नई दिल्‍ली: फ़िराक़ गोरखपुरी की शख़्सियत में इतनी परतें थीं, इतने आयाम थे, इतना विरोधाभास था और इतनी जटिलताएं थीं कि हमेशा से उनका कोई न कोई रंग आकर्षित करता ही है. फ़िराक़ बोहेमियन थे… आदि विद्रोही, धारा के विरुद्ध तैरने वाले बाग़ी. अदा अदा में अनोखापन, देखने-बैठने-उठने-चलने और अलग अंदाज़े-गुफ़्तगू, बेतहाशा गुस्सा, अपार करुणा, शर्मनाक कंजूसी और बरबाद कर देने वाली दरियादिली, फ़कीरी और शाहाना ज़िंदगी का अद्भुत समन्वय. Also Read - ताउम्र आजाद बने रहेंगे भारत के वीर सपूत चंद्रशेखर, जानें 10 बातें

फिराक साहब के इलाहाबाद यूनिवर्सिटी को लेकर जितने किस्से हैं उससे कम शहर को लेकर भी नहीं हैं. ऐसा ही एक वाकया है बैंक रोड का. पहले गंगा और यमुना का संगम भारद्वाज आश्रम के पास होता था. बैंक रोड गंगा का तट होता था. इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में मध्यकालीन इतिहास के विभागाध्यक्ष प्रो. हेरम्ब चतुर्वेदी ने एक बार किसी मौके पर बताया था कि इस रोड के ठीक नीचे इटावा से आए रामनारायण लाल का घर था. इसके साथ इसी रोड पर ही एक इक्का और तांगा स्टैण्ड हुआ करता था. यहां घोड़ों के लिए हौंदे बने हुए थे जिनमें उनको चारा पानी दिया जाता था. यहीं एक नाई हुआ करता था रमजान. फिराक साहब का वह पसंदीदा था. वे उसी के यहां हजामत और बाल बनवाया करते थे. रमजान घोड़ों के भी बाल काटते थे. एक बार हेरम्ब चतुर्वेदी समेत अन्य प्रोफेसर्स ने फिराक साहेब से पूछा कि फिराक जी इस बार आपके बाल कुछ अच्छे तरीके से नहीं कटे हैं तो उन्होंने हंसते हुए कहा, हां असल में वो घोड़ों के बाल काटता है तो उसे लगा होगा कि ये गधे नहीं हैं, इंसान हैं तो घोड़ों की तरह बाल को काटा ही जा सकता है. Also Read - पुण्यतिथिः आज के ही दिन बॉलीवुड ने खो दिया था 'मोगैंबो', पहले टेस्ट में हो गए थे फेल, जानें कुछ खास बातें

बैंक रोड का महत्व आज भी है. इसी रोड पर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर्स की कॉलोनी है. यहीं से फिराक साहेब अपने इंग्लिश डिपार्टमेंट जाया करते थे. इस रोड़ पर अग्रवालों की एक बगिया थी. अग्रवालों ने इसे बेच दिया था. यहीं पर एक नाला बहा करता था जिसे लोगों ने पाटकर घर बना लिये. इतिहासकार वेणी प्रसाद का भी मकान इसी रोड पर हुआ करता था. Also Read - सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह ने शक्‍तिस्‍थल पर पहुंचकर पूर्व इंदिरा गांधी को दी श्रद्धांजलि

तद्भव’ के सातवें अंक में फ़िराक गोरखपुरी पर ‘विश्वनाथ त्रिपाठी’ ने बहुत विस्तार से संस्मरण लिखा. उन्होंने लिखा कि फिराक साहब मिलनसार थे, हाजिरजवाब थे और विटी थे. अपने बारे में तमाम उल्टी-सीधी बातें खुद ही किया करते थे. उनके यहां उनके द्वारा ही प्रचारित चुटकुले आत्मविज्ञापन प्रमुख हो गए. अपने दुख को बढ़ा-चढ़ाकर बताते थे. स्वाभिमानी हमेशा रहे. पहनावे में अजीब लापरवाही झलकती थी- ‘टोपी से बाहर झांकते हुए बिखरे बाल, शेरवानी के खुले बटन,ढीला-ढाला (और कभी-कभी बेहद गंदा और मुड़ा हुआ) पैजामा, लटकता हुआ इजारबंद, एक हाथ में सिगरेट और दूसरे में घड़ी, गहरी-गहरी और गोल-गोल- डस लेने वाली-सी आंखों में उनके व्यक्तित्व का फक्कड़पन खूब जाहिर होता था. लेकिन बीसवीं सदी के इस महान शायर की गहन गंभीरता और विद्वता का अंदाज उनकी शायरी से ही पता चलता है.

जब वे लिखते हैं :-

जाओ न तुम हमारी इस बेखबरी पर कि हमारे

हर ख्‍़वाब से इक अह्‌द की बुनियाद पड़ी है.

अपने बारे में अपने ख़ास अंदाज में लिखते हुए फिराक साहब ने लिखा था :-

आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हमअस्रों

जब ये ख्याल आयेगा उनको, तुमने फ़िराक़ को देखा था.

 

(ये ब्‍लॉग प्रवीण कुमार सिंह ने लिखा है.)