एक नए शोध के अनुसार पृथ्वी पर 66 लाख साल पहले एक क्षुद्रग्रह या धूमकेतु भी जिसे कहा जाता है आकर पृथ्वी से टकराया था। इसके कारण माना जाता है की भारत में एक विशाल ज्वालामुखी विस्फोट भी हुआ और वही दुनिया भर में भी ऐसी ही घटना घटी जिसके कारण पृथ्वी की प्रजातियों में से 70 प्रतिशत का सफाया हो गया। गुरुवार को साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन ने क्रेटेशियस काल के अंत में जन विलुप्त होने की आम सहमति के स्पष्टीकरण पर एक मोड़ डालता है। वैज्ञानिकों ने लंबे समय से शोध के बाद कहा है की धरती से एक पर्वत के आकार की वस्तु टकरा गयी जिसके कारण धरती पर रेह रहे जीवो की ज़िंदगी का अंत हो गया। कई लाख सालों के बाद भी इस घटना के निशान आज भी पाये जाते है। जैसे की मेक्सिको के युकतन जहा प्रायद्वीप की नोक पर एक विशाल गड्ढा आज भी लोगो को उस हादसे के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर देता है।

यह भी कहा जा रहा है की भारत में बड़े पैमाने पर ज्वालामुखी एक ही समय में फटा और डेक्कन ट्रैप्स नाम के एक विशाल क्षेत्र भर में लावा फैला गया। वही इन दो घटनाओं के संयोग शुरू में संकेत देते थे। साथ ही यह भी माना जा रहा है की लावा की बाढ़ वाली दुर्घटना का प्रभाव लंबे समय पहले ही शुरू होने का संकेत मिला है। एक नए डेटा के अनुसार क्षुद्रग्रह या धूमकेतु प्रारंभिक विस्फोट का कारण नहीं था मगर एक अखबार के अनुसार, यह तेज हो सकता था। चिक्क्सुलूब प्रभाव- युकतं में एक शहर के लिए यह नाम रखा गया था। वही इस शहर में गड्ढा के आसपास के क्षेत्र में हुए तिव्रता को 11रियक्टल स्केल के आस पास कहा जाता है। जबकि लेखक कहते हैं की 9.00 की तिव्रता के भूकंप को ग्रह के चारों ओर महसूस किया जा सकता है।

न्यू पेपर के प्रमुख लेखक पॉल रेंने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में एक भूविज्ञानी है। जिन्होंने खोज की शुरवात की और उसे “शुरू की है एक बार, यह रनअवे प्रक्रिया” को नाम दिया है। सह-लेखक मार्क रिचर्ड्स, एक और बर्कले भूविज्ञानी की लिखी हुई यह किताब अप्रैल में प्रकाशित एक अध्ययन के प्रमुख लेखक ज्वालामुखी गतिविधि में वृद्धि पर लिखा था जिसे लोगो ने बेहद पसंद किया था। वही नए अध्ययन के हिसाब से यह सारी घटना जो की धरती पर घटी थी वह कम से कम 50,000 साल के आस पास थी। वैज्ञानिकों की दुनिया में हमेशा से यह बहस का विषय रहा है की डायनासोर कैसे मरे। वहीं 1980 तक डायनासोर के मरने के कारण पर कोई ठोस सबूत ना होने के कारण कोई कुछ बोल नहीं पता था। फिर पिता-पुत्र की टीम लुइस और वाल्टर अल्वारेज़ ने अपने अध्ययन से इसका साबुत जोड़ा और दुनिया के सामने रखा। इस टीम ने इरिडियम अलौकिक की शोध की जो वस्तुओं में पृथ्वी पर दुर्लभ लेकिन आम है। रेंने और रिचर्ड्स का कहना है नए शोध से दो विचारों का एक अंतिम सुलह करने के लिए बात कर सकते है। दो शिविरों की बात कुछ हद तक सही होसकती है। पहले पृथ्वी का पिघला हुआ इंटीरियर से झटका उकसाया या फिर अंतरिक्ष से झटका आया। यह दो सवाल अभी भी लोगो के मन में है।