पूर्वी उत्तर प्रदेश समेत, बिहार और झारखंड के हिस्सों में मनाए जाने वाले छठ पर्व की शुरुआत मंगलवार यानि आज से हो चुकी हो चुकी है. इस पर्व में भगवान सूर्य की उपासना होती है. इस व्रत की प्रक्रिया बेहद कठिन होती है. इसमें स्त्रियां 36 घंटे तक निर्जला रहती हैं. चार दिनों तक चलने वाला ये पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास, शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होता है और सप्तमी तक चलता है. पहले दिन नहाय खाय से शुरू होकर चौथे दिन ऊषा अर्घ्य के साथ इस व्रत की समाप्ति होती है. आइए हम आपको इसके चारों दिनों के महत्व के बारे में अलग-अलग विस्तार से बताते हैं- Also Read - Indian Railway: रेलवे का यात्रियों को तोहफा, छठ-दीपावली से पहले इन रूट्स पर चलाई जाएंगी ट्रेनें, देखें लिस्ट

पहला दिन- नहाय खाय
पहले दिन नहाय खाय की विधि होती है. इसमें घर की साफ सफाई करने और स्नानादि करने के बाद शुद्ध शाकाहारी भोजन किया जाता है. व्रती के भोजन करने के बाद ही घर के बाकि सदस्य भोजन करते हैं और फिर इस व्रत की शुरुआत होती है. Also Read - बिहार में छठ के दौरान हुए अलग-अलग हादसों में 18 बच्चों सहित 30 लोगों की मौत

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दूसरा दिन- खरना
छठ पूजा के दूसरे दिन खरना की विधि होती है. इस दिन व्रती को पूरे दिन का उपवास रखना होता है. यहां तक कि पानी भी नहीं पिया जाता. शाम को गन्ने का जूस या गुड़ के चावल या गुड़ की खीर का प्रसाद बांटा जाता है. इसके बाद से ही 36 घंटे का कड़ा निर्जला व्रत शुरू होता है.

तीसरा दिन- संध्या अर्घ्य
इस दिन व्रती नदी या तालाब में उतरकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देती है. इसे संध्या अर्घ्य कहा जाता है. इस दिन प्रसाद स्वरूप ठेकुआ और चावल के लड्डू बनाए जाते हैं. रात में छठी माता के गीत गाए जाते हैं और इस व्रत की कथा का पाठ होता है.

चौथा दिन या अंतिम दिन- ऊषा अर्घ्य
छठ पूजा के चौथे दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. इसे ऊषा अर्घ्य कहते हैं. इस दिन सूर्य निकलने से पहले ही लोग नदी या तालाब के घाट पर पहुंच जाते हैं. व्रती पानी में उतर कर सूर्य को अर्घ्य देती है. इसके बाद घाट पर ही पूजा की जाती है. पूजन के बाद व्रती प्रसाद खाकर व्रत खोलती है और प्रसाद को सभी में बांट दिया जाता है.