जाती है. यही लोकतंत्र की असली शक्ति है और यही आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत भी. एक पुरानी कहावत है कि जो नाव अपने भार को समझती है, वही तूफान में भी स्थिर रहती है. राज्य भी एक विशाल प्रणाली है, और उसका स्थायित्व उसके संतुलन पर निर्भर करता है. यदि खर्च अनियंत्रित हो जाए, तो वह प्रणाली पर बोझ बन जाता है, लेकिन यदि उसे नियंत्रित और उद्देश्यपूर्ण बनाया जाए, तो वही विकास का आधार बनता है और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यही करने का प्रयास कर रहे हैं.

(नोट: ये लेखक के अपने निजी विचार हैं)

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