नई दिल्ली. पाकिस्तानी संगीत जगत की नामचीन हस्ती उस्ताद नुसरत फतेह अली खान ने 80 के दशक में एक कव्वाली को अपनी आवाज दी थी. नुसरत फतेह अली खान की गाई यह कव्वाली ‘मेरे रश्के कमर, तूने पहली नजर…’ इतनी पॉपुलर हुई कि देश-विदेश तक में इसके हजारों-लाखों कैसेट, रिकॉर्ड और सीडी-डीवीडी बिके. कव्वाली पसंद करने वालों ने इस गाने को यूट्यूब पर डाल दिया. फिर तो नुसरत साहब की आवाज जगह-जगह सुनाई देने लगी. जमाना जब सोशल मीडिया का आया, तो एक बार फिर संगीत के चाहने वालों को यह कव्वाली याद आई और हाल के कुछ वर्षों में अपने देश में भी इस कव्वाली के अलग-अलग वर्जन सुनाई देने लगे. कभी मंचों पर तो कभी विज्ञापन में. और तो और बॉलीवुड स्टार अजय देवगन की फिल्म ‘बादशाहो’ में भी यह कव्वाली इस्तेमाल की गई. विभिन्न भाषाओं में भी इसका अनुवाद किया गया. पिछले दिनों इस कव्वाली का संस्कृत भाषा में अनुवाद किया गया, जो सोशल मीडिया पर धूम मचाने पहुंच गया है. संस्कृत में अनुवादित ‘मेरे रश्के कमर…’ के शब्द हो सकता है बहुत लोगों की समझ में न आएं, लेकिन इसका संगीत पहले की तरह ही मीठा और कर्णप्रिय है. यह अनुवाद किया विपिन शुक्ला ने. सोशल मीडिया पर वायरल इस कव्वाली के संस्कृत वर्जन में वीडियो के साथ-साथ सबटाइटल्स भी चलते हैं. इसलिए आप इन शब्दों को दोहरा जरूर सकते हैं. सुनिए संस्कृत में अनुवादित ‘मेरे रश्के कमर…’.

पाकिस्तानी शायर की रचना
‘मेरे रश्के कमर…’ को अगर आप Google पर सर्च करें तो एकबारगी इतने सारे वीडियो आपके होमपेज पर खुलेंगे कि आपके लिए मूल वीडियो ढूंढ़ना मुश्किल हो जाएगा. अगर आप इस गजल के रचयिता का नाम खोजने लगे तो आपको थोड़ी देर और मशक्कत करनी पड़ेगी. लेकिन हम यहां बता देते हैं कि इस मशहूर गजल (कव्वाली) को पाकिस्तान के शायर मुहम्मद हनीफ ने लिखा था. मुहम्मद हनीफ अपना तखल्लुस नाम फना बुलंदशहरी लिखते हैं. वर्ष 1988 में पहली बार उस्ताद नुसरत फतेह अली खान ने फना बुलंदशहरी की लिखी इस कव्वाली को सुरों में पिरोकर जनता के सामने पेश किया था. एक बार जब ये कव्वाली संगीत के सुरों में ढलकर आम लोगों तक पहुंची तो फिर यह जनता की ही होकर रह गई. हाल के कुछ वर्षों में अगर सबसे मशहूर कव्वालियों की गिनती की जाए, तो ‘मेरे रश्के कमर…’ सबसे आला दर्जे की और सर्वाधिक लोकप्रिय कव्वालियों में से एक होगी. संस्कृत में अनुवादित इस कव्वाली को सुनने के बाद आप इसके मूल गायक, यानी उस्ताद नुसरत फतेह अली खान की आवाज में गाई कव्वाली भी सुनिए.

मूल कव्वाली ये है
मेरे रश्क-ए-क़मर तूने पहली नज़र, जब नज़र से मिलाई मज़ा आ गया
बर्क सी गिर गई काम ही कर गई, आग ऐसी लगाईं मज़ा आ गया

जाम में घुल कर हुस्न की मस्तियां, चांदनी मुस्कुराई मज़ा आ गया
चांद के साये में ऐ मेरे साक़िया, तू ने ऐसी पिलाई मज़ा आ गया

नशा शीशे में अंगड़ाई लेने लगा, बज़्म-ए-रिंदा में सागर खनकने लगा
मैकदे पे बरसने लगी मस्तियां, जब घटा गिर के छाई मज़ा आ गया

बे-हिज़ाबाना वो सामने आ गए, और जवानी जवानी से टकरा गई
आंख उनकी लड़ी यूं मेरी आंख से, देख कर ये लड़ाई मज़ा आ गया

आंख में थी हया हर मुलाक़ात पर, सुर्ख आरिज़ हुए वस्ल की बात पर
उसने शर्मा के मेरे सवालात पे, ऐसी गर्दन झुकाई मज़ा आ गया

शैख़ साहिब का ईमान बिक ही गया, देख कर हुस्न-ऐ-साकी पिघल ही गया
आज से पहले ये कितने मगरूर थे, लुट गई पारसाई मज़ा आ गया

ऐ “फ़ना” शुक्र है आज बाद-ए-फ़ना, उसने रख ली मेरे प्यार की आबरू
अपने हाथों से उसने मेरी कब्र पर, चादर-ऐ-गुल चढ़ाई मज़ा आ गया