समाज-विरोधी या गलत काम करने पर आम बोलचाल में लोग एक-दूसरे पर टोंट कसते हुए कह देते हैं, ‘नरक में जाओगे’ या ‘तुम्हें नर्क में भी जगह नहीं मिलेगी’. इन कथनों या मुहावरे-नुमा बातों से सवाल उठता है कि दुनिया में आखिर नर्क है कहां? दर्शनशास्त्र के ज्ञाताओं की मानें तो स्वर्ग और नर्क, दरअसल सुख-दुख के पर्यायवाची हैं. लेकिन दुनिया में एक जगह ऐसी भी है जिसे हकीकत में ‘नर्क का द्वार’ (Door to hell) कहा जाता है. जी हां, कभी सोवियत रूस के अधीन रहे तुर्कमेनिस्तान (Turkmenistan) के दरवेजा (Darvaza) गांव में रेगिस्तान के बीचो-बीच ज्वालामुखीनुमा एक गड्ढा है, जिसमें हर वक्त आग लगी रहती है. पिछले करीब 50 वर्षों से इस गड्ढे में आग की ऊंची लपटें उठ रही हैं. पर्यटकों के लिए दरवेजा की यह जगह आज की तारीख में तुर्कमेनिस्तान की सबसे पसंदीदा जगहों में से एक है. आइए देखते हैं इसकी कुछ तस्वीरें. Also Read - Narendra Modi inaugurated yoga centre in Turkmenistan capital

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तुर्कमेनिस्तान में स्थित इस नर्क के द्वार के पैदा होने की कहानी बड़ी रोचक है. दरअसल, यह कोई प्राकृतिक ज्वालामुखी नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक अनुसंधान के दौरान हुई दुर्घटना के कारण इस गड्ढे में आग लगी और अब यह पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन गया है. बात वर्ष 1971 की है जब सोवियत रूस के कुछ भूगर्भ वैज्ञानिक तुर्कमेनिस्तान के काराकुम रेगिस्तान (Karakum desert) में प्राकृतिक गैस की खोज कर रहे थे. रेगिस्तान के बीचो-बीच भूगर्भ विज्ञानियों को कुछ संकेत मिला तो वहां खुदाई शुरू कर दी गई. खुदाई से इस स्थान पर प्राकृतिक गैस के होने का पता चला. लेकिन खुदाई के दौरान अचानक हुई एक दुर्घटना के कारण इस काम में लगे सभी उपकरण गड्ढे में गिर गए और वहां से गैस बाहर आने लगी. गड्ढे से निकल रही जहरीली गैस की गुबार देखकर वैज्ञानिकों ने सोचा कि क्यों न आग लगाकर इस गड्ढे को भर दिया जाए. Also Read - India, Turkmenistan sign seven agreements

Door-to-hell-tour

Door-to-Hell-Poster

वैज्ञानिकों के आग लगाकर गड्ढे को भरने के तरीके पर सबकी सहमति बनी, लेकिन उस वक्त तो किसी को इस बात का अंदाजा नहीं था कि आग लगाने के बाद क्या होगा. इसलिए फौरन ही जमीन के अंदर से निकल रही जहरीली गैस में आग लगा दी गई. लेकिन एक बार जो आग लगी तो फिर इसे लाख कोशिशों के बाद भी बुझाया न जा सका. तब से इस गड्ढे में यह आग जल ही रही है. अब तो इसे देखने दूर-दूर से लोग आते हैं. वर्ष 2004 में तुर्कमेनिस्तान के प्रधानमंत्री ने दरवेजा गांव के बाशिंदों को यहां से हटाकर किसी दूसरी जगह शिफ्ट करने का आदेश दिया.