जयपुर: जयपुर साहित्य उत्सव (जेएलएफ) में साहित्य, भाषा और राजनीति से लेकर पर्यावरण समेत विभिन्न मुद्दों पर गंभीर चर्चाओं के बीच किताबों की दुनिया ने भी साहित्य के दीवानों को अपनी और खींचा. हालांकि चार बाग में लगे किताबों के इस मेले में हिंदी एक कोने में एक शेल्फ के छह खानों में सिमटी दिखी. इसके अलावा एक और शेल्फ के सिर्फ एक खाने में साहित्य अकादमी की हिंदी पुस्तकों को भी सहेजा गया था. इस बार जेएलएफ में हिंदी, राजस्थानी समेत 15 भारतीय भाषाओं के वक्ताओं ने शिरकत की. इनमें गीतकार प्रसून जोशी, अशोक वाजपेयी, प्रेमचंद की पौत्री और लेखिका सारा राय, चंद्र प्रकाश देवल, चरण सिंह पथिक, कवि और लेखक माधव कौशिक, मधु आचार्य, नंद भारद्वाज, अनंत विजय, सलिल मिश्रा, रवीश कुमार शामिल प्रमुख रहे.

हिंदी में अधिकतर इन्हीं की पुस्तकों को स्थान दिया गया था. इन प्रमुख पुस्तकों में यहां से वहां (अशोक वाजपेयी), बियाबान में (सारा राय), अपने अपने अज्ञेय (संपादन-ओम थानवी), काव्य संग्रहः परिचय कल्पना से (कल्पना पुरोहित), हिमालय का कब्रिस्तान (लक्ष्मी प्रसाद पंत), सारे सपने बागी हैं (माधव कौशिक), साहित्य-आलोचना : री आधार भोम, बदलती सरगम (नंद भारद्वाज), नीला स्कार्फ (अनु सिंह चौधरी), दो बहने (चरण सिंह पथिक), पानी को सब याद था, दूबधान (अनामिका) शामिल थी.

इसके अलावा हिंदी में कुछ अनुदित किताबें जैसे मृदुला बिहारी की ‘पूरणाहुती’, चार पोलिश कवियों की ‘हमारे और अंधेरे के बीच’, शोभा डे की ‘सोचा न था‘, ‘सितारों की रातें, सबा नकवी की ‘भगवा का राजनीतिक पक्ष’, नमिता गोखले की ‘राग पहाड़ी’ और नीलम सरन गौड़ की ‘62 की बातें’ भी दिखीं.वहीं साहित्य अकादमी दिल्ली की पुस्तकों में बांग्ला से अनुदित गोरा (रवींद्र नाथ ठाकुर) और पंजाबी से अनुदित अंधेरे में सुलगती वर्णमाला (सुरजीत पातर), आधुनिक रूसी कहानी (हेमचंद्र पांडे), प्रतिनिधि कहानियां (अलेक्सांद पुश्किन) प्रमुख थीं.

गीतकार जावेद अख्तर ने इस बार जेएलएफ में शिरकत नहीं की. निजी कारणों से अंतिम समय में उनका आना स्थगित हो गया. जावेद अख्तर की भी ‘तरकश’, ‘लावा’ यहां उपलब्ध रही.हिंदी के कम स्थान का इसके चाहने वालों पर कोई असर नहीं दिखा. महात्मा गांधी मेडिकल कालेज, जयपुर में एमबीबीएस अंतिम वर्ष के छात्र उत्कर्ष ने बताया कि वह अपनी नानी के लिए तोहफे के तौर पर अच्छी किताब की चाह में यहां आए हैं.उत्कर्ष ने कहा ‘‘मुझे नरेंद्र कोहली की किताब की तलाश थी, लेकिन वह यहां नहीं है तो मैं अब कोई और कहानियों की बेहतर किताब तलाश कर रहा हूं.’’

अपने लिए उन्होंने शोभा डे की किताब ‘सितारों की रात’ पहले ही चुन ली थी.हिंदी में अपने लिए काव्य संग्रह खोज रहे छात्र धनेश कुमार पाराशर ने कहा ‘‘यहां से कुछ और अच्छी किताबें भी मैने चुनी है.’’जयपुर के अग्रवाल पीजी कालेज में बीएससी तृतीय वर्ष के छात्र पाराशर ने बताया कि वह खुद भी वीर रस की कविताएं लिखते हैं.राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय से बीएससी की पढ़ाई कर रहे उदित ने कहा ‘‘ दुनिया के सबसे बड़े साहित्य उत्सव के लिहाज से तो हिंदी को मिला यह स्थान कम है, लेकिन तब भी यहां हिंदी सशक्त रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है, यह क्या कम बात है.’’

जेएलएफ में आए लेखक भी हिंदी को कम स्थान की बहस में पड़ने के बजाय इसका सकारात्मक पक्ष देखते हैं. प्रेमचंद की पौत्री और लेखिका सारा राय ने कहा ‘‘हिंदी और अन्य भाषाओं के पास अंग्रेजी के मुकाबले ज्यादा रीडरशिप है. हिंदी की एक खरीदी गई एक किताब को कई पाठक पढ़ते हैं. दरअसल हिंदीवालों को आत्मविश्वास की जरूरत है. उन्हें यह समझना होगा कि भाषाओं के पास पाठकों का सागर है और यह सबसे बड़ी ताकत है.’’जयपुर साहित्य उत्सव का 13वां संस्करण यहां डिग्गी पैलेस में 23 से 27 जनवरी तक आयोजित किया गया. दुनिया का सबसे बड़ा साहित्य उत्सव कहे जाने वाले जेएलएफ में इस बार 500 से अधिक वक्ताओं और कलाकारों ने शिरकत की.आयोजकों के अनुसार, पांच दिन तक चले जेलएलएफ में करीब 4.5 लाख से अधिक लोग पहुंचे.