American Kid Case: कोविड-19 के प्रकोप के चलते मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में इन दिनों वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिये वर्चुअल पद्धति से सुनवाई की जा रही है. लेकिन अपने पति के साथ वैवाहिक विवाद से जूझ रही 30 वर्षीय महिला की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के अदालत कक्ष में करीब ढाई महीने के अंतराल के बाद सामान्य तरीके से सुनवाई हुई. Also Read - मुसलमानों को न्यायालय का फैसला स्वीकार करना चाहिए : विश्व हिंदू परिषद

इस मामले में अदालत ने अमेरिका में जन्मे दो वर्षीय बच्चे को देखभाल के लिये उसकी याचिकाकर्ता मां को सौंपने का अहम फैसला सुनाया. बच्चा अमेरिका का नागरिक है. हालांकि, वह पिछले कुछ वक्त से अपने दादा-दादी के साथ ग्वालियर में रह रहा था. Also Read - रेप केस में आसाराम दोषी करार, जेल जाने वाले बाबाओं की लंबी है फेहरिस्त

न्यायमूर्ति एस सी शर्मा ने संबंधित पक्षों के तर्क सुनने के बाद कानूनी प्रावधानों और उच्चतम न्यायालय की नजीर की रोशनी में याचिकाकर्ता महिला की गुहार कल सोमवार को स्वीकार की. अदालती आदेश की विस्तृत प्रति मामले से जुड़े वकीलों को मंगलवार को हासिल हुई. Also Read - madhya pradesh advocate going to strike in april | 9 से 15 अप्रैल तक काम नहीं करेंगे 1 लाख वकील, सरकार के सामने रखी ये मांग

बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान दो वर्षीय बच्चा अपनी मां और दादा-दादी के साथ अदालत कक्ष में खुद मौजूद था. अदालत ने अपने फैसले में कहा, “अपनी मां को देखते ही बच्चा उसकी ओर दौड़ा और यह दृश्य अदालत ने देखा. बच्चा निश्चित रूप से अपनी मां के साथ ज्यादा खुश है.”

एकल पीठ ने कहा, “मां के प्यार की बराबरी कोई भी भाव नहीं कर सकता. एक बच्चे के लिये मां की ममता का मतलब शब्दों में नहीं समझाया जा सकता.”

मामले की सुनवाई के दौरान बच्चे के दादा-दादी के वकील की ओर से कहा गया कि मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करने वाली महिला के खिलाफ अमेरिका के ओहियो प्रांत की एक अदालत ने कथित घरेलू हिंसा को लेकर उसके पति की गुहार पर एक आदेश पारित किया है और इसकी रोशनी में बच्चे के दादा-दादी को उसके अभिभावक होने का अधिकार है.

एकल पीठ ने मामले से जुड़े दस्तावेज देखने के बाद इस तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि अमेरिका की किसी भी अदालत ने ऐसा कोई आदेश पारित नहीं किया है जिसमें बच्चे की कस्टडी उसके पिता को सौंपने की बात कही गई हो.

याचिकाकर्ता महिला के वकील हितेश शर्मा ने बताया कि उनकी मुवक्किल अपने पति के साथ वैवाहिक विवाद से तंग आकर दिसंबर 2019 में अपने इंदौर स्थित मायके लौट आयी थी. शर्मा ने बताया कि कुछ दिन पहले जब उनकी पक्षकार को पता चला कि उसका पति उनके दो वर्षीय बच्चे को ग्वालियर में अपने माता-पिता के घर छोड़ गया है, तो उसने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया.

उच्च न्यायालय में महिला की ओर से कहा गया कि बच्चे के दादा-दादी बुजुर्ग होने के कारण उसकी देखभाल करने में सक्षम नहीं हैं और कई बार मान-मनुहार किये जाने के बावजूद उसे अपनी संतान से मिलने नहीं दिया जा रहा है.